21 अगस्त 2010। शाम लगभग 4 बजे बेस अस्पताल हल्द्वानी की दूसरी मंजिल में आपरेशन थिएटर के बाहर स्टेचर पर करवट लेटे गिरदा से मैंने हाथ मिलाया था। हमेशा की तरह अपार ऊर्जा से भरे उसके हाथ की अंगुलियों ने स्पर्श की भाषा में मुझे अपने प्यार से लबरेज कर दिया। आँखों में पीड़ा तो थी, मगर हमेशा की तरह का आत्मविश्वास भी साफ दिख रहा था। मैने कहा, गिरदा यार फटाफट ठीक होकर बाहर आना। उसे आँखों से हामी भरी। फिर स्ट्रेचर अन्दर चला गया। उस समय मेरा मन किसी अनहोनी को लेकर जरा भी आशंकित नहीं था। अस्पताल में मौजूद तमाम साथियों को भी सब कुछ ठीक हो जाने की ही सहज उम्मीद थी। पिछले कई वर्ष से बीमारियों से लड़ रहे गिरदा के स्वास्थ्य को लेकर हम सब चिन्तित तो जरूर रहते थे, लेकिन गिरदा को कुछ हो जाएगा ऐसा तो कोई सोच भी नहीं सकता था। आखिर कुछ साल पहले लखनऊ में एक के बाद एक लगातार दो दिल के झटकों से भी तो वह उबरकर मौत के मुँह से बाहर आ ही गया था। इस बार भी हम सब, कुछ ऐसी ही उम्मीद लगाए बैठे थे। लेकिन गिरदा ने, जो अपनी जिन्दगी का कलाकार भी खुद था और निर्देशक भी खुद, एकाएक नाटक का ऐसा अन्त कर दिया कि समूचा उत्तराखण्ड और उत्तराखण्ड के बाहर मनुष्यता की लड़ाई लड़ रहा हर एक शख्स भीतर तक भरभरा उठा। नाटक का यह अंतिम अंक कुछ ज्यादा ही घटनाप्रधान रहा। पहले बाबू की मौत, फिर प्रेम का विवाह और फिर यह, सबको सन्न कर जाने वाला ड्राप सीन!
‘नगाड़े खामोश हैं’ की तैयारियों के दिनों में गिरदा को मैंने पहली बार देखा था। हम तब इण्टर के छात्र थे और सती मास्साब के कारण रिहर्सल के दौरान प्रायः हमें वहाँ रहना पड़ता था। वह रिहर्सल किसी उत्सव की तरह हो रही थी। तरह-तरह के लोग वहाँ आते थे। अपने-अपने क्षेत्र की विलक्षण प्रतिभाएँ, मगर उन सब के बीच एक शख्स हमें कुछ अजीब सा लगता था। एक रहस्यमय सा व्यक्तित्व! उसका अंदाज बहुत आत्मीय था। एकाध बार उसने कुछ छोटा-मोटा काम बताया होगा हमें। ज्यादा कुछ बात भी नहीं हुई होगी, पर अपने विशिष्ट अंदाज के कारण वह मन में कहीं अटक गया था। फिर कई वर्ष बाद उत्तरकाशी की डबरानी झील बनने से आई बाढ़ के सिलसिले में उत्तरकाशी आए गिरदा से मेरी पहली अंतरंग मुलाकात हुई। मुझे सम्मोहित सा कर दिया था उस मुलाकात ने। तब उत्तरकाशी की स्थितियाँ बेहद खतरनाक और भयावह थीं। हम हरसिल से ऊपर के गाँवों में नमक पहुँचाकर लौट रहे थे और गिरदा-शमशेरदा की टोली ‘नैनीताल समाचार’ के लिए उत्तरकाशी का हाल जानने पहुँची हुई थी।
