सतीश जोशी
21 अगस्त की रात सुशीला तिवारी अस्पताल में मैं, हीरा भाभी (गिरदा की पत्नी), राजकुमारी चंद (रज्जोदी), कुणाल (गिरदा का भतीजा) और गिरदा की बहू प्रभा (पिरम की पत्नी) थे। गिरदा आपरेशन के बाद अपनी चेतना में नहीं लौट पाये थे। सुबह पाँच बजे मैंने महिलाओं से सो जाने को कहा और कुणाल के साथ गिरदा के पास अन्दर आई.सी.सी.यू. में आ गया। गिरदा वैण्टिलेटर पर थे और लम्बी साँसें ले रहे थे। उन्हें बेहद तकलीफ हो रही थी। बैड से लगे मॉनीटर पर उनके रक्तचाप और पल्स रेट सामान्य नहीं हो पा रहे थे। रज्जोदी वार्ड के अन्दर आती-जाती रहती। प्रातः छः बजे मैंने शेखरदा और शमशेरदा को फोन पर खबर दी कि गिरदा की हालत अच्छी नहीं है और मैं घर आ गया। अपने दैनिक कार्य निपटा कर फिर अस्पताल जाने को था कि प्रमोद साह (गीत एवं नाटक प्रभाग) ने फोन पर रोते-बिलखते सूचना दी कि गिरदा नहीं रहे।
गिरदा के साथ सनीव्यू, कैलाखान नैनीताल में 14 वर्षों का साथ रहा था। एक-एक छोटी-बड़ी घटना याद आ रही है। परन्तु वह सब कुछ अभी लिखा नहीं जा सकता। इस वक्त तो बरबस गिरदा का फैज की यह नज्म गुनगुनाना बेहद याद आ रहा है-
जिस धज़ से कोई मकतल में गया
वो शान सलामत रहती है.
ये जान तो आनी-जानी है,
इस जान की तो कोई बात नहीं।
इसकी धुन भी उसने बेहद मार्मिक बनाई थी।
3 जनवरी 1988 को ‘जागर-4’ पुस्तिका राजहंस प्रेस से छप कर बाहर आई। ‘जागर’ के सभी साथियों को गले लगा कर गिरदा ने पदयात्रा के लिए विदा किया। पदयात्रा नैनीताल से श्यामखेत, रामगढ़, भटेलिया, जैंती, शहरफाटक, मोरनौला, देवीधुरा, लमगड़ा, खेतीखान, लोहाघाट, चम्पावत और टनकपुर के दूरदराज के गाँवो से हो कर निकलनी थी। जागर के साथी निर्मल जोशी, दिनेश उपाध्याय, तरुण जोशी, जीवन बहुगुणा, अमर प्रकाश, रघु तिवारी और अन्य स्थानों से भी अनेक साथी जुड़ते जाते थे। यह मेरी पहली पदयात्रा थी, जिससे मैंने बहुत कुछ सीखा और अपने को और अधिक मजबूत पाया। पदयात्रा से लौटने के बाद हम ‘जागर’ साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था के बारे में निरन्तर कुछ बेहतर करने की सोचते रहते।
उन दिनों गिरदा और भाभी गायत्री निवास में रहा करते थे। कुछ ही माह पूर्व उनका विवाह हुआ था। 1988 के अक्टूबर में गिरदा गायत्री निवास छोड़ कर सनीव्यू, कैलाखान आ चुके थे। मैं तब प्रेमालय स्टोनले में रहा करता था। तभी गिर्दा के आग्रह पर मैं और दिनेश उपाध्याय एवं चंपा भाभी भी कैलाखान वाले घर में आ गये थे। हम लोग कैलाखान में सुबह-शाम जब भी एकत्रित होते जागर की नई गतिविधियों के बारे में चर्चा करते। नुक्कड़-नाटक, जनगीत, पोस्टर एवं अन्य गतिविधियां चलती रहती नैनीताल और भवाली के नन्दादेवी मेले में जागर सांस्कृतिक जुलूस निकालता तो वहीं दूसरी ओर राजनैतिक घटनाक्रम पर भी अपनी अभिव्यक्ति देता। अनेक क्रियाकलापों के चलते जागर में नये साथी जुड़ गये थे। जागर के साथियों ने उमेश डोभाल की हत्या के बाद एक तरह से जन-जागृति का मोर्चा ही सम्भाल लिया था। स्वामी मनमथन और उमेश डोभाल के हत्यारों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलवाने