गिर्दा से लगाव-जुड़ाव रखने वाले की फेहरिस्त जितनी लंबी है, उन्हें याद करने या याद रखने के कारण भी उतने ही हैं। राजीवदा ने लगभग महीना भर पहले एक मीटिंग बुलाई, यह सोच कर कि 22 अगस्त को जूलूस जैसा कुछ निकालकर बरसी मना लेंगे, पर कुल मिलाकर एक फॉलोअप मीटिंग और करनी पड़ी जिसमें जुलूस के साथ मंच के भी कुछ कार्यक्रम शामिल हो गये। गिर्दा आखिर नाटकों के आदमी थे। इस मीटिंग में हुआ तो कुछ ऐसा कि शेखर दा, गीत नाटक प्रभाग के कलाकार, महिला समाख्या की बहनें और बाकी रंगकर्मी गिर्दा से जुड़े संस्मरण सुनाने लगे ….दिलों में यह आयोजन नही, मलाल जो था। दरअसल ऐसे कईं आयेाजनों का सूत्रधार, जिसके बूते पूरा कार्यक्रम ठेल दिया जाये, खुद गिर्दा आज अनुपस्थित थे। सो किसी प्रकार दो पन्नों की रूपरेखा बनाई गई जिसके आधार पर आगे चलकर 4-5 दिन का कार्यक्रम तय हुआ। इसका बैनर ‘गिरदा तुझे सलाम’ और संयोजक ‘गिर्दा के संगी साथी’ तय किए गए। लुब्बोलुबाब ये कि पहले उमुक आई फिर थोड़ा जोश और फिर थोड़ी कठिनाई। रिहर्सल की परेशानी के बीच तैयारी शुरू हो गई।
19, 20 अगस्त को शैले हॉल में ‘युगमंच’ द्वारा नैनीताल नगर में गिरदा की स्मृति में कार्यक्रम शुरू कर दिये गये। मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह‘ के नाट्य रूपातंरण में नए-पुराने कलाकारों, धरमबीर परमार, जितेन्द्र बिष्ट, अनिल घिल्डियाल, मदन मेहरा, कमल जोशी, दीपक सहदेव, आरती, संजय, पवन आदि ने मँझा हुआ अभिनय किया। दयाकृष्ण शर्मा ने 34 वर्ष पूर्व गिरदा के साथ किये ‘नगाड़े खामोश हैं’ के संवाद और ‘अंधेर नगरी’ का अभिनय पहले जैसी जीवन्तता के साथ प्रस्तुत कर मंत्रमुग्ध कर दिया। 21 अगस्त को ‘बड़े भाई साहब’ का मंचन अनवर और जावेद ने किया तो मदन मेहरा ने बड़के भैया प्रस्तुतियाँ दीं। भुवन बिष्ट ने ‘रंगभूमि’ के बैनर तले कुछ छोटे बच्चों को, कि वे ही भविष्य के गिर्दा होंगे, को तैयार कर एक अच्छी प्रस्तुति दी। महिला समाख्या की सरोजनी, मुन्नी, सरस्वती, पुष्पा, हीरा, प्रेमा आदि बहनों ने गिरदा के जनगीतों को जोड़कर एक नाट्य प्रस्तुति दी। 23 अगस्त को ‘मंच’ ने सुरेन्द्र वर्मा के नाटक ‘शकुन्तला की अगूंठी‘ का पु
नर्मंचन किया। शैले हाॅल के इन 3 दिनों के कार्यक्रमों में गिर्दा के साथ लंबी पारी खेले गीत नाटक प्रभाग के कलाकारों ने गिर्दा से जुड़े कोरस गीत गाए। यहाँ टीम में परमार जी, दिनेश डंडरियाल, वाचस्पति डयूँडी, महेश चन्द्र जोशी अनूप साह, प्रमोद साह, अनिल घिल्डियाल, शोभा, प्रभा, दीपा और संगीत में अजय, चंदन रीठागाड़ी व नवीन बेगाना और आनन्द बिष्ट आदि थे।
22 अगस्त को मुख्य कार्यक्रम के रूप में तल्लीताल से मल्लीताल तक जो जुलूस निकला, उसमें आन्दोलन जैसा जज्बा था, होली सी रंगत थी। न सिर्फ नगर के सांस्कृतिक कर्मी और आन्दोलनकारी उसमें आये, बल्कि वे सामान्य लोग भी बड़ी तादाद में आए, जिनसे एक व्यक्ति के रूप में गिरदा की घनिष्ठता रही, जिनके दुःख-सुख में वह 43 साल तक साथ रहा। गिरदा की पत्नी, हेमा भाभी की उपस्थिति लगातार प्रेरित करती रही। महिला समाख्या की टीम ने तल्लीताल क्रांति चैक और मल्लीताल रामलीला स्टेज पर नुक्कड़ नाटक किये। यह जलूस ‘फ्रीमशंस हॉल में समाप्त हुआ, जहाँ बृजमोहन जोशी ने सुपरिचित छायाकारों, अनूप साह, बलबीर सिंह, प्रदीप पांडे, विनीता यशस्वी आदि के साथ मिल कर फोटो प्रदर्शनी लगाई थी। गिर्दा के नए-पुराने फोटो सबके आकर्षण का केन्द्र बने। प्रदीप पाण्डे व बृजमोहन की फिल्मेां से उदासी का माहोल बन बैठा। मंजूर हुसैन और हरीश राणा ने गिर्दा की कविताओं का पाठ किया। उस दिन शहर में मौजूद मुख्यमंत्री के संदेश भी आते रहे कि वे इस कार्यक्रम में आना चाहते हैं। पर वे नहीं आये।
नैनीताल से उमेश तिवारी ‘विश्वास’
गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की प्रथम पुण्य तिथि के अवसर पर उमेश डोभाल स्मृति ट्रस्ट द्वारा 22 अगस्त पौड़ी में एक विचार गोष्ठी तथा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए नरेन्द्र सिंह नेगी ने कहा कि गिर्दा ने हमें अन्याय का प्रतिकार करना सिखाया। ट्रस्ट के कार्यकारी अध्यक्ष विमल नेगी ने गिर्दा की सादगी व आम जन से उनके जुड़ाव को बेमिसाल बताया। वरिष्ठ रंगकर्मी वीरेन्द्र कश्यप, चित्रकार बी. मोहन नेगी, साहित्यकार बी.डी. कुकरेती, वरिष्ठ पत्रकार जी.पी. सेमवाल, सुरेन्द्र सिंह रावत, सरदार सिंह रावत आदि ने गिर्दा के साथ बिताये लम्हों को याद किया। संचालन मनोहर चमोली ‘मनु’ ने किया।
कवि सम्मेलन में शहर के एक दर्जन से अधिक कवियों ने कविता पाठ किया। वीरेन्द्र पंवार ने व्यवस्था पर चोट की- ‘‘कखि बरखा बगाणी च, कखि विपदा रूवाणी च, कखि त पौड़ टुट्यां छन, कखि इमदाद जाणी च।’’ विनोद रावत ने मुल्क के हालात बयाँ करते हुए कहा- ‘‘अन्ना को क्या पड़ी है, क्या बाबा को गर्ज़ है, अपने ही ले रहे हैं, क्यों हिसाब मुल्क में।’’ मनोज दुर्बी ने गिर्दा की लड़ाई जारी रखने का आह्वान किया- ‘‘नया इक रास्ता, मंजि़ल नई, ईज़ाद करते हैं, चलो अब गांव की वीरानियाँ आबाद करते हैं।’’ मनोहर चमोली ‘मनु’ ने छोटे बहर की ग़ज़ल पढ़ी- ‘‘सबको छाया देता नीम, अपना क्या बेगाना क्या ?’’ मनोज रावत ‘अजुंल’ ने गढ़वाली में ग़ज़ल प्रस्तुत की- ‘‘‘गौळी रै सुखीं, नि देई एक बूंद पांणी तौन, मे निहत्था मनखि पर, कन बन्दूक तांणी तौन।’’ अद्वैत बहुगुणा ने कहा- ‘‘‘बन्दूक और संगीनों के साये में, बेख़ौफ विचरती इंसाफ होती है कविता।’’ विमल नेगी की अन्ना के आन्दोलन पर प्रतिक्रिया थी- ‘‘ भ्रष्ट व्यवस्था मुण्ड मा धारि, घूसखोरि की सेवा कन्ना, त्वी भी अन्ना मी भी अन्ना, नारा लगौणा अन्ना अन्ना।’’ अनिल बिष्ट ने कहा- ‘‘रुप्यों का गडोळा, तौन उबरौं लुकैनी, रांठि बांठि करि तौन, डंकार तक नि लेनी।’’ गणेश ‘गणी’ ने अपने उद्गार इस तरह व्यक्त किये- ‘‘हे भैजी गोविन्द सिंह, तुम लैक त नि छा कख, बिना सौं सलाह का जल ग्या जग।’’
वीरेन्द्र खंकरियाल ने गिर्दा को याद किया- ‘‘गैरों को सदा अपना बनाने वाला, सो गया पहाड़ को जगाने वाला।’’ डा. एम.एम. नौडि़याल ने अन्ना के समर्थन में कहा- ‘‘भ्रष्टाचार मिटाणूं तैं तु फोड़ दी हर पाळ, लैजा लोकपाल तु लैजा लोकपाल।’’ नरेन्द्र सिंह नेगी ने जन प्रतिनिधियों को बेनकाब करते हुए कहा- ‘‘तुम जन सेवक राजा ह्वे ग्यां लोकतन्त्र मा, हम जनता से प्रजा ह्वे ग्यां लोकतन्त्र मा।’’ अन्त में ‘जैंता इक दिन त आलो…’ गाकर गिर्दा को श्रद्धांजलि दी गई।
पौड़ी से मनोज दर्बी