पहाड़ की तीजनबाई कौन है ? नई पीढ़ी को तो मालूम नहीं है। हाँ, अब सरकार के साथ लोग भी भूलने लगे हैं। लोक गायिका कबूतरी देवी को कभी तीजनबाई के नाम से जाना जाता था। अब वे बीमार हैं। राज्य सरकार की कलाकारों के प्रति बेरुखी से वे अब मन से भी टूटने लगी हैं।
दिसंबर 2008 में पिथौरागढ़ में ‘पहाड़’ पत्रिका के विमोचन पर कई विभूतियों के साथ मंच पर कबूतरी देवी को देखा। एक दुबली-पतली सी काया को मंच पर मुख्य सूचना आयुक्त आर.एस. टोलिया के बगल में सकुचाई सी बैठी थी। मंच से लोक गायकी में उनके योगदान के बारे में जो कुछ कहा जा रहा था, उससे कबूतरी देवी बहुत खुश दिखाई दे रही थीं। आज वे बीमार हैं।
कबूतरी देवी का मायका चम्पावत है। बचपन से ही विरासत में मिली लोक गायकी को कबूतरी देवी नये सुरों में पिरोती चली गईं। माता-पिता ने अपनी लोक गायकी के सभी सुरों से बेटी को बचपन में नवाज दिया। 60 के दशक में पिथौरागढ़ के क्वीतड़ गाँव में दीवानी राम से इनकी शादी हुई। मोटर मार्ग से 6-7 किमी. की पैदल दूरी पर बसा है क्वीतड़ गाँव। पति ने जब कबूतरी देवी की मीठी तान सुनी तो मंत्रमुग्ध हो उठा। पति के प्रयासों के चलते कबूतरी देवी को कई मंच मिले। ऑल इंडिया रेडियो रामपुर, नजीबाबाद, लखनऊ व मुम्बई के रेडियो केन्द्रों से कबूतरी देवी की मीठी तान से हजारों लोग मुरीद हो गये। उस जमाने में गायन से महीने में 50 रुपयों तक की आमदनी हो जाया करती थी। लेकिन पति की मौत के बाद वे फिर गुमनामी के अंधेरे में चली र्गइं। पति का साथ 25 वर्षों तक का ही रहा। गाँव में फिर खेती-बाड़ी कर अपनी गुजर-बसर करनी शुरू की। लंबे समय तक कबूतरी की आवाज जब रेडियो में नहीं सुनाई दी तो कई लोग उन्हें ढूँढते हुए क्वीतड़ ही जा धमके। उनकी परेशानियों को समझ सभी ने उन्हें प्रेरित और उत्साहित किया और संस्कृति विभाग का भी दरवाजा खटखटाया। संस्कृति विभाग ने उनकी कला की कीमत मात्र एक हजार रुपया महीना लगाई। कबूतरी ने इसी में ही संतोष किया। प्रशंसको के प्रयासों से कबूतरी देवी ने फिर एक बार नई शुरूआत कर पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, नैनीताल, द्वाराहाट में अपनी कला का लोहा मनवाया। देहरादून में राज्य सरकार के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपनी कला का जादू बिखेरने के बाद सरकार ने उन्हें भी सम्मानित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।
‘पहाड़’ ने कबूतरी को ‘केशव अनुरागी सम्मान’ से नवाज कर उनमें नई जान फूँकने की कोशिश की। मुझे लगा कि अब जल्द मैं फिर कबूतरी देवी को रेडियो में सुन सकूँगा……। अब शायद उनकी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी……। लेकिन ऐसा कुछ भी तो नहीं हुआ। कबूतरी देवी लंबे अर्से से अस्वस्थ चल रहीं हैं और इस समय सुशीला तिवारी अस्पताल, हल्द्वानी में भर्ती हैं। उन्हें अच्छे इलाज की सख्त जरूरत है। माली हालत अच्छी नहीं है। गिर्दा के महाप्रस्थान के बाद हमें उनकी बहुत जरूरत है।