(‘बगरो बसंत है’ में इस बार सुधी पाठकों के लिये प्रस्तुत है प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं की व्यंग्य रचना ‘घायल वसन्त’ तथा उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की कविता ‘होली )
घायल वसन्त
कल वसन्तोत्सव था। कवि वसन्त के आगमन की सूचना पा रहा था- ‘प्रिय, फिर आया मादक वसन्त।’![]()
मैंने सोचा, जिसे वसन्त के आने का बोध भी अपनी तरफ से कराना पड़े, उस प्रिय से तो शत्रु अच्छा। ऐसे नासमझ को प्रकृति-विज्ञान पढ़ायेंगे या उससे प्यार करेंगे। मगर कवि को न जाने क्यों ऐसा बेवकूफ पसन्द आता है।
कवि मग्न होकर गा रहा था -
‘प्रिय, फिर आया मादक वसन्त।’
पहली पंक्ति सुनते ही मैं समझ गया कि इस कविता का अंत ‘हा हन्त’ से होगा और हुआ। अन्त, सन्त, दिगन्त आदि के बाद सिवा ‘हा हन्त’ के कौन पद पूरा करता ? तुक की यही मजबूरी है। लीक के छोर पर यही गहरा गढ़ा होता है। तुक की गुलामी करोगे तो आरम्भ चाहे ‘वसन्त’ से कर लो, अन्त जरूर ‘हा हन्त’ से होगा। सिर्फ कवि ऐसा नहीं करता। और लोग भी, सयाने लोग भी, इस चक्कर में होते हैं। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में तुक पर तुक बिठाते चलते हैं और ‘वसन्त’ से शुरू करके ‘हा हन्त’ पर पहुँचते हैं। तुकें बराबर फिट बैठती हैं पर जीवन का आवेग निकल भागता है। तुकें हमारा पीछा छोड़ ही नहीं रही हैं। हाल ही में हमारी समाजवादी सरकार के अर्थमन्त्री ने दबा सोना निकालने की जो अपील की, उसकी तुक शुद्ध सर्वोदय से मिलायी- ‘सोना दबाने वालो, देश के लिये स्वेच्छा से सोना दे दो।’ तुक उत्तम प्रकार की थी; साँप तक का दिल नहीं दुःखा। पर सोना चार हाथ और नीचे चला गया। आखिर कब हम तुक को तिलांजलि देंगे ? कब बेतुका चलने की हिम्मत करेंगे ?
कवि ने कविता समाप्त कर दी थी। उसका ‘हा हन्त’ आ गया था। मैंने कहा, ‘‘धत्तेरी की !’’ सात तुकों में ही टें बोल गया। राष्ट्रकवि इस पर कम से कम इक्यावन तुकें बाँधते। नौ तुकें तो उन्होंने ‘चक्र’ पर बाँधी हैं। पर तू मुझे क्या बतायेगा कि वसन्त आ गया। मुझे तो सुबह से ही मालूम है। सवेरे वसन्त ने मेरा दरवाजा भी खटखटाया था। मैं रज़ाई ओढ़े सो रहा था। मैंने पूछा, ‘कौन ?’ जवाब आया, ‘मैं वसन्त।’ मैं घबरा उठा। जिस दुकान से सामान उधार लेता हूँ, उसके नौकर का नाम भी वसन्तलाल है। वह उधारी वसूल करने आया था। कैसा नाम है, और कैसा काम करना पड़ता है इसे ! इसका नाम पतझड़दास या तुषारपात होना था। वसन्त अगर उधारी वसूल करता फिरता है तो किसी दिन आनन्दकर थानेदार मुझे गिरफ्तार करके ले जायेगा और अमृतलाल जल्लाद फाँसी पर टाँग देगा।
वसन्त लाल ने मेरा मुहूर्त बिगाड़ दिया। इधर से कहीं ऋतुराज वसन्त निकलता होगा, तो वह सोचेगा कि ऐसे के पास क्या जाना जिसके दरवाजे पर सवेरे से उधारीवाले खड़े रहते हैं। इस वसन्तलाल ने मेरा मौसम ही खराब कर दिया।
