जिन शिक्षण संस्थानों में अपने बच्चों को दाखिला दिलवा कर माँ-बाप उनके सुनहरे भविष्य के सपने सँजोते हैं वे अब बच्चों के अन्दर कुंठाएँ भर रहे हैं। 18 जून को राजकीय इन्टर कॉलेज नैनीताल के छात्र अमित पाण्डे की खाई में गिर कर हुई मौत इस बात की पुष्टि करती है। इस घटना के लिए कॉलेज प्रशासन तो दोषी है ही, ज्यादा दोषी हमारी शिक्षा व्यवस्था है। मोटी पगार पाकर भी अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाह रहने वाले गुरुजनों का चरित्र भी इस घटना से नंगा होता है।
जिला सूचना कार्यालय, नैनीताल में चालक के पद पर कार्यरत तारादत्त पाण्डे का पुत्र अमित नवीं कक्षा का छात्र था। वह कक्षा 6 से आठ तक की कक्षाओं के सभी सैक्शनों में प्रथम पास होता आया और उसे छात्रवृत्ति मिलती थी। अध्यापक कहते हैं कि इस बीच वह कुसंगत में रह कर अनुपस्थित रहने लगा व दुर्व्यसनों का शिकार हो गया था। इस बात की जानकारी उसके अभिभावकों को दे दी गई थी। जबकि अमित के माता-पिता इस बात से अपने को अनभिज्ञ बताते हैं। अमित किसी दोस्त से 600 रुपए में एक मोबाइल खरीद कर लाया था। इस पर उसके पिता ने उसे फटकारा और मोबाइल लौटा कर रुपए वापस लाने को कहा। अमित ने मोबाइल तो वापस कर दिया लेकिन उसके रुपए उसे वापस नही मिले। 18 जून को वह स्कूल जाना नहीं चाहता था। मगर अगले दिन से कॉलेज का ग्रीष्मावकाश होने के कारण उसकी माँ ने उसे मना कर स्कूल भेज दिया और रुपए वापस मांग लाने को कहा। अमित को मोबाइल बेचने वाला दोस्त नहीं मिला। स्कूल भी वह कुछ देर से पहुँचा। फिर वह कब बलियानाले की ओर गया और कैसे वह खाई में गिरा इसकी भनक अध्यापकों को नहीं लगी। अलबत्ता अमित के साथियों द्वारा तल्लीताल थाने व सूचना कार्यालय को खबर दे देने के बाद पुलिस वालों के साथ भीड़ को बलियानाले की ओर जाते देख कुछ अध्यापक भी दौड़े, लेकिन उनके पहुँचने से पूर्व ही अमित को खाई से निकाल लिया गया था। एक अध्यापक की गाड़ी से उसे बी.डी. पाण्डे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। प्रधानाचार्य केसर राम के अस्पताल पहुँचने तक अमित का शव लाशघर में रख दिया गया था।
इस घटना से सारा नगर स्तब्ध रह गया। जिलाधिकारी शैलेश बगौली ने जिला शिक्षाधिकारी जीवन सिंह ह्यांकी को जाँच के आदेश दिए। अगले दिन शोकसभा के बाद विद्यालय में 30 जून तक का अवकाश हो गया। लेकिन कुछ अध्यापकों द्वारा अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण शोक सभा का बहिष्कार किया जिसकी जानकारी जिला शिक्षाधिकारी श्री ह्यांकी को थी। इसी बीच शिक्षाधिकारियों का पैनल (अपर शिक्षा निदेशक डॉ. कुसुम पन्त, संयुक्त शिक्षा निदेशक डॉ. डी.के. मथेला, जिला शिक्षाधिकारी जीवन सिंह ह्यांकी, ए.डी.ई.