गिरिजा पाठक
गिरदा के देहान्त के बाद उनके सांस्कृतिक पक्ष पर ही अधिक बात हो रही है और उन्हें एक ऐसे सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया जा रहा है, जिसका उत्तराखण्ड के जन आन्दोलनों से भी गहरा सरोकार रहा। लेकिन गिरदा वास्तव में एक सचेत राजनैतिक विचारसम्पन्न व्यक्ति थे, जिसने संस्कृति के हथियार से शासक वर्गों के लिए चुनौती पेश की।
वनों की नीलामी को जनता से उसके जंगल छीनने का षडयंत्र मानते हुए जब उत्तराखण्ड के युवा वन-आन्दोलन के लिये सड़क पर उतरे, तब गिरदा ने ‘आज हिमाल तुमन कैं धत्यूँछौ, जागो जागो हो म्यारा लाल’ कहते हुए सीधे संघर्ष का आह्वान किया। यह परम्परा उन्होंने स्थानीय से लेकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर के जनसंघर्षों के साथ कायम रखी। ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिकार में अपने साथियों के साथ सड़क में उतर कर उन्होंने ‘कौन आजाद हुआ, किसके माथे से गुलामी की स्याही छूटी’ का सवाल उठाया तो समाधान के रूप में ‘हमारी ख्वाहिशों का एक नाम इंकलाब है’ भी सामने लाये।
गिरदा ने फैज़, अली सरदार जाफरी और गोरख पाण्डेय जैसे जनगीतकारों को जनान्दोलनों और जनता के होठों तक पहुँचा दिया। फैज़ का भाव लेकर गिरदा ने जब रचा तो लगा कि फैज़ ने उत्तराखंड की आंचलिक विशिष्टताओं को ध्यान में रख कर ही ये रचनायें की होंगी। ‘हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे’ को उत्तराखण्ड के जनान्दोलनों से जोड़ते हुए जब गिरदा ने कहा कि ‘हम ओढ़, बारुड़ी, ल्वार, कुल्लि, कभाडि़, जधिन यो दुनी थैं हिसाब ल्ह्यूँलो’ तब लगता ही नहीं कि फैज़ ने उत्तराखण्ड के बारे में नहीं सोचा होगा। गिरदा हमेशा देश, दुनिया की राजनीति पर तीखी दृष्टि रखते थे, और अपनी बात-बहस और काव्य रचना को उसके केन्द्र में रखते थे। चिपको, नशा नहीं रोजगार दो और उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलनों में गिरदा महत्वपूर्ण भूमिका में थे।
सातवें दशक में चिन्तातुर युवाओं ने ‘उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी’ बनायी। चिन्ता के मूल में जल, जंगल, जमीन और जन थे। राज्य द्वारा लागू की जा रही जन विरोधी नीतियों का प्रतिकार उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी द्वारा किया गया। इन युवाओं में गिर्दा एक प्रमुख व्यक्तित्व थे। आगे चल कर बहुत कारणों से वाहिनी अपने संगठित स्वरूप को बरकरार नहीं रख पाई। इसका एक हिस्सा सुविधाभोगी बुर्जुआ राजनीति में अपना कैरियर बनाने के लिए भाजपा, कांग्रेस जैसे दलों से जुड़ गया तो दूसरा हिस्सा चुनावी राजनीति से दूरी बनाते हुए जन से जुड़े सवालों पर अपनी आवाज उठाता रहा। एक और हिस्सा वामपंथी राजनीति से जुड़कर एक वैकल्पिक राजनीति के साथ आगे बढ़ा। गिरदा ने अपने रचनाकर्म को आगे बढ़ाते हुए अपने आप को जन सरोकारों से जोड़े रखा। धीरे-धीरे उन्होंने भी सक्रिय राजनीति से एक सचेत दूरी बना ली। इस सबके बावजूद उनकी सचेत दृष्टि हमेशा ज्वलंत सवालों से जुड़ी रहती। खगोलीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय निगमों की हरकतों को करीब से देख रहे थे और चेतावनी दे रहे थे- ‘सारा पानी चूस रहे हो/ नदी समन्दर लूट रहे हो/ लेकिन जब डोलेगी धरती/सर से निकलेगी सब मस्ती/ बूँद-बूँद को तरसोगे जब/बोल व्योपारी तब क्या होगा? वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी तब क्या होगा?’
