प्रस्तुति : डॉ कुलदीप सिंह नेगी
नैनीताल जनपद के विकास खंड भीमताल में ज्योलीकोट के समीप ग्राम सभा चोपड़ा स्थित है। इसे कभी रोवड़ा या रोपड़ा भी कहा जाता है। यहीं गर्म व तर जलवायु में स्थित है ‘गिरजा हर्बल फार्म’ जिसमें जड़ी-बूटी, बीज-पौंध एवं उत्पादन में संलग्न हैं पूरन चन्द्र चन्दोला। ‘आओ हम सब मिलकर उत्तराखंड को एक संजीवनी राज्य बनाने का संकल्प लें’ का नारा लगाने वाले पूरन चन्द्र की ख्याति अब बहुत दूर पहुँच चुकी है। इनके पिता भोला दत्त चन्दोला वन विभाग में माली का कार्य करते थे, जिसके कारण इन्हें यह ज्ञान और तकनीक विरासत में मिले हैं। पूरन चन्द्र चन्दोला मात्र तीन दर्जा पास हैं परन्तु हिसाब-किताब में माहिर व रामायण का पाठ करने में आनन्द महसूस होता है।
वर्ष 1983-84 से हजारों पेड़ उन्होंने काश्तकारों व वन विभाग को निःशुल्क वितरित किये। अब उसकी कीमत 5 रुपया प्रति पौंध सुनिश्चित की है। बीज व कटिंग द्वारा उनकी नर्सरी में एक लाख से अधिक पौंध हैं। उनका कहना है कि 40-45 पुराने वृक्षों से हर तीन साल बाद कम से कम तीन से साढ़े तीन कुन्तल पत्तियाँ प्राप्त कर लेते हैं। एक किग्रा बीज से उन्होंने लगभग 6 से 7 हजार पौंधों का विकास किया है। एक समय उन्होंने 28 किग्रा. दालचीनी/तेजपात का बीज बोया था। उनका कहना है कि बीज बोते समय नर्सरी में नमी, जैविक खाद, राख उपयुक्त व उचित मात्रा में होनी चाहिये। नर्सरी में बीज मार्च से जून तक बोने चाहिये। दालचीनी की पत्तियाँ मुख्यतया बिना श्रेणी के 13 से 14 प्रति किग्रा. व श्रेणी करने पर रुपया 24 प्रति किग्रा. तक प्राप्त हो जाता है। 4 से 5 वर्षों बाद उन्हें 80 से 90 बोरे पत्तियों के ठसाठस भरे मिल जाते हैं। एक बोरे में लगभग 20 किग्रा. तक पत्तियाँ आ जाती हैं। कहने का तात्पर्य है कि 2 एकड़ भूमि में सालाना 40 से 50 हजार रुपये तक औसत आमदनी प्राप्त हो जाती है।
शौकिया तौर पर पिछले 4 से 5 वर्षों से मौनपालन हेतु वे तराई-भाबर के बिलासपुर, टांडा भी जाते हैं, खासकर सितम्बर माह में, जब इन इलाकों में लाई, सरसों, अरहर, यूकेलिप्टस के फूलों की बहुलता होती है। बरसात के दिनों में गौलापार चले जाते हैं। एक बार भरतपुर (राजस्थान) भी गये, परन्तु वहाँ तक आना-जाना इत्यादि कार्य हेतु भाड़ा बहुत अधिक आता है। अभी तक उनका रिकॉर्ड है कि 36 डिब्बों से 9 टिन अर्थात् 200 किग्रा शहद प्राप्त किया है। इस कार्य में खासकर तुन के वृक्ष की लकड़ी से निर्मित बक्से कार्य में लिये जाते हैं, जिनकी कीमत लगभग रुपया 1000 प्रत्येक आती है। एक वृक्ष से लगभग 25 से 30 बक्से निर्मित हो जाते हैं। उनका कहना है कि औषधीय महत्व के आधार पर नीम का शहद अति उत्तम, लीची उत्