मैंने उसे टाला और फिर ओढ़कर सो गया। आँखें झँप गयीं। मुझे लगा, दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। मैंने पूछा, ‘‘कौन ?’’ जवाब आया, ‘‘मैं वसन्त!’’ मैं खीझ उठा, ‘‘कह तो दिया कि फिर आना।’’ उधर से जवाब आया ‘‘मैं बार-बार कब तक आता रहूँगा ? मैं किसी बनिये का नौकर नहीं हूँ; ऋतुराज वसन्त हूँ। आज तुम्हारे द्वार पर फिर आया हूँ और तुम फिर सोते मिले हो। अलाल, अभागे, उठकर बाहर तो देख। ठूँठों ने भी नव पल्लव पहन रखे हैं। तुम्हारे सामने की नीम प्रौढ़ा तक नवोढ़ा से हाव भाव कर रही है- और बहुत भद्दी लग रही है।’’ ![]()
मैंने मुँह उघाड़कर कहा, ‘‘भई, माफ करना, मैंने तुम्हें पहचाना नहीं। अपनी यही विडम्बना है कि ऋतुराज वसन्त भी आये, तो लगता है, उधारी के तगादेवाला आया। उमंगें तो मेरे मन में भी हैं, पर यार, ठण्ड बहुत लगती है।’’ वह जाने के लिये मुड़ा। मैंने कहा; ‘‘जाते-जाते एक छोटा सा काम मेरा करते जाना। सुना है तुम उबड़-खाबड़ चेहरों को चिकना कर देते हो; ‘फेसलिफ्टिंग’ के अच्छे कारीगर हो तुम। तो जरा यार, मेरी सीढ़ी ठीक करते जाना, उखड़ गयी है।’’
उसे बुरा लगा। बुरा लगने की बात है। जो सुन्दरियों के चेहरे सुधारने का कारीगर है, उससे मैंने सीढ़ी सुधारने के लिये कहा। वह चला आया।
मैं उठा और शॉल लपेटकर बाहर बरामदे में आया। हजारों सालों के संचित संस्कार मेरे मन पर लदे हैं; टनों कवि कल्पनायें जमी हैं। सोचा, वसन्त है तो कोयल होगी ही। पर न कहीं कोयल दिखी, न उसकी कूक सुनायी दी। सामने की हवेली के कंगूरे पर बैठा कौआ ‘काँव-काँव’ कर उठा। काला, कुरूप, कर्कश कौआ- मेरी सौन्दर्य भावना को ठेस लगी। मैंने उसे भगाने के लिये कंकड़ उठाया। तभी खयाल आया कि एक परम्परा ने कौए को भी प्रतिष्ठा दे दी है। यह विरहणी को प्रियतम के आगमन का संदेशा देने वाला माना जाता है। सोचा, कहीं यह आसपास की किसी विरहणी को प्रिय के आने का सगुन न बता रहा हो। मैं विरहणियों के रास्ते में कभी नहीं आता; पतिव्रताओं से तो बहुत डरता हूँ। मैंने कंकड़ डाल दिया। कौआ फिर बोला। नायिका ने सोने से उसकी चोंच मढ़ने का वायदा कर दिया होगा। शाम की गाड़ी से अगर नायक दौरे से वापस आ गया, तो कल नायिका बाजार से आने वाले सामान की जो सूची उसके हाथ में देगी, उसमें दो तोले सोना भी लिखा होगा। नायक पूछेगा, ‘‘प्रिये, सोना तो अब काला बाजार में मिलता है। लेकिन अब तुम सोने का करोगी क्या ?’’ नायिका लजाकर कहेगी, ‘‘उस कौए की चोंच मढ़ना है, जो कल सवेरे तुम्हारे आने का सगुन बता गया था।’’ तब नायक कहेगा, ‘‘प्रिये, तुम बहुत भोली हो। मेरे दौरे का कार्यक्रम यह कौआ थौड़े ही बनाता है, वह कौआ बनाता है जिसे हम ‘बड़ा साहब’ कहते हैं। इस कलूटे की चोंच सोने से क्यों मढ़ाते हो ? हमारी दुर्दशा का यही तो कारण है कि तमाम कौए सोने से चोंच मढ़ाये हैं और इधर हमारे पास हथियार खरीदने को सोना नहीं है। हमें तो कौओं की चोंच से सोना खरोंच लेना है। जो आनाकानी करेंगे, उनकी चोंच काटकर सोना निकाल लेंगे। प्रिये, यह बड़ी गलत परम्परा है, जिसमें हंस और मोर की चोंच तो नंगी रहे, पर कौए की चोंच पर सुन्दरी खुद सोना मढ़े!’’ नायिका चुप हो जायेगी। स्वर्ण-नियंत्रण कानून से सबसे ज्यादा नुकसान कौओं और विरहणियों का हुआ है। अगर कौए ने चौदह कैरट के सोने से चोंच मढ़ाना स्वीकार नहीं किया तो विरहणी को प्रिय
के आगमन की सूचना कौन देगा ?![]()
कौआ फिर बोला। मैं इससे युगों से घृणा करता हूँ; तब से, जब इसने सीता के पाँव में चोंच मारी थी। राम ने अपने हाथ से फूल चुनकर, उनके आभूषण बनाकर सीता को पहनाये। इसी समय इन्द्र का बिगडै़ल बेटा जयन्त आवारागर्दी करता वहाँ आया और कौआ बनकर सीता के पाँव में चोंच मारने लगा। ये बड़े आदमी के बिगड़ैल लड़के हमेशा दूसरों का प्रेम बिगाड़ते हैं। यह कौआ भी मुझसे नाराज है, क्योंकि मैने अपने घर के झरोखों में गौरेंयों को घोंसले बना लेने दिये हैं।
पर इस मौसम में कोयल कहाँ है ? वह अमराई में होगी। कोयल से अमराई छूटती नहीं है, इसलिये इस वसन्त में कौए की बन आयी है। वह तो मौकापरस्त है, घुसने के लिये पोल ढूँढता है। कोयल ने उसे जगह दे दी है। वह अमराई की छाया में आराम से बैठी है। और इधर हर ऊँचाई पर कौआ ‘काँव-काँव’ कर रहा है। मुझे कोयल के पक्ष में उदास-पुरातन प्रेमियों की आह भर सुनायी देती है, ‘‘हाय, अब ये अमराइयाँ यहाँ कहाँ हैं कि कोयलें बोलें। यहाँ तो ये शहर बस गये हैं और कारखाने बन गये हैं।’’ मैं कहता हूँ सर्वत्र अमराइयाँ नहीं हैं, तो ठीक ही नहीं हैं। आखिर हम कब तक जंगली बने रहते ? मगर अमराई और कुंज और बगीचे भी हमें प्यारे हैं। हम कारखाने को अमराई से घेर देंगे और हर मुहल्ले में बगीचा लगा देंगे। अभी थोड़ी देर है। पर कोयल को धीरज के साथ हमारा साथ तो देना था। कुछ दिन धूप तो हमारे साथ सहना था। जिसने धूप में साथ नहीं दिया, वह छाया कैसे बटाँएगी ? जब हम अमराई बना लेंगे, तब क्या वह उसमें रह सकेगी ? नहीं, तब तक तो कौए अमराई पर कब्जा कर लेंगे। कोयल को अभी आना चाहिये। अभी जब हम मिट्टी खोदें,
पानी सींचें और खाद दें। तभी से उसे गाना चाहिये।
कौआ फिर बोला। विरहणी की भावना का खयाल करके मैं सह रहा हूँ।
मैं बाहर निकल पड़ता हूँ। चौराहे पर पहली वसन्ती साड़ी दिखी। मैं उसे जानता हूँ। यौवन की एडी दिख रही है- वह जा रहा है, वह जा रहा है। अभी कुछ महीने पहले ही शादी हुई है। मैं तो कहता आ रहा था कि चाहे कभी भी ले, ‘रूखी री यह डाल वसन वासन्ती लेगी’ – (निराला)। उसने वसन वासन्ती ले लिया। कुछ हजार में उसे यह बूढ़ा हो रहा पति मिल गया। वह भी उसके साथ है। वसन्त का अंतिम चरण और पतझड़ साथ जा रहे हैं। उसने मांग में बहुत सा सिन्दूर चुपड़ रखा है। जिसकी जितनी मुश्किल से शादी होती है, बेचारी उतनी ही बड़ी मांग भरती है। उसने बड़े अभिमान से मेरी तरफ देखा। फिर पति को देखा। उसकी नजर में ठसक और ताना है, जैसे अंगूठा दिखा रही है कि ले, मुझे तो यह मिल ही गया। मगर यह क्या ? यह ठंड से काँप रही है और ‘सीसी’ कर रही है। वसन्त में वासन्ती साड़ी को कँपकँपी छूट रही है। ![]()
