मंजूर हुसैन
लगभग 1978-79 की बात होगी। इलाहाबाद में नाट्य महोत्सव था। मैं सांस्कृतिक मंच, वेधशाला की टीम से दीप पंत और हरीश राणा इत्यादि के साथ मोहन चन्द्र जोशी द्वारा निर्देशित ‘उत्तर युद्ध’ के प्रदर्शन के लिये गया हुआ था। नैनीताल के गीत एवं नाट्य प्रभाग का दल भी आया हुआ था। रात के भोजन के समय कुर्ता, पैजामा पहने तथा कंधे पर एक झोला लटकाये एक व्यक्ति उपस्थित हुआ। खाना लेने के उपरान्त वह व्यक्ति जमीन पर बैठ गया। किसी ने पूछा, ‘कुर्सी ला दूँ ?’ उस व्यक्ति का उत्तर था, ‘‘जमीन का आदमी हूँ, इसी मिट्टी में मिल जाना है बबा।’’ मैंने दीप पंत जी से पूछा, ये कौन है ? उन्होंने कहा ये गिर्दा हैं गिर्दा…। गिर्दा से ये पहली मुलाकात थी।
1981-82 में अनिल पंत जी ‘कबिरा खड़ा बाजार में’ करवाया जाना तय हुआ। दीप पंत जी के साथ मैं कई लोगों के पास गया। एक दिन नैनीताल क्लब के पास, चीना बाबा मंदिर के सामने गिर्दा के निवास पर भी जाना तय हुआ। एक छोटे से कमरे में तीन लोग थे। गिर्दा, राजा और एक बच्चा (जो आज प्रेम ‘पिरम’ के नाम से जाना जाता है)। शाम का समय था। ‘कैसे आये दीप ?’ गिर्दा ने प्रश्न किया। दीप पन्त जी द्वारा अपने आने का मकसद बताया गया। गिर्दा ने नींबू का रस अपने गिलास में डाला और गिलास खत्म करने के बाद थोड़ी देर मौन रहे। फिर बोले, ‘‘गलत आ गये डियर…।’’ थोड़ा रुक कर फिर बोले, ‘‘एक काम करो यार…… कबीर को मंच पर मत लाओ। तब तो बात है।’’ उस समय उनका उत्तर बड़ा अटपटा लगा, क्योंकि कबीर को हटाने के उपरान्त नाटक में बचता ही क्या ? लेकिन आज बात समझ आती है कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा होगा। कबीर को आज की परिस्थितियों में ढूँढना ?
उनके काम की लगन की एक और याद मेरे जेहन में है। बनारस में राजीव कटियार द्वारा निर्देशित फिल्म ‘वसीयत’ की शूटिंग थी। गिर्दा जनार्दन जोशी के चरित्र का अभिनय कर रहे थे। फिल्म के अंतिम दृश्य में गिर्दा को तोते का पिंजरा लेकर घाट पर घूमना था। सैट तैयार होने के उपरान्त राजीव ने कहा, ‘‘टेक करेंगे गिर्दा।’’ गिर्दा बोले, ‘‘पहले रिहर्सल ले लो भई।’’ राजीव ने कहा, ‘‘गिर्दा ! आपको कुछ नहीं करना है, सिर्फ यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ तक आना है और जब तोता कहेगा कि तुम बुद्धू हो तब अपनी प्रतिक्रिया देनी है…।’’ ‘‘न बबा पहले रिहर्सल जरूर करा लो। मैं ऐक्टर नहीं हूँ भाई।’’ आखिर में राजीव को रिर्हसल करानी पड़ी। इस घटना से उनकी ईमानदारी, मेहनत तथा कार्यप्रणाली का उदाहरण मिलता है।
उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके द्वारा गाये गये गीत आज भी हमारे मन-मस्तिष्क में जिन्दा हैं। नैनीताल समाचार द्वारा आंदोलन के दौरान किये गये ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ में गिर्दा की भागीदारी और ‘‘जैंता एक दिन तो आलो, उदिन यो दुनि में..’’ कभी भुलाये नहीं जा सकते। गिर्दा के बारे में ज्यादा बोलना मेरे लिये ‘छोटा मुँह बड़ी बात’ वाली कहावत हो जायेगी। परन्तु मैं ये जरूर कहना चाहूँगा कि गिर्दा लोक मंच को जो आयाम दे सकते थे, उसके लिये उन्हें पर्याप्त मौके नहीं दिये गये। सवाल है कि एक नाट्य संस्था का संस्थापक सदस्य होने के उपरान्त उन्हें दूसरी संस्था ‘जागर’ की स्थापना क्यों करनी पड़ी ? ‘जागर’ संस्था से किये गये नाटक ‘राजा के सींग’, ‘राम सिंह’ और ‘आये चुनाव गये चुनाव’ आदि उनके नाट्य रुझान को और पुख्ता करते हैं। इससे पूर्व उनके द्वारा नाट्य रुपान्तरित, निर्देशित नाटक ‘नगाड़े खामोश हैं’, ‘धनुष यज्ञ’, ‘अंधेर नगरी’ इत्यादि नाटक हमें हमेशा उनकी याद ताजा कराते रहेंगे। मुझे याद है जब 1982 में डॉ. अनिल पंत ने एकायन छोड़ ‘युगमंच’ की दूसरी कलायात्रा शुरू की, गिर्दा को हम बहुत सारे लोग उस मंच पर ढूँढते रहे। परन्तु गिर्दा वहाँ बहुत बड़े अंतराल तक नहीं मिले। उनसे बात करने पर पता चलता था कि उनका मन तो बहुत करता था बात करने के लिये। परंतु छोड़िये, गिर्दा गये……..बात गई। आज गिर्दा के चाहने वाले बहुत सारे लोग हैं। परंतु जो गिर्दा का स्वर्णिम समय था, विभिन्न कारणों से रंगमंच को बहुत सारे आयाम देने से वंचित कर गया। इसकी भरपाई अब चीखने-चिल्लाने या दिखावा करने से नहीं हो सकती। गिर्दा को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिये गिर्दा के विचारों को ही आगे बढ़ाना जरूरी है। किसी ने कुछ कहा। किसी ने कुछ किया। परंतु गिर्दा की अंतिम यात्रा हमें ये संदेश तो दे ही गई कि गिर्दा को जननायक बनने से कोई नहीं रोक सका।