ओ. (माध्यमिक) नवीन पाठक) जाँच करने कॉलेज में पहुँचा तो वहाँ का दृश्य देख वे स्तब्ध रह गए। कॉलेज में अफरातफरी का माहौल था। कुछ अध्यापक एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हुए झगड़ रहे थे और कुछ बीचबचाव में लगे थे। उन अराजक गुरुजनों ने अपने अधिकारियों की भी न सुनी और पुलिस बुलानी पड़ी। अधिकारियों ने सभी कक्षाओं की उपस्थिति पंजिका जब्त कर प्रथम दृष्ट्या कॉलेज प्रशासन को दोषी ठहराते हुए प्रधानाचार्य केसर राम को खण्ड शिक्षाधिकारी के पद भार से मुक्त कर दिया। आपस में झगड़ रहे एल.टी. ग्रेट के शिक्षक धनंजय पाण्डे, उपस्थिति पंजिका में छेड़छाड़ करने के लिये कक्षाध्यापिका डॉ. दीपा मेहरा रावत तथा सहायक कक्षाध्यापक जीवन सिंह भंडारी का निलम्बन तथा भौतिक विज्ञान प्रवक्ता धरम सिंह भाकुनी व अंग्रेजी व्रवक्ता वी.के. राय के निलम्बन की संस्तुति की जो स्वीकृत कर दी गयी। लम्बे समय से कुंडली लगा कर जमे शिक्षकों की सूची तैयार करने के निर्देश भी दिये गये।
इस बीच कॉलेज में अवकाश होने के कारण न शिक्षक हैं और न छात्र। घटना से दुःखी कर्मचारी प्रधानाचार्य व शिक्षकों के बचाव की मुद्रा में हैं। प्रधानाचार्य केसर राम सितम्बर 2009 से ब्लॉक शिक्षा अधिकारी का दायित्व भी संभाले थे और प्रायः बाहर रहते थे। वे बताते हैं कि घटना के दिन वे भीमताल गये थे और इस दुर्घटना की खबर पाकर तत्काल वापस लौटे। मीडिया में एकतरफा खबरें आने से वे व्यथित हैं।
एक शानदार इतिहास रखने वाले राजकीय इंटर कॉलेज की दुर्दशा की चर्चाएँ लम्बे समय से थीं। अब एक होनहार बच्चे की जान चली जाने के बाद सब कुछ उजागर हो गया है। नैनीताल की जनता इस घटना से क्षुब्ध है। अध्यापकों की गुटबाजी व अनुशासनहीनता उच्चाधिकारियों व मीडिया के सामने ही खुल गई। तमाम लोगों से बातचीत कर यह राय बनी है कि यह कॉलेज एक ऐसा व्यापारिक प्रतिष्ठान बन गया है, जहाँ कोई कायदे-कानून नहीं बचे। बस पैसा कमाने की होड़ है। शिक्षण कक्ष पान पराग, गुटखा आदि के रैपर, जगह-जगह पर पीक आदि के कारण जानवर बाँधने के गौशाले मालूम पड़ते हैं। पढ़ाई के समय छात्र हनुमानगढ़ी, बलियानाला, बाजार, आदि क्षेत्रों में आवारागर्दी करते हुए धूम्रपान करते हैं या इंक रेजर, फेबिबॉड, आयोडेक्स आदि को सूँघते हुए नशा करते हैं। इन पर न गुरुजनों का अंकुश है, न अभिभावकों का। सेवानिवृत्ति के नजदीक और किसी का बुरा न बनना चाहने वाले सीधे-सादे प्रधानाचार्य खंड शिक्षा अधिकारी का अतिरिक्त चार्ज संभालने के कारण कॉलेज की दुर्दशा से नजर फेरे रहे। कुछ अध्यापक पढ़ाते तो ठीक-ठाक हैं, लेकिन वे कब स्कूल आयेंगे और कब अवकाश पर चले जायेंगे, इसका पता ही नहीं रहता। कुछ अध्यापक स्कूल में चॉक को हाथ नहीं लगाते, लेकिन उनके घरों में ट्यूशन के लिये बाकायदा ब्लैकबोर्ड लगे हैं। कोई हथियार बेचता है तो कोई वृत्ति करता है, और कोई यात्री ढोता है। इनके बच्चे शायद ही इस या अन्य सरकारी स्कूल में पढ़ते हों। वे प्रायः महंगे पब्लिक स्कूलों के गेट पर दिखाई देते हैं। इस गुटबाजी के बीच ईमानदार कर्मचारी-शिक्षक अपने को असहाय महसूस करते हैं।