नैनीताल समाचार मेरी जिन्दगी की एक बड़ी पाठशाला रहा और गिरदा उसके सबसे अलग गुरुओं में एक, एकदम अलग किस्म का! और मेरा रिश्ता भी उससे उसी तरह का बनता चला गया। एकदम अलग किस्म का रिश्ता। गिरदा मेरा दोस्त था, बड़ा भाई था, गुरु था, संस्कार देने वाला पिता था। क्या-क्या नहीं था ? और मेरा ही क्या, गिरदा तो मेरे जैसे हजारों-लाखों लोगों के लिए ऐसा ही था।
‘गोविन्द…गोविन्द…गोविन्द’ प्रायः कविता के अन्दाज में वह तीन बार मेरा नाम पुकारता था। कभी अचानक (हाल के सालों में) उसका वक्त बेवक्त फोन आ जाता था। ‘‘यार एक छन्द बना है, सुनने की मनःस्थिति में है ? सुनाऊँ ?’’ और फिर गिरदा आठ-दस पक्तियाँ सुनाकर अभिभूत कर देता। फिर पूछता ठीक बना है? ये क्षण ऐसे होते जिन्हें गिरदा सचमुच शिद्दत के साथ, पूरे रोमांच के साथ जीता था, दूसरे के साथ बाँटता था।
नैनीताल समाचार के सबसे सुनहरे उन दिनों में, गिरदा मल्लीताल में नैनीताल क्लब वाले मोड़ में एक रेस्टोरेन्ट के पीछे वाले कमरे में रहता था। इस कमरे में बाबू उसका हमदम था, उसका कुक, उसका हमप्याला, उसका संरक्षक, सभी कुछ। इस कमरे में यों तो ताला नहीं लगता था और कभी सस्ता सा ताला लगता भी तो उसकी चाभी साथ वाले रेस्टोरेंट में होती थी और गिरदा का नाम लेकर कोई भी उसे हासिल कर सकता था। हम जैसे लोगों को यह विशेषाधिकार भी मिला हुआ था कि हम रेस्टोरेंट से गिरदा के नाम पर चाय, समोसा, आमलेट आदि जो चाहें खा भी सकते थे।
वह कमरा गिरदा की तपस्थली जैसा था। बेहद अंधेरा, एक मरियल सा पीला बल्ब, बाहर से घुसते ही एक टॉयलेट और साथ में छोटी सी रसोई। कमरे में दो खाट, एक गिरदा की, एक बाबू की। बिस्तर के नाम पर उधड़ी-आधड़ी सी रजाई या कभी स्लीपिंग बैग। नीचे दरी, चादर, गद्दा सब गड्डमड्ड। जहाँ-तहाँ बीड़ी के ठुड्डे। एक-आध लुड़के-पुड़के गिलास प्याले, कुछ पत्रिकाएँ, कुछ किताबें अखबार, पम्फलेट, एक खूँटी में लटका हुड़का, कभी-कभी कैसेट रिकार्डर जैसा कोई यंत्र भी दिख जाता। मुझे वह कमरा फ्रांस की क्रांति के दिनों के किसी कम्यून का जैसा लगता।
गिरदा वहाँ होता तो भाँति-भाँति के ‘गण’ भी वहाँ होते। कभी कोई, कभी कोई, एक से एक रहस्यमय व्यक्तित्व। अक्सर वहाँ बैठकें होतीं। शाम से शुरू होकर बैठकों का यह सिलसिला देर रात तक चलता। प्रायः दो-तीन बजे तक, जब तक कि आखिरी योद्धा थककर सो नहीं जाता। बीच-बीच में बाबू का आग्रह होता…. खाना बन गया है, खाना ठण्डा हो रहा है, कुछ तो खा लो। एक आध गण जिन्हें जल्दी खिसकना होता, थाली लगवाकर कुछ खा लेते और गिरदा भी उसी में एक आध ग्रास खा लेता। वही उसका खाना हो जाता। अक्सर उसका खाना ढंग से नहीं हो पाता था, हालाँकि खाने का उसे बेहद शौक था। स्वाद पहचानने और उसे दूसरों तक संप्रेषित करने में तो वह माहिर था। मटर छीलती, पालक बीनती उसकी अंगुलियाँ कलाकार की अंगुलियों की तरह नृत्य करती दिखाई देतीं। मगर अक्सर खाना खा पाने तक की नौबत ही नहीं आती। कई बार तो बाबू नाराज हो जाता। खाना पटक देता और सो जाता। गिरदा के उस कमरे में रात बिताना एक तरह की श्मशान साधना जैसा अनुभव था। एक रात जिसे उस कमरे में सोने का मौका मिल गया, उसका तन-मन जाग जाता। मन विचारों से और तन तरह-तरह के प्राणियों के हमलों से त्रस्त होकर।
