कपिलेश भोज
क्या सचमुच गिरदा नहीं रहे ? …..कहाँ, शरीर उनका जरूर तिरोहित हो गया है, लेकिन जनता से एकाकार हुए और उसके दुःख-दर्द, गुस्से व संघर्ष को वाणी देने वाले गिरदा जैसे जनपक्षी रचनाकार कभी मरते नहीं, क्योंकि जनता के जिस सपने को उन्होंने जिया, वह सपना कभी नहीं मरता….मर नहीं सकता…
1975 में डी.एस.बी. कॉलेज नैनीताल में बी.ए. प्रथम वर्ष के विद्यार्थी के रूप में प्रवेश करने से लेकर 1980 में मेरे नैनीताल छोड़ने तक के छः वर्षों में मल्लीताल के रिक्शा स्टैण्ड, फ्लैट्स, माल रोड, ठण्डी सड़क और तल्लीताल की कैण्ट रोड पर चहलकदमी करते हुए और ‘नैनीताल समाचार‘ के कार्यालय में बैठकी के दौरान जिन लोगों से परिचय, घनिष्ठता और बातचीत-बहसों का सिलसिला शुरू हुआ, उनमें से प्रमुख थे- ताराचन्द्र त्रिपाठी, गिरीश तिवारी ‘गिरदा‘, शेखर पाठक, राजीव लोचन साह, विश्वम्भरनाथ साह ‘सखा‘, उमा भट्ट, पलाश विश्वास, पवन राकेश, निर्मल जोशी, हरीश पन्त और जहूर आलम…
डी.एस.बी. में एम.ए. (हिन्दी) करने के दौरान मैंने जीवन और साहित्य की समझ गिरदा के साथ लगातार बात-बहस के जरिये अर्जित की। क्या दिन थे वे! ……अपार जिज्ञासा, ऊर्जा, सपनों की उड़ान, झील के किनारे स्थित म्युनिसिपल लाइब्रेरी की किताबों की गंध और धुआँधार बहसों से छलछलाते धूपीले दिन….। मैं और पलाश साहित्य, समाज और राजनीति पर कभी खत्म न होने वाली बहसें करते थे गिरदा के साथ। यदा-कदा इन बहसों में राकेश लाम्बा उर्फ पवन राकेश तल्लीताल कैण्ट स्थित अपनी दुकान से थोड़ी देर के लिए लापता होकर, अपने ढेर सारे सवालों और सुझावों के साथ धूमकेतु की तरह आ कूदते थे और फिर दुकान की याद आते ही तुरन्त गायब भी हो जाते थे। शेखर चे (यानी आज के शेखर पाठक) भी मालरोड पर तेज कदमों से चलकर आते हुए अक्सर मल्लीताल रिक्शा स्टैण्ड पर प्रकट होते रहते थे…..