के उद्देश्य से जागर द्वारा नैनीताल से पौड़ी तक की कई यात्रायें की र्गइं। गिरदा हम लोगों के साथ नुक्कड़-नाटकों की तैयारी में तल्लीनता से लगा रहता और कभी-कभी झल्ला कर कहता, तुम लोगों के साथ सर खपाना फिजूल है। फिर सामान्य होकर हमें रंगमंच और नुक्कड़ नाटकों के अन्तर को समझाते हुए कहता, भुला नुक्कड़ नाटक सही माने में रंगमंच से भी कठिन है, क्योंकि नुक्कड़-नाटकों का दर्शक तुम्हारे ठीक सामने खड़ा रहता है। जबकि रंगमंच पर प्रदर्शित होने वाले नाटकों और दर्शकों के बीच कुछ फासला रहता है……..।
उस बीच गिर्दा के साथ मिलकर हम लोगों ने ‘राजा के सींग हैं, ‘आये चुनाव-गये चुनाव‘ तथा रामनाथ सिंह ‘अदम‘ गौण्डवी की कविता ‘चमारों की गली‘ का मंचन तथा कई जनगीत तैयार किये थे। ![]()
कुछ वर्षो तक नैनीताल में ‘युगमंच’ और ‘जन संस्कृति मंच’ के बैनर तले नुक्कड़-नाटक महोत्सव हुआ करता था। दूर-दराज से अनेक टीमें आया करती थीं। एक ही दिन में कई-कई नुक्कड़ होते थे। ‘जागर’ की भी नुक्कड़-नाटकों में भागेदारी होती थी। जाहिर सी बात है कि साथी कुछ नया करने की सोचते। उसी दौरान हरिवंशराय बच्चन का लिखी एक कविता गिरदा के हाथ लग गयी। गिरदा कई दिनों तक उसकी धुन बुनता और खारिज करता रहा। अन्ततः एक दिन गिरदा ने ढोलक में पारंगत एक साथी को घर पर बुलाया। उन्हें समझाया कि कैसे ढोलक बजना है। फिर क्या था ? यह प्रभावशाली कोरस तैयार हो गया:-
‘‘अब्बर देवी जब्बर बकरा तागड़ धिन्ना नागर बेल
गांधी की आंधी आयी थी, बीते लगभग बरस पचास
अपने साथ सपन लायी थी, सब कुछ होगा सबके पास
वादों की लादी भर जनता आज रही है कांधों झेल
अब्बर देवी……’’
‘जागर’ परिवार में बहुत से साथी जुडते़ गये। संजय भारती संगीत के क्षेत्र में अच्छी जानकारी रखता था। गिरदा उसे पाकर उत्साहित हो गया। वह उसे जो धुन सिखाता, संजू उसे पकड़ लेता था। ‘जागर’ के बारे में सुबह-शाम कैलाखान में चर्चा होती रहती। कोई नई रचना के फूटने या फिर नई धुन के बन जाने पर गिरदा नीचे से लम्बी सी आवाज लगाता और हम धड़-धड़ कर गिरदा के कमरे पर पहुँच जाते थे।
शैले हॉल में 18 एवं 19 अगस्त 1989 को जागर के साथियों ने दो दिवसीय बातचीत एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया था। उत्तराखण्ड के अलावा देश के अनेक हिस्सों से कई संस्कृतिकर्मियों एवं चिंतकों ने उसमें अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस आयोजन में गिरदा ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘रामसिंह’ का मंचन करवाया था। दर्शकों द्वारा इसे बेहद सराहा गया था। फिर तो ‘रामसिंह’ का मंचन कई स्थानों पर हुआ। इसकी उधेड़बुन में गिरदा को लगभग एक हफ्ते का समय लग गया था। किसी भी रचना के परिपक्व होने तक वो निरंन्तर उसी में डूबा रहता था। उसके चिंतन-मनन और कार्यशैली की बात ही कुछ और थी। किसी रचना पर निर्णय को लेने से पूर्व अक्सर कहा करता- ‘‘भुला एक रात सिरहाने रखने का वक्त तो दे।‘‘
21 अगस्त की उस रात अस्पताल में मैंने गिरदा से खूब बातें कीं। पर गिर्दा मौन था। हालाँकि लगता था कि ठीक होगा और फिर गुनगुनाएगा।