गढ़वाली-कुमाउँनियों की संख्या लाखों में होते हुए भी और अब उत्तराखंड राज्य बने हुए आठ वर्ष हो चुकने के बाद भी गढ़वाली-कुमाउँनी भाषा का तिरस्कार जारी है। भाषा और संस्कृति ही हमारी अस्मिता की पहचान है, मगर उत्तराखंड राज्य सरकार को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के प्रश्न पर मौन साधे हुए हैं।
जनगणना के आँकड़ों के अनुसार भारत में 114 भाषायें और 216 मातृभाषायें हैं। इनमें से 22 भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा चुका है। भारतीय आर्य परिवार की कुल 20 भाषाओं में 15 भाषायें अनुसूची में शामिल की गई हैं और द्रविड़ परिवार की कुल 17 भाषाओं में से 4। आस्ट्रो एशियाई परिवार की कुल 14 भाषाओं में से एक, संथाली को इस अनुसूची में शामिल किया गया है। तिब्बती-बर्मी परिवार की कुल 62 भाषाओं में से 2 भाषाओं, मणीपुरी व बोडो को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में संस्कृत, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, नेपाली, डोगरी, मैथली, बोडो और संथाली की लिपि देवनागरी है। इस प्रकार देश की कुल आबादी का पचास प्रतिशत से भी अधिक नागरी लिपि का प्रयोग करता है। आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिये 36 भाषाओं की माँग अभी भी सरकार के पास लंबित है। इस अनुसूची में भाषाओं को शामिल करने के लिये संविधान में अलग कोई मानदंड निर्धारित नहीं किया गया है। अब तक सभी भाषायें राजनैतिक कारणों से शामिल की जाती रही हैं। आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं को जो लाभ मिलते हैं, वे इस तरह हैं:-
1. मुख्यमंत्री सम्मेलन 1961 की सिफारिश के अनुसार माध्यमिक स्कूल तक पढ़ाई का माध्यम आठवीं अनुसूची में शामिल कोई एक भाषा होनी चाहिये।
2. संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में उम्मीदवारों को आठवीं अनुसूची में शामिल किसी एक भाषा का प्रश्न-पत्र क्वालीफाई करना पड़ता है। उम्मीदवारों को यह विकल्प दिया जाता है कि आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं के साहित्य में से किसी एक भाषा का प्रश्न पत्र चुन सकते हैं। उन्हें यह भी विकल्प दिया जाता है कि प्रश्न पत्रों का उत्तर अंग्रेजी या आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में से किसी एक भाषा में लिख सकते हैं। लिखित परीक्षा में उम्मीदवार जो मीडियम चुनता है, साक्षात्कार में भी वही मीडियम चुनने की अनुमति दी जाती है।
गढ़वाली-कुमाउंनी भाषाओं (जिनकी लिपि देवनागरी है और जो भारतीय आर्य परिवार की भाषायें हैं) को आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में से किसी एक भाषा में लिख सकते हैं। लिखित परीक्षा में उम्मीदवार जो मीडियम चुनता है, साक्षात्कार में भी वही मीडियम चुनने की अनुमति दी जाती है। गढ़वाली-कुमाउंनी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिये कोशिश करना तो दूर, पिछले आठ वर्षों के शासन काल में हमारे मुख्यमंत्री एक दूसरे की आलोचनाओं-प्रत्यालोचनाओं में ही डूबे रहे और लाल बत्तियों के काफिले में घूम-घूम कर राज्य की निरीह जनता पर रौब गाँठते रहे। किसी के भी दिमाग में यह विचार नहीं कौंधा कि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत और अपनी भाषा, जिससे हमारी अस्मिता, हमारी पहचान जुड़ी हुई है, की समृद्धि और उन्नयन के लिये कुछ ठोस उपाय करने चाहिये।
