घनशाली में नैलचामी गाड़ और भिलंगना का संगम है जिसे चव्वा कहा जाता था। यही चव्वा आसपास के गाँवों का श्मशान घाट था तो गाँवों में गाली थी कि ‘हे मात चौव्वा बुझौला थ्वै।’ लेकिन हमने इतना विकास किया है कि चौव्वा का श्मशान खुद हमें अपने पास बुला रहा है। आज चौव्वा श्मशान घाट तक लोगों ने कब्जा कर लिया है। नैलचामी गाड़ तक बड़े-बड़े होटल और दुकानें बनी हैं, जिनके कचरा और मल-मूत्र की निकासी सीधे इसी गाड़ में होती है। गाड़ का रंग और रंगत दोनों काली हो गई हैं। उस पर तुक्का ये कि इसी गाड़ पर मोटर लगा कर मिठाई, खाने-पीने की दुकानों और होटलों के लिए पानी पंप कर पहुंचता है जिसे आसपास के सभी ग्रामीण ‘अमरित’ पान करके घनशाली से जाते हैं और तरह-तरह की बीमारी का शिकार होकर समय से पहले ही मौत के शिकार हो कर इसी घनशाली के ‘चौव्वा’ पहुँच जाते हैं। लगता है पुरानी कहावत अब थोड़ा बदल कर ‘चौव्वा बुलौला थ्वै’ हो गई है।
तबला वाला जागर-अगर कैसेट कंपनियाँ तबला या किसी और वाद्य यंत्र पर जागर गवाते हैं तो ये उनकी अज्ञानता है या गायक की बेइमानी, पर जब ‘फोक आर्ट कल्चर के नाम से उत्तराखंडी संस्कृति के अकादमिक लोग ही तबले पर जागर सुनाने लगें तो इसे क्या कहेंगे आप ? बात पौड़ी के प्रेक्षागृह की है। साहित्य अकादमी के सामने गढ़वाली साहित्य, भाषा की प्रमाणिकता के शोध और प्रदर्शनात्मक कलाओं का प्रस्तुतीकरण हुआ 25-26 जून 2010 को। इस आयोजन की दूसरी संध्या को बसंती देवी और साथियों ने जागर गाये तबले पर और तबला मास्टर बेमन जहाँ पर लगा तबले को ‘खंबड़ाता’ रहा। बजाना तो उसे सुहाया ही नहीं। देवता जागर में डौंर-थाली, हुड़की थाली या ढोल-दमाऊँ का सज तो हमने देखा-सुना पर हेमवतीनंदन विश्वविद्यालय के फोक, आर्ट विभाग के द्वारा नीचे हाल में ये सभी वाद्ययंत्रों की प्रदर्शनी के बावजूद तबले पर जागर बजाने का तुक समझ में नहीं आया। यही नहीं चैती गीत भी तबले-ढोलक पर गाये गये। चैती गीत हमेशा ढोली समुदाय के लोग ढोल-दमाऊँ पर गाते हैं, जिसमें औंसर आदि तालों में दमाऊ वाद्य यंत्र का हमेशा ज्यादा प्रयोग होता है और इसी कारण तबले या अन्य वाद्य यंत्रों पर ये ताल नहीं बज सकते। यही कारण है कि खुदेड़-दु:ख्यारा प्रवृत्ति के सभी ताल दांगुड़ी, आछरी या लालसिंग, बगड्वाळी सभी ‘बाजे’ ढोल-दमाऊ पर ही बजाने की परंपरा है यानी तालों की प्रकृति और प्रवृति किसी भी तरह से तबला-ढोलक से मेल नहीं खाती।
खजाने की खोज में बच्चे- सीमांत पिथौरागढ़ में काली-धौली के किनारे जौलजीवी से धारचूला तक दर्जनों गाँव हैं जो खजाने की खोज में बच्चों की पढ़ाई चौपट कर देते हैं। नहीं, आप जौलजीवी के नजदीक सोने की खानों की जानकारी को इससे मत जोड़ना, उसे तो सरकारी आदमी ढ़ूँढ रहे हैं। हम बात कर रहे हैं कीड़ा जड़ी की, जो लाखों में बिकती है। इस जड़ी को खोजने यहाँ के दर्जनों गाँवों के लोग सपरिवार बुग्यालों में चले जाते हैं और माँ-बाप के संरक्षण में प्रत्येक परिवार के बच्चे दिन भर इस खजाने को खोजते हैं। जौलजीवी में बच्चे बताते हैं कि बरसात तक तीन महीने बच्चे कीड़ा जड़ी ढूँढ रहे होते हैं क्योंकि बच्चों की तेज आँखें जल्दी जड़ी ढ़ूँढ लेती हैं। न चाहकर भी बच्चों को ये सब करना होता है, चाहे बीमार पड़ें या चोटिल। कई बच्चे तो तस्करों के साथ गाँजा-भाँग पीने लग जाते हैं। कीड़ा जड़ी झपटने के लिए तस्करों का ये चुग्गा है। माँ-बापों की झटके में लाखों कमाने की लालसा बच्चों को किस ओर ले जायेगी ?
वो तो बस वोटर हैं-बोक्सा जन जाति को तो सरकार ने मान्यता दे दी है। उनके पास जमीन भी है, जिन्हें दूसरे लोगों ने कब्जा कर इन लोगों को उन्हीं की जमीन पर चौकीदारी की नौकरी दे दी है। उधमसिंह नगर के ही बंगाली और पुरब्या जनजाति के लोग आज भी सरकार के लिए सिर्फ वोटर हैं। यहाँ के पन्द्रह सौ से ज्यादा बंगाली और आठ सौ पुरब्या जनजाति के लोग शारदा नदी के किनारे बसे हैं। इन लोगों के पास थोड़ी सी जमीन भी है जो विभाजन के बाद 1952 से उनके नाम पर है। सरकार के खातों में वे इन जमीनों के हकदार नहीं हैं। खटीमा से 7 किलोमीटर दूर बसे इन लोगों की मुसीबतें शारदा सागर बैराज बनने से और बढ़ी हैं। बरसात में इनके घरों तक पानी भर जाता है और फसलें डूब जाती हैं। ये किसी तरह ऊँचे टीलों पर रहते हैं और खुद की बनाई छोटी नावों से ये ताल-तलैयों में तैरते फिरते हैं। मजदूरी कर अनाज और तलैया से माछी मार कर जीवन-बसर करते हैं। राज्य बनने के बाद उत्तराखंड सरकार ने इन जातियों के राशन कार्ड बना दिये हैं और वोटर लिस्ट में भी इनके नाम डाले हैं। इस जाति की अलग पंचायत है जिसके वार्ड सदस्य रामपाल कहते हैं, ‘‘जब भी पंचैत मंत्री को पूछो कि ग्राम विकास का बजट क्या है और पैसा कितना आया है तो प्रधान-पंचैत मंत्री कहते हैं अरे इससे तुम्हें क्या लेना ?’’ रामपाल जैसा पढ़ा-लिखा युवा सदस्य भी कुछ नहीं बोल पाता।



























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