वह गिरदा के वैचारिक मंथन का बेहद सक्रिय दौर था। उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी की सक्रियता का सुनहरा दौर। आईपीएफ के जन्म से पूर्व का दौर। ‘चिपको’ से ‘नशा नही रोजगार दो आन्दोलन’ तक के बीच का वह दौर उत्तराखण्ड में जन चेतना के उभार का सबसे तेज दौर था। उन दिनों नैनीताल में होने पर गिरदा का नैनीताल समाचार के दफ्तर में एक चक्कर आना अनिवार्य सा था। बिला नागा वो दोपहर में आता, एक आध घंटा समाचार में कुछ चिन्तन-मनन होता। किसी अंक की परिकल्पना के बारे में, किसी अंक के मुखपन्ने के बारे में, किसी लेख के बारे में, या किसी शीर्षक के बारे में। कभी-कभी तो एक-एक शब्द को लेकर घंटों बहस हो जाती। गिरदा चीजों में परफेक्शन का इतना हिमायती था कि नैनीताल समाचार में छपने वाले एक शब्द के बारे में उसका कहना होता था कि यार जो हम छाप रहे हैं, उसकी जवाबदेही भी तो हमारी है, गलत करेंगे तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
तब वो एक जबर्दस्त पत्रकार होता था। मानवीय सरोकारों पर उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उसमें कोई कसर बाकी होने की गुंजाइश ही नहीं होती। समाचार की उन बैठकों में खुली बहस होती थी। और हर किसी को अपनी बात कहने की पूरी आजादी थी। बड़े से बड़े विद्वानों से लेकर गिरदा के शब्दों में ‘पॉलीटिकल लारवा’ किस्म के लोगों तक, सबको विचार रखने का पूरा मौका होता। गिरदा अपनी राय या विचार जबरन मनवाने का प्रयास कभी नहीं करता था। ‘यार! ये विचार है अब आप लोग सोचों कि ये एक्जीक्यूट कैसे होगा और पहले ये कि एक्जीक्यूट होने लायक है भी या नहीं ?’ वह अक्सर कहा करता। या कभी वह कहता ‘….ऐसा जैसा कुछ!’ यानी जो सूत्र उसने सोचा है, उसको किस तरह कागज पर उतारा जा सकता है। एक अच्छे निर्देशक की तरह वह सूत्र दे देता था, बाकी काम दूसरों को करना होता। उस दौर में मेरी गिरदा से खूब बहसें हुई, झगड़े हुए, तीखी नोंकझोंकें भी हुई। शायद गिरदा ने इस तरह लड़ने-झगड़ने, डाँटने-डपटने का विशेषाधिकार मुझे दे रखा था, और यह अधिकार मेरे पास उसके अंतिम दिनों तक बना रहा। इसी जुलाई में जब वह लखनऊ आया था, तब भी उसने मेरे इस अधिकार का मान रखा था और मुझे इस बात का अहसास कराया था, कि मेरे पास यह अधिकार अब भी हैं। इतना अपनापा और इतना बड़प्पन था उसमें!