यह कैसा वसन्त है जो शीत के डर से काँप रहा है ? क्या कहा था विद्यापति ने- ‘सरस वसन्त समय भल पाओलि दछिन पवन बहु धीरे !’ नहीं मेरे कवि, दक्षिण से मलय पवन नहीं बह रहा। यह उत्तर से बर्फीली हवा आ रही है। हिमालय के उस पार से आकर इन बर्फीली हवाओं ने हमारे वसन्त का गला दबा दिया है। हिमालय के पार बहुत सा बर्फ जम रहा है, जिसमें सारी मनुष्य जाति को मछली की तरह जमाकर रखा जायेगा। यह बड़ी भारी साजिश है- बर्फ की साजिश ! इसी बर्फ की हवा ने हमारे आते वसन्त को दबा रखा है।
यों हमें विश्वास है कि वसन्त आयेगा। शैली ने कहा है- अगर शीत आ गयी है, तो क्या वसन्त बहुत पीछे होगा ? वसन्त तो शीत के पीछे लगा हुआ ही आ रहा है। पर उसके पीछे गरमी भी तो लगी है। अभी उत्तर से शीत-लहर आ रही है तो फिर पश्चिम से लू भी तो चल सकती है। बर्फ और आग के बीच में हमारा वसन्त फँसा है। इधर शीत उसे दबा रही है और उधर गरमी। और वसन्त सिकुड़ता जा रहा है।
मौसम की मेहरबानी पर भरोसा करेंगे, तो शीत से निपटते-निपटते लू तंग करने लगेगी। मौसम के इंतजार से कुछ नहीं होगा। वसन्त अपने आप नहीं आता, उसे लाया जाता है। सहज आने वाला तो पतझड़ होता है, वसन्त नहीं। अपने आप तो पत्ते झड़ते हैं। नये पत्ते तो वृक्ष का प्राण रस पीकर पैदा होते हैं। वसन्त यों नहीं आता। शीत और गरमी के बीच से जो जितना वसन्त निकाल सके, निकाल ले। दो पाटों के बीच में फँसा है, देश का वसन्त। पाट और आगे खिसक रहे हैं। वसन्त को बचाना है तो जोर लगाकर इन दोनों पाटों को पीछे ढकेलो- इधर शीत को, उधर गरमी को। तब बीच में से निकलेगा हमारा घायल वसन्त।
होली
मची है भारत में कैसी होली सब अनीति गति हो ली। ![]()
पी प्रमाद मदिरा अधिकारी लाज सरम सब घोली।।
लगे दुसह अन्याय मचावन निरख प्रजा अति भोली।
देश असेस अन्न धन उद्यम सारी सम्पत्ति ढो ली।।
लाय दियो होलिका बिदेसी बसन मचाय ठिठोली।
कियो हीन रोटी धोती नर नाहीं चादर चोली।
निज दुख व्यथा कथा नहिं कहिबे पावत कोउ मुँह खोली।
लगे कुमकुमा बम को छूटन पिचकारिन सो गोली।।
बह्यो रक्त छिति पंचदादिक मनहुँ कुसुम रँग घोली।
हाहाकार धधाक दसो दिसि मची प्रजा मति डोली।।
सत्य आग्रह डफ बजाय सब नाचत मिलि हमजोली।
असहयोग की अबिर उड़ावत आवत भरि भरि झोली।।
जय भारत कबीर ललकारत घूमत टोली टोली।
हिन्दू मुसलिम दोउ भाय मिलि कपट गाँठ हिय खोली।।
चले स्वराज राह तकि तजि भय, सकल विघ्न तृण छोली।
विजय पताका लै महात्मा गाँधी घर घर डोली।।
खेलिहौ कब लौं ऐसी ही बारह मासी फाग।
कुटिल नीति होलिका जल्यो, असंतोष की आग।।



























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