गिरदा का जाना एक शून्य का अहसास कराता है, एक ऐसा खालीपन जिसे कोई और नहीं भर सकता, चाहे कोई लोकगायक होने का कितना ही बड़ा तमगा लटकाये क्यों न घूमे। गिरदा ने जीवन में कभी कोई समझौता अपने निहित स्वार्थ के लिए नहीं किया, और न अपनी वैयक्तिक कुंठा का शिकार दूसरों को बनाया। गिरदा वास्तव में जन का कवि था, जन-जन का अपना था। जो भी उससे मिला, कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। ऐसा अपनापन था उसमें। गिरदा के जनगीत, कविताएँ एवं विचार एक जगह समेट पाना संभव नहीं है। फिर भी ‘गिरदा कहता है…..’ में उनके जनगीतों, कविताओं और विचारों को एक संक्षिप्त संग्रह में समेट कर उनके समूचे व्यक्तित्व को उन सबके लिए प्रस्तुत किया गया है, जो उन्हें नहीं जानते थे, जो उनके करीबी थे, जानने वाले थे- अपने थे। उन सबके लिए यह गिरदा की बहुमूल्य धरोहर है।
संपादन का दायित्व निभाने वाली समस्त गिरदा टीम ने उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को जीवंत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। गिरदा को जानने-समझने के लिए नवीन जोशी, राजीव लोचन साह, शमशेर सिंह बिष्ट, शेखर पाठक, संजय विजयवर्गीय के साथ-साथ ‘विचारों में गिर्दा’ में हरीश पंत, नन्द किशोर हटवाल, उमा भट्ट, रमदा, हरीश चंदोला, धरमवीर परमार और वीरेन डंगवाल के आत्मीयता भरे विचारों के साथ आत्मसात करना होगा। प्रकाशकीय वक्तव्य में उमेश डोभाल स्मृटि ट्रस्ट के अध्यक्ष गाविन्द पंत राजू ने जो कहा है……‘गिरदा कहता है, गिरदा हमेशा कहता रहे और हम सबके भीतर अनेक गिरदा पैदा होते रहें…। पुस्तक गिरदा को जानने-समझने तथा उनके सपनों को सच करने का रास्ता बताती है- निश्चित रूप से यह पुस्तक उन सबके लिए मार्गदर्शक बनी रहेगी जो वास्तव में वो गिर्दा हैं जो तूफानों में दिये जलाते हैं…. के पक्षधर हैं।
संपादन टीम ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ इस कार्य को कर गिरदा को जीवंत बनाये रखने का भरपूर प्रयास किया है। उनके जन गीत-कविताएँ झकझोरते हैं और उन लोगों के चेहरों से नकाब उतारते हैं जो समाज को अपनी करतूतों से पीछे धकेलने की साजिश रचते आ रहे हैं। राम भक्त, देशभक्ति, हैलो खबर है तुम्हें, देश की हालत अट्टा-बट्टा, और कैकी बबैकि डर पड़ें, आज हिमाल तुमनकै धत्यूंछों, मेरि कोसि हरै गे कोसि से लेकर कैसा हो स्कूल हमारा में गिरदा की चिंता, बैचेनी और गुस्सा एक साथ दीखते हैं। हरीश पंत/योगेश पंत की मेहनत की सार्थकता इस पुस्तक में साफ झलकती है।
गिरदा कहता है (गिरदा के जनगीत, कविताएँ एवं विचार) / प्रकाशक: उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट, पौड़ी/ मूल्य: पेपरबैक 75 रु. सजिल्द 150 रु.
- देवेन्द्र उपाध्याय