शादी गिरदा के जीवन की एक अजब घटना थी। गिरदा के मिजाज और विचारों से एक दम प्रतिकूल बात थी गिरदा का शादी करना। मगर जब शादी हो गई, तो हम सब ने गिरदा में एक अभूतपूर्व परिवर्तन देखा। गिरदा के बाहरी रूप में एकाएक बदलाव सा आ गया। गिरदा के बाल करीने से कढ़े दिखने लगे, कपड़े सलीकेदार हो गए, साफ-सुथरा चिकना चुपड़ा गिरदा हमें शुरू में बहुत असहज लगता था। लेकिन गिरदा की एडोप्टिबिल्टी देखने लायक थी। किसी बच्चे की तरह गिरदा नई जिन्दगी के व्यावहारिक गुर सीखता दिखता था। उसके हर काम मे बालसुलभ चंचलता दिखाई देती थी। उसने उस नई जिन्दगी के साथ जल्द ही तालमेल बना लिया। अराजकता अब कम हो गई। नियमित खान-पान, आचार व्यवहार का असर उसके व्यक्तित्व में भी दिखाई देने लगा लेकिन साथ ही साथ उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता, आदमी के लिए उसकी पीड़ा इस दौर में और अधिक मुखर होती गयी।
चिपको के बाद के दौर तक गिरदा की राजनीतिक प्रतिबद्धता उस पर अधिक हावी थी और इसी वजह से उसमें ज्यादा लचीलापन नहीं था। जो लाईन दिमाग में बसी थी उससे जरा भी इधर-उधर होना उसे मंजूर नहीं था। एक बार किसी सिलसिले में, मैं और गिरदा अल्मोड़ा गए थे। रात गिरदा की दीदी के घर रुकना था। नौ साढ़े नौ बजे हम उनके घर पहुँचे और फिर खाना खाते-खाते इस बात पर बहस शुरू हो गई कि गिरदा को अपनी रचनाओं का कैसेट बनाना चाहिए या नहीं। गिरदा तब इसका सख्त विरोधी था। मेरा कहना था कि यह नये जमाने का नया साधन है। अब लोग मुँह से सुन कर याद रखने या पढ़कर आत्मसात करने के बजाय कैसेट सुन कर मजा लेना ज्यादा पसंद करते हैं, इसलिए गिरदा को भी इस तकनीक का फायदा उठाना चाहिए। मगर गिरदा इस बात को मानने को कतई तैयार नहीं था। उस रात लगभग तीन बजे तक हम लड़ते रहे, बहस करते रहे। सुबह दीदी ने चाय दी तो हैरानी भरे अंदाज में पूछा दिन में क्यों नहीं लड़ लेते तुम लोग। मगर कुछ ही वर्ष बाद गिरदा तकनीकी के इस कमाल को स्वीकार करने लगा था, और बाद में नैनीताल में जागर कैसेट के नाम से तीन कैसेटों की एक रिकार्डिंग करवा कर गिरदा ने इस विधा में दखल भी दिया हालाँकि उस रिकार्डिंग में उसका ‘अपना’ बहुत कम था।
गृहस्थी के सुख ने गिरदा को लगातार परिपक्व किया। अराजकता के दौर के उमड़ते-घुमड़ते विचारों का ज्वालामुखी शांत होकर अपने बहाव की दिशा बनाने लगा था। हालाँकि उसकी आग और आँच कभी खत्म नहीं हुई। ‘नशा नही रोजगार दो’ आन्दोलन’ के दौर में गिरदा आन्दोलन का सबसे बड़ा सूत्रधार बन गया था। उसके गीत जन-जन की जुबान पर चढ़ गए थे। छात्र, युवा, महिलाएँ सभी उसके गीतों को गुनगुनाने लगे थे, दोहराने लगे थे। उसके शब्दों की आग हर ईमानदार दिल को जोश दिला रही थी।
