यह समागम गिर्दा के बहाने ही संभव था। साहित्य, संगीत, रंगमंच और अन्य विविध कलाकर्मों में दखल के साथ ही जनपक्षीय राजनीति में भी सक्रिय रहे गिर्दा ही इनसे जुडे़ उत्तराखंड के महत्वपूर्ण लोगों को साथ जुटा सकते थे। सो ‘पहाड़’ के बैनर तले ये लोग गिर्दा को याद करने 23 और 24 दिसम्बर को नैनीताल में जुटे। ‘गिर्दा के बाद: गिर्दा की याद’ नाम से यह दो दिवसीय आयोजन इसलिए था कि गिर्दा को उनके मूल व्यक्तित्व और उनके होने के सही मायनों के साथ लगातार कैसे याद किया जा सके, इस बारे में कुछ बात हो।
आयोजन के पहले दिन पूर्वार्द्ध में परमा शिवलाल दुर्गा साह धर्मशाला में उत्तराखंड की विविध लोक कलाओं का बेहद प्रभावशाली मंचन ‘माटी से मंच तक’ नाम से महिला समाख्या द्वारा खोजी गई अब तक औपचारिक सार्वजनिक मंचों से अपरिचित ग्रामीण महिला कलाकारों ने किया। इसके बाद बच्चे, युवाओं, और बुजुर्ग महिला-पुरुषों का एक बड़ा जुलूस गिर्दा के गीतों को गाता हुआ मालरोड से होता हुआ ‘नैनीताल क्लब’ पहुँचा, जहाँ पर गिर्दा के गीतों, गिर्दा पर महिला समाख्या द्वारा तैयार नाटक ‘गिर्दा तुझे सलाम’ और प्रदीप पांडे के निर्देशन में बनी डॉक्यूमेंट्री ‘सलाम गिर्दा’ का मंचन किया गया। गिर्दा के कुल जमा लेखन के दो जिल्दों में ‘पहाड़’ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।
दूसरा पूरा दिन इस चर्चा का रहा कि आगे के दिनों में गिर्दा को किन अर्थों में कैसे याद किया जाये। टी.आर.सी. मल्लीताल के सभागार में मौजूद लोक संगीत, साहित्य, कला, रंगमंच, पत्रकारिता आदि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े तकरीबन 50-60 लोगों ने गिर्दा के ही तकिया कलाम ‘मेरी बात सुनी जाय मानी भले ना जाए’ की तर्ज पर अपनी बातें रखी। गिर्दा के करीबी मित्र रहे चित्रकार विशम्भर नाथ साह ‘सखा’ ने गिर्दा के बहाव को महसूस करने की अपील की। उन्होंने कहा कि गिर्दा को पूजने की कोई जरुरत नहीं है बल्कि जरूरी है कि उन्हें आत्मसात किया जाये। उन्होंने कहा कि गिर्दा को नींबू के काँटे की तरह याद करते रहने की जरूरत है जो बार-बार चुभकर आपकी दिशा को सचेत करता रहे। उलोवा के अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि गिर्दा हमारे दौर की सबसे सजग राजनीतिक शख्सियत थे। उन्हें एक कवि और गीतकार के रूप में स्वीकारने के साथ यह जानना भी जरूरी है कि वह वामपंथी क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थक थे। 1978 की एक मीटिंग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि, ‘गिर्दा समेत उस वक्त उत्तराखंड के हम अनेक युवाओं ने इस मीटिंग में प्रस्ताव पारित किया था कि भारत की अर्धसामन्ती, अर्धऔपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन की जरूरत है।’ माओवादी होने के आरोप में लंबे समय तक जेल में रहे पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रशान्त राही ने कहा कि गिर्दा एक धारा थे, जिसे समझने की जरूरत है। वे गैरसैंण में आंध्र प्रदेश के क्रांतिकारी कवि व रंगकर्मी ‘गदर’ के साथ एक आयोजन करना चाहते थे। वे उत्तराखंड की सीमाओं को तोड़कर देश भर के क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़ना चाह रहे थे। कवि और संस्कृतिकर्मी कपिलेश भोज ने कहा कि गिर्दा का सपना एक समतामूलक समाज की स्थापना करने का था, जिसके लिये उन्होंने कई स्तरों पर जोखिम उठाए। उन्होंने कहा कि गिर्दा को सार्थक ढंग से याद करने के लिए ऐसे सांस्कृतिक संगठन बनाए जाने की जरूरत है। गिर्दा स्वयं ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस करते थे।
लगभग 40 वर्ष तक गिर्दा के अत्यन्त करीबी रहे ‘हिन्दुस्तान’ के सम्पादक नवीन जोशी ने कहा कि गिर्दा की रचनाओं पर कॉपीराइट जैसा कुछ नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी रचनाओं को छोटी-छोटी, अनेक जिल्दों में सस्ती कीमतों पर प्रकाशित करना चाहिए। कवि महेश चंद्र पुनेठा ने भी उत्तराखंड में प्रतिबद्ध साहित्यकारों व संस्कृतिकर्मियों आदि का संगठन बनाये जाने पर जोर दिया। पॉलीथीन बाबा प्रभात उप्रेती ने कहा कि गिर्दा को सच्चे ढंग से याद करना तब ही संभव है, जब आप अपनी-अपनी क्षमताओं के हिसाब से छोटे-छोटे जन आंदोलन पैदा करें, उनमें शामिल हों। गिर्दा को गोष्ठियों-सेमिनारों में समेटना काफी नहीं है। रंगकर्मी श्रीश डोभाल और डी. एन. भट्ट का सुझाव था कि गिर्दा को लम्बे समय तक याद करते रहने के लिए व्यावहारिक यही होगा कि उनके नाम से संस्थानों, पुरस्कारों आदि की शुरूआत हो और विश्वविद्यालयों में गिर्दा के नाम से कार्यक्रम आदि हों। इसी क्रम में कुछ वक्ताओं ने कहा कि गिर्दा की कविताओं को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाय, गिर्दा के नाम पर एक ट्रस्ट का निर्माण हो जो हर साल सांस्कृतिक आयोजन करवाए। एक सुझाव यह भी था कि गिर्दा के नाम पर भोपाल स्थित भारत भवन सरीखा कोई कला-संस्कृति केंद्र बनाया जाये। अंत में इन सुझावों का स्वागत करते हुए ‘पहाड़’ के संपादक शेखर पाठक ने सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि इन सुझावों से ठोस निष्कर्ष पर पहुँच कर उन्हें कार्यरूप देने के लिए भी सभी लोगों को आगे इसी तरह जुटना होगा। इस सभा में राजीव लोचन साह, थ्रीश कपूर, सविता मोहन, गोपाल दत्त भट्ट, कैलाश लोहनी, मथुरा दत्त मठपाल, उमा भट्ट, गीता गैरोला, बी. मोहन नेगी, भास्कर उप्रेती, अभिषेक श्रीवास्तव, आदित्य, हेम मिश्रा, हरीश पाठक, शीला रजवार, बसंती पाठक, प्रीति थपलियाल, भानुप्रकाश, कुलदीप, राजेश, आदि लोग मौजूद थे। आयोजन में नैनीताल समाचार, उत्तरा महिला पत्रिका, युगमंच, उत्तराखंड भाषा संस्थान और बी. डी. उनियाल पर्वतीय चेरिटेबल ट्रस्ट का सहयोग रहा।