गिरदा ने यह सिखाया कि किस तरह से जन आन्दोलन और जन संस्कृति एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आन्दोलन में नशे के षड़यंत्र को शासक वर्ग की राजनीति से जोड़कर आगे बढ़ाया गया, तो यह आन्दोलन गाँवों-कस्बों-शहरों में फैलता गया। संघर्ष वाहिनी (जो कि आन्दोलन संचालित कर रही थी) कार्यक्रम तय करती। इन कार्यक्रमों में गिरदा यह खास ध्यान रखते कि जिन भी गाँव/कस्बों में प्रदर्शन-धरना हैं, वहाँ की विशिष्टता के साथ गीत रचा जाये। 17 अक्टूबर को नैनीताल में हुए विशाल प्रदर्शन का केन्द्रीय गीत था, ‘शोषण के दम पर टिके तंत्र को, उठ्ठो भस्मीभूत करो…..जन एकता कूच करो।’
उत्तराखण्ड के जनान्दोलनों के साथ एक समस्या रही है कि सारे आन्दोलन अन्ततः सर्वदलीयता के तले दबकर अपनी प्रासंगिकता खोते रहे हैं। शासक वर्ग ने बहुत सचेत ढंग से यह विचार जनमानस में बिठा दिया है कि किसी भी समस्या का समाधान अराजनैतिक संघर्ष को आगे बढ़ाकर ही किया जा सकता है। उत्तराखण्ड राज्य का संघर्ष भी अन्ततः इसी षड़यंत्र का शिकार हुआ। आज यहाँ की सत्ता पर वो ही शक्तियाँ काबिज हैं जो जनता की बदहाली के लिए जिम्मेदार रहीं। गिरदा के देहान्त के साथ ही वे सारी ताकतें भी उनके वास्तविक संघर्षों के साथियों जितनी ही दुःखी दिखाई दे रही हैं। जबकि इन्हीं की नीतियों के खिलाफ गिरदा जनम भर लड़ते रहे। कांग्रेस और भाजपा जैसे दल यदि गिरदा को याद कर रहे हैं तो इसलिए कि ऐसा करके वे अपने लिए कुछ हद तक विश्वसनीयता हासिल करने में सफल रहेंगे। आजीवन कम्युनिस्ट आन्दोलन से जुड़े और बेहतर समाज की रचना के लिए संघर्षरत अनेक जन नायकों को शासक वर्ग ने पहले ही बखूबी पचा लिया है। वह इनके जन्म-अवसान दिवस को तो मनाते हैं, लेकिन उनके विचार और संघर्ष के बारे में जनता को बताने में कतराते हैं। वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, श्रीदेव सुमन, नागेन्द्र सकलानी ऐसे ही नायक रहे हैं। गिरदा के साथ भी यह सब होने का डर मौजूद है, क्योंकि पहाड़ की प्रगतिशील-लोकतांत्रिक या फिर उनकी सहकर्मी शक्तियों ने इन सच्चाइयों को नजरन्दाज किया है।
गिरदा के बहाने हमारे पास एक मौका है आत्मावलोकन करने का। हमें अपने संघर्षों की समीक्षा कर गिरदा के माध्यम से जन संस्कृति को आगे बढ़ाने के लिए एक न्यूनतम सहमति के साथ जनता को बदहाल करने वाली ताकतों की शिनाख्त करते हुए संघर्ष में उतरना होगा। गिरदा अन्तिम दम तक इसी कोशिश में तो लगे थे।