इस आन्दोलन की एक बड़ी खूबी यह थी कि इसका फैलाव गरुड़ सोमेश्वर, बसभीड़ा, चौखुटिया, द्वाराहाट, बाड़ेछीना, भवाली, गरमपानी, गंगोलीहाट, लोहाघाट, देवीधुरा, गैरसैंण, ताकुला, बेतालघाट और भीमताल जैसे कस्बों तक फैला हुआ था, इसलिए गिरदा के जनगीत इस आंदोलन में इन कस्बों और इनसे जुड़े गाँवों तक भी पहुँच रहे थे, ध्वनित हो रहे थे। नैनीताल-अल्मोड़ा जैसे शहरों में तो वे पहले से ही लोगों की जुबान पर चढ़े हुए थे।
आन्दोलनकारी गिरदा, क्रान्तिकारी गिरदा, जनकवि गिरदा, फक्कड़ गिरदा अब एक गम्भीर दार्शनिक व चिन्तक गिरदा भी बन गया था। हालाँकि इस दौर में उसमें एक बदलाव यह भी आया कि अब वह असहमति को भी सहजता से स्वीकार करने लगा था, दूसरों की आक्रामक आलोचना उसने एकदम बन्द कर दी थी। किसी का विचार, किसी का व्यवहार, किसी की कोई हरकत उसे नापसंद भी होती तो भी उस पर वह खुद कोई टिप्पणी नहीं करता था। हाँ, उस बारे में अपना पक्ष या अपना विचार वो जरूर स्पष्ट कर देता था। नीलकण्ठ सा हो गया था वह! शराब आंदोलन के बाद का निराशाजनक दौर उसे गहरे तक सालता था, विचार के नाम पर आसपास की प्रगतिशील एकता का टुकड़ों में बटकर बिखरना उसके लिए बेहद पीड़ादायक था। कबीर दास की तो मौत के बाद उन पर अलग-अलग आस्थाओं के लोगों ने हक जताया मगर गिरदा को तो जीते जी इस स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। हर खण्ड-विखण्ड गिरदा को अपना बता रहा था और गिरदा था कि अपने विचार को, अपनी ऊर्जा को खण्ड-खण्ड होता देखकर तड़प रहा था। ज्वालामुखी भीतर ही भीतर दहक रहा था, मगर अब वह फट नहीं रहा था। उसकी सारी आग गिरदा पी रहा था, खुद को जला कर।
उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन ने गिरदा को एक और विस्तार दिया। उत्तराखण्ड की लोक संस्तुति और परम्पराओं की जड़ों तक पहुँचे होने का उसका अनुभव राज्य की जरूरत महसूस करते लाखों उत्तराखंडियों को जुबान दे रहा था। नीति से नानकमत्ता तक और तवाघाट से त्यूणी तक उत्तराखण्ड की माँग में गिरदा के सुर अपारिहार्य रूप से शामिल हो गए थे। फिर राज्य तो बन गया, मगर गिरदा जैसों का सपना पूरा नहीं हो पाया। इसलिए उसने राज्य बनने के 6 साल बाद एक फिर लम्बी कविता के जरिए पूछा कि क्या इसी सबके लिए हमने देखा था अपने राज्य का सपना ? बाद में जैसे-जैसे उसकी शारीरिक क्षमताएँ कम होती गईं, उसकी छटपटाहट बढ़ती गई। ‘नदी बचाओ आंदोलन’ के दौर तक आते-आते उसका वैश्विक चिन्तन बेहद मुखर हो चुका था। पैसे का मुँह उसने कभी देखा नहीं, मगर आर्थिक दबाव तो थे ही। स्वास्थ्य भी इजाजत नहीं देता था। मगर उत्तराखड की हर गतिविधि में शामिल होने की उसकी प्यास अभी भी बुझी नहीं थी। इसलिए सशरीर किसी कार्यक्रम में न पहुँच पाने पर भी वो मोबाइल के जरिए वहाँ जरूर पहुँच जाता। वापस लौटने वालों से वहाँ का हाल जानने की उसकी आतुरता देखने लायक होती थी।
लखनऊ में एक बार होली में अपने संगी-साथियों के साथ आकर बैठकी करने को उसकी बड़ी इच्छा थी। तीन वर्ष पहले एक बार ऐसा होने की स्थिति भी बनी, मगर कुछ संगतकारों को छुट्टी न मिल पाने से वह इच्छा पूरी नहीं हो सकी और अब तो वह हमारे लिए एक न पूरा हो सकने वाला सपना ही रह गई है।
गिरदा की आत्मीयता, उसका बड़प्पन, उसकी फूल झरती जुबान अब सिर्फ यादें बन गई हैं। भौतिक मायामोह से छत्तीस का आँकड़ा होने के बावजूद उसे हर मित्र-सहयोगी के सुख-दुःख की हमेशा चिन्ता रहती थी। कविताओं और गीतों में वो अपने आसपास के लिए जितना चिन्तित और परेशान दिखता था, असल जिन्दगी में भी वैसा ही था। अहं तो उसमें था ही नहीं और ‘मैं’ का तो दूर-दूर तक नाम भी नहीं। पानी जैसी तरलता और जाड़ों में गंगोत्री के गंगाजल जैसा पारदर्शी था उसका मन। ‘कहो मित्र!’ किसी अनजान, अपरिचित को भी उसका यह संबोधन बाँध सा देता था। मुझे लगता है कि अपने व्यक्तिगत दुःख सुख जिस तरह मैंने गिरदा के साथ बाँटे होंगे वैसे शायद ही किसी दूसरे के साथ बाँटे होंगे। वह दुःख बाँटना जानता था तो उत्साहवर्द्धन करना भी जानता था। दूसरे की प्रशंसा करना मुश्किल काम होता है। मगर गिरदा उन्मुक्त भाव से, खुले दिल से ऐसा करता था। वह जानता था कि प्रोत्साहन क्या चीज होती है, इसलिए वह हर मिलने वाले को उसके सकारात्मक पहलुओं के लिए प्रोत्साहित करता था, प्रेरित करता था। ’और सुना, कोई नया चिन्तन, कोई नया विचार चल रहा है क्या मन मस्तिष्क में?’’
प्रायः वह यह जरूर पूछ लेता था। गिरदा जबतक सशरीर हमारे साथ था, हमें कभी लगा ही नहीं कि गिरदा कितना बड़ा है। घर की मुर्गी दाल बराबर थी। अब वह सशरीर नहीं है तो उसकी एक-एक बात, एक-एक विचार, एक-एक शब्द और एक-एक अंदाज रह-रह कर याद आ रहे हैं। कभी अपनी मूर्खताओं का अहसास करा रहे हैं तो कभी गिरदा की महानता का!
गिरदा शताब्दियों में एक बार पैदा होता है, इसलिए गिरदा मरता नहीं। उसका शरीर नहीं है तो क्या हुआ ? उसके विचार तो हमें चेता रहे हैं, चेताते रहेंगे, जगाते रहेंगे। दही की ठेकी की तरह समाज को एक बने रहने की जो सीख उसने दी थी, गिरदा को मानने वाले, जानने वाले और समझने वाले, सभी बड़े और छोटे इसे आत्मसात कर लेंगे तो इंसानियत की बेहतरी के लिए तड़पता गिरदा का मन भी शांत होगा और उसके सपने भी सच होने के ज्यादा करीब पहुँच सकेंगे। वो खुद भी कहता था, ‘‘यार गोविन्द। जिन्दगी इतुक नानि हुनेर भैं। आदिम ये में ले दुहार हूँ लड़नौक टैम निकाल लिनेर भै। वाह, क्या बात है।’’
‘चिफलो भैं बाट, खुट धरिया सँभाल
हिल मिल लडुँल तो जीत भैं हमैरि
आपस में लड़ि मरों, भलि ऊँ भेटाल
छै पधानाक जाँ नौ चुल ह्वाला
समझिलियो वाँका के ह्वाला हाल।’
गिरदा यही कहता था, गिरदा यही कह रहा है, गिरदा यही चाहता था और गिरदा आज भी यही चाह रहा है!!