कुछ समय पूर्व राज्य सरकार ने ‘उत्तराखंड संस्कृति साहित्य एवं कला परिषद’ का गठन कर हमारी भाषा एवं संस्कृति के साथ खिलवाड़ भी किया। एक के बाद एक लीलाधर जगूड़ी, डॉ. यशोधर मठपाल और ज़हूर आलम इस परिषद् के उपाध्यक्ष रहे। उत्तराखंड के विख्यात साहित्यकार और संस्कृतिकर्मी उसमें बतौर सदस्य जोड़े गये। पर इस परिषद् की कार्यप्रणाली कुछ ऐसी रही कि एक के बाद एक उपाध्यक्ष व सदस्य परिषद को अलविदा कहते गये और आज इस प्रकार की कोई परिषद है भी या नहीं, किसी को पता नहीं है। बेचारे उपाध्यक्ष तो मात्र कुर्सी तक के ही उपाध्यक्ष थे- वित्त से लेकर बैठकें आहूत करने तक के सारे अधिकार मुख्यमंत्री जी ही समेटे रहे। इससे केवल भाषा एवं साहित्य की ही हानि नहीं हुई, बल्कि उन विद्वानों का भी अपमान हुआ जिन्हें समाज में भरपूर सम्मान प्राप्त है।
उत्तराखंड राज्य में प्रमुखतः गढ़वाली, कुमाउंनी, गुरमुखी वं पंजाबी एवं उर्दू भाषायें बोली जाती हैं। इनमें से गुरमुखी और उर्दू भाषाओं को वर्षों पूर्व संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कर लिया गया था। तब से ही इन भाषाओं को बोलने वाले इसका भरपूर लाभ उठा रहे हैं। प्रत्येक छोटे-बड़े गुरुद्वारे के साथ पाठशालायें हैं जहाँ पर बच्चों को जूनियर हाईस्कूल एवं हायर सैकेंड्री तक गुरमुखी पढ़ाई जाती है और अधिकांश विषय भी गुरमुखी भाषा में ही पढ़ाये जाते हैं। ऐसे ही प्रत्येक छोटी-बड़ी मस्जिद के साथ मदरसे जुड़े हुए हैं, जहाँ पर बच्चों को उर्दू एवं फारसी भाषा में प्रशिक्षित किया जाता है। देश में गुरमुखी एवं उर्दू की, हिन्दी के ही समान साहित्य अकादमियां हैं, ललित कला अकादमियाँ हैं- पर इसे गढ़वाली और कुमाउंनी भाषा-भाषियों का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि उत्तराखंड में आज तक किसी ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। काश कि हमारा भी कोई गॉडफादर होता जो गढ़-कुमूँ की पीड़ा समझता।
गाँव की पाठशाला में प्रवेश करते ही हमें गढ़वाली-कुमाउनी के स्थान पर हिन्दी पढ़ाई जाने लगी थी। ‘क’ से ‘काखड़ी’ के
स्थान पर ‘ककड़ी’ और ‘ब’ से ‘बाखरी’ के स्थान पर ‘बकरी’ घोटाया गया। हम से हमारी मातृभाषा छीन कर हमें हिन्दी-अंग्रेजी को अपनाने के लिये प्रेरित किया गया। यह अंग्रेजी हुक्मरानों की सोची-समझी चाल थी। पर अंग्रेजों के जाने के बाद भी हमारी सरकारें हमें उसी शिकंजे में जकड़े हुए हैं। जनगणना वालों ने भी हमें खूब छकाया। उत्तर प्रदेश का एक भाग होने के कारण जनगणना के लिये अधिकतर बलिया, वाराणसी या मुरादाबाद-रामपुर के सरकारी कर्मचारी उत्तराखंड आते। जब मातृभाषा के खाने की पूर्ति के लिये ग्रामीण भाई-बहनों से पूछते थे तो गढ़वाली-कुमाउनी में बताने पर तुरन्त बोलते थे कि हिन्दी जानते हो और सकारात्मक उत्तर मिलने पर मातृभाषा के खाने में लिख दिया जाता था- ‘हिन्दी’।
मेरा गढ़वाली/कुमाउनी विद्वानों एवं जन समाज से पुरजोर आग्रह है कि और अधिक समय न गँवा कर उत्तराखंड राज्य आंदोलन की तरह ही अपनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के लिये हमें कमर कसकर सड़कों पर उतरना होगा। निकट भविष्य में होने वाली जनगणना में अपनी मातृभाषा गढ़वाली-कुमाउँनी ही लिखवायें, ताकि हम अपना दावा मुकम्मल तौर से पेश कर सकें। साहित्यिकारों से निवेदन है कि वे अधिक से अधिक गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं में साहित्य सृजन करें। शब्दकोशों पर कुमाउँनी विद्वानों ने काफी काम कर लिया है। इधर अखिल गढ़वाल सभा, देहरादून भी ‘गढ़वाली भाषा और साहित्य समिति’ के माध्यम से गढ़वाली- हिन्दी -अंग्रेजी शब्दकोष एवं व्याकरण आदि मेरे संयोजन में कार्य कर रही है।