अभिभावक संघ के अध्यक्ष जगदीश बहुगुणा कहते हैं कि वे संघ की बैठकों में कॉलेज की दुर्दशा, छात्रों में बढ़ती अनुशासनहीनता, आवारागर्दी तथा नशाखोरी की शिकायत कर चुके थे। अभिभावक संघ के खर्चे से गेट बनाने का उनका सुझाव भी नहीं माना गया। कुछ अध्यापकों का मानना है कि अभिभावक लापवाह हैं, बच्चों की निगरानी नहीं करते। अभिभावक संघ की बैठकों में नहीं आते, अलबत्ता कभी किसी बच्चे को डाँट पड़ गयी तो लड़ने जरूर आ जाते हैं। मगर यह आरोप इसलिये दमदार नहीं है कि कोई भी अभिभावक स्कूल भेजकर अपने बच्चे को आवारा नहीं बनाना चाहता। हकीकत यह है कि अभिभावक की सुनी ही नहीं जाती। वह तो शिक्षकों से डरा रहता है कि शिकायत करने पर कहीं उसके बच्चे को फेल न कर दे। जब अध्यापकों का व्यवहार बच्चों के अनुकूल नहीं रहा होगा तभी तो वह तनावग्रस्त होकर नशे की शरण में जाते होंगे।
जी.आई.सी. नैनीताल में प्रवक्ता के 21 पदों में से 5 रिक्त हैं। इनमें संस्कृत अध्यापक का निधन हो गया, हिन्दी व नागरिक शास्त्र के अध्यापक सेवानिवृत्त हो चुके और हिन्दी के एक और अध्यापक की पदोन्नति हो गई है। निलम्बित किए गए अध्यापक धनंजय पाण्डे की शिकायत मिलने पर उनको रा.उ.मा.विद्यालय नौकुचियाताल से इस कॉलेज में स्थानन्तरित किया गया था। 10 अध्यापक उत्तर प्रदेश कैडर के हैं। एक अब रुद्रपुर के निवासी बन गए हैं।
जब नैनीताल स्थित ऐतिहासिक राजकीय इण्टर कॉलेज की यह दुर्गत है तो उत्तराखण्ड के दूरस्थ क्षेत्रों के स्कूलों की क्या स्थिति होगी, यह सहज समझा जा सकता है। जब से साक्षरता, सर्व शिक्षा अभियान का ढोल पीटा जाने लगा, सरकारी स्कूली पढ़ाई तो चौपट हो गयी है। रचनाशील व अच्छे शिक्षकों को सर्वशिक्षा अभियान में शामिल कर उनको उनके मुख्य दायित्वों से विरत कर दिया गया है और पढ़ाई-लिखाई सब कागजी आँकड़ो में सिमट कर रह गयी है। गुटबाजी और राजनीतिक दबदबा भी लगातार बढ़ रहा है। स्थानान्तरण रुकवाने और शहरी अथवा सुगम स्थानों में अड़े रहने के लिए राजनीतिक प्रभाव और रिश्वत आम है। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा सभी के यही हाल हैं। ऐसे में पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों का भविष्य कैसा होगा ? पहले कम पैसा था, सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन शिक्षक लगन और ईमानदारी से पढ़ाते थे। अब छठे वेतनमान की भारी-भरकम तनख्वाह पाने के बावजूद भी अधिकांश अध्यापक संतुष्ट नहीं हैं और तमाम तरह के धंधों में लिप्त रहते हैं। शिक्षण कार्य मात्र एक धंधा बन कर रह गया है। धन लगाओ शिक्षा पाओ। इन स्कूल-कॉलेजों पर नियंत्रण रखने वाले शिक्षाधिकारी कागजी आँकड़ों में गोड़गाड़ करने में व्यस्त हैं। हमारे जन प्रतिनिधियों को इस ओर ध्यान देने की फुर्सत नहीं है। इस शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिये समाज को ही संगठित और सक्रिय होना पड़ेगा।



























उत्तराखण्ड बनते ही अध्यापकों का आयात होना शुरु हुआ, जो कभी चाय की दुकान थी, वह बी०एड० कालेज बन गये। आनन-फानन में कुछेक हजार खर्च कर बी०एड० की डिग्री लेकर नौकरी पाये मुंशियों से आप शैक्षणिक माहौल और नैतिकता की अपेक्षा कर भी कैसे सकते हैं?