मुझे और पलाश को मल्लीताल रिक्शा स्टैण्ड के आसपास गिरदा का इन्तजार रहता। …….शाम पाँच से साढ़े पाँच के बीच गीत एवं नाट्य प्रभाग के अपने कार्यालय से झोला लटकाये हुए धीमे-धीमे उतरकर नीचे आते थे गिरदा…..फिर उनके साथ बन्द-मक्खन या बन्द-आमलेट और चाय ग्रहण कर शुरू हो जाता था बातचीत का अन्तहीन सिलसिला…… यह एक तरह से रोज का ही क्रम बन चुका था, जो तभी भंग होता, जब गिरदा शहर से बाहर गये होते थे। ऐसे दिन हमारे लिए बेहद उदासी भरे होते थे।
कैपिटल व अशोक सिनेमा हॉल के आसपास तथा झील किनारे पंक्तिबद्ध खड़े चिनार के दरख्तों के अगल-बगल विचरण करते हुए फिर हम उनके साथ ही चल पड़ते थे उनके अड्डे पर…..यानी मल्लीताल में नैनीताल क्लब के डाँठ के पास उनके उस कमरे में जहां कभी ताला नहीं लगता था और जहाँ होते थे राजा बाबू और होता था नन्हा बालक पिरम….फिर घण्टों तक वहीं होती थी साहित्य-संस्कृति से लेकर दुनिया-जहान की परतों में पैठने वाली बातें। बाहर से हद दर्जे के फक्कड़, अराजक और लापरवाह दिखाई देने वाले गिरदा के भीतर एक ऐसा बेहद अनुशासित और विचारशील इनसान था, जो हर चीज को बहुत ही सावधानी, सजगता, सलीके और गहरी आत्मीयता से स्पर्श करता था……यही वजह है कि जब वे भाषा, लोक, साहित्य, संगीत से लेकर, धर्म, दर्शन, राजनीति, क्रान्ति और जनसंघर्षों पर अपने विचार व्यक्त करते थे तो हमें हमेशा ही किसी तैराक के गहरे में पैठकर मोती ढूँढ लाने- जैसी अनुभूति का अहसास होता था।
सोमेश्वर घाटी भी गिर्दा से बखूबी परिचित है। आंदोलनों के दौर में तथा बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में जाते हुए एकाधिक बार हुड़के की थाप के साथ गीत गाते हुए सोमेश्वर बाजार से गुजरे, लेकिन इस घाटी के लोगों को 1992 एवं 2006 में इत्मीनान से गिर्दा को सुनने और उनसे मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
14 नवम्बर, 1992 को ‘सृजन‘ के तत्वावधान में जब हम लोगों ने राजकीय इण्टर कॉलेज, सोमेश्वर में राहुल सांकृत्यायन पर संगोष्ठी की तो उसमें गिरदा और शेरदा को बुलाया। कार्यक्रम 4 बजे खत्म होना था, लेकिन जब गिरदा ने भाव-विभोर होकर गीत गाने शुरू किये तो साढ़े पाँच बज गए और सभी छात्र-छात्राएं, शिक्षक व अन्य उपस्थित श्रोता समय को भूल गए। फिर बीस वर्षं बाद हम लोगों के बुलावे पर गिर्दा एक बार फिर इस घाटी मं सुमित्रानन्दन पन्त की जयन्ती के मौके पर 20 मई, 2006 को पन्त वीथिका कौसानी आये और वहाँ उन्होंने सुनाई अपनी बेहद मार्मिक कविता-‘कैसा हो स्कूल हमारा‘। जुलाई 2009 में जब डायट भीमताल में एस.सी.ईआर. टी. द्वारा आयोजित पाठ्यपुस्तक लेखन कार्यशाला चल रही थी तो ‘लोक‘, ‘लोक साहित्य‘ एवं ‘लोक संस्कृति‘ को समझने के लिए हमने एक बार फिर गिरदा को याद किया। अस्वस्थ होने के बावजूद गिरदा उत्तराखण्ड के स्कूली बच्चों के लिए पाठ्य-पुस्तकें तैयार कर रहे शिक्षकों के बीच आये और उन्होंने वहाँ एक बेहद महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उस व्याख्यान और उसके बाद एक प्रश्नावली को आधार बनाकर हम लोगों ने उनसे एक भेंटवार्ता तैयार की जो उत्तराखण्ड की कक्षा 8 की हिन्दी की पाठ्य-पुस्तक ‘बुरांश‘ में संकलित है। मुझे खुशी है कि समूचे उत्तराखण्ड के कक्षा 8 के बच्चे ‘कैसे बनते हैं लोकगीत‘ शीर्षक भेंटवार्ता को पढ़ और गिरदा को जान-समझ रहे हैं।
गिरदा से थोड़ी देर के लिए भी जो मिला, वह उन्हें कभी भुला नहीं सका। उनकी सादगी, विनम्रता तथा मेहनतकश जनता के प्रति सहानुभूति दिखावटी नहीं थी। मेहनतकश जनता के शोषण ने उनके भीतर एक आक्रोश को जन्म दिया। पीलीभीत की तराई में सक्रिय कुछ क्रान्तिकारी मित्रों ने उन्हें मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, माओ आदि क्रान्तिकारी चिन्तकों से परिचित करवाया। वैज्ञानिक समाजवाद में उनकी दृढ़ आस्था अन्त तक अक्षुण्ण बनी रही। गीत एवं नाटक प्रभाग में नौकरी करते हुए जब उन्होंने अपनी सृजन-यात्रा प्रारम्भ की, वह उत्तराखण्ड समेत समूचे भारत में उथल-पुथल का दौर था। नक्सलबाड़ी के किसान-आंदोलन क्रान्ति के एजेण्डे को पुनः स्थापित कर रहा था, तो उत्तराखण्ड में भी चिपको आंदोलन, नशा नहीं रोजगार दो जैसे आंदोलन छाये रहे। इसी हलचल भरे दौर में सत्तर के दशक में ‘नैनीताल समाचार‘ का प्रकाशन भी उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक इतिहास में एक बड़ी घटना थी।
गिरदा एक संस्कृतिकर्मी के रूप में इन सभी युगीन हलचलों में अग्रिम पांत में खड़े रहे। उन्होंने तमाम जनान्दोलनों में शामिल होकर गीत एवं नाटक रचे, अधिकांश परिस्थितियों की आवश्यकतानुसार अपनी मातृभाषा कुमाउँनी में। लेकिन इसीलिए उन्हें केवल कुमाउँनी कवि के रूप में देखना उनके कद को छोटा करना है। उनकी एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना यह थी कि साहित्य भाषा का नहीं, जनता का होता है। इस दृष्टि से देखें तो गिरदा कबीर, प्रेमचन्द, फै़ज अहमद फ़ैज, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, गोरख पाण्डे और गदर की प्रगतिशील पांत में उल्लिखित किये जाने के हकदार हैं। साहित्य-संस्कृति की प्रगतिशील विरासत को गहराई से आत्मसात् कर उसका सृजनात्मक विकास करते हुए, उसे समृद्ध बनाते हुए उसका उपयोग जनता को जगाने, उसमें उत्साह का संचार करने और संगठित होकर एक समतामूलक समाज के निर्माण हेतु उसे प्रेरित करने का काम उन्होंने बखूबी किया। हालाँकि गिरदा कभी किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं रहे, लेकिन भूमिगत क्रान्तिकारी समूहों के बारे में जानने की उनमें तीव्र व्यग्रता दिखाई पड़ती थी, भले ही इन समूहों की कार्यशैली और विश्लेषण से सम्बन्धित मामलों में पूरी तरह सहमत न भी रहे हों। उनसे यह बात जरूर सीखी जानी चाहिए कि जनता से वास्तव में एकरूप कैसे हुआ जाता है और उसे कैसी भाषा में सम्बोधित किया जाता है। जनगण के बीच समा जाने की जो कला गिर्दा ने दीर्घ साधना से अर्जित की थी, वह दुर्लभ है।
यहां मुझे अनायास गिर्दा की वे काव्य-पंक्तियां याद आ रही है, जो उन्होंने शुभकामना के रूप में मुझे तब प्रेषित की थीं जब मैं 1992-93 में अपने विद्यालय की वार्षिक पत्रिका ‘अंकुर‘ के प्रथम अंक के प्रकाशन की तैयारी कर रहा था। वे पंक्तियां यों थीं -
ओ कल के गीत, तुम्हें समर्पित
मेरे जमाने के आंखर अरचित
इन आंखरों को तुम पूरा करोगे
गीतों से आगे के गीत रचोगे।
गिर्दा जब स्वयं भी ‘अपने जमाने के अरचित आंखरों को पूरा करने‘ तथा ‘गीतों से आगे के गीत रचने‘ के रचनात्मक संघर्ष में जुटे हुए थे, ऐसे समय में शरीर उनका साथ छोड़ गया। यह हमारी एक ऐसी बहुत बड़ी क्षति है, जिसकी पूर्ति करना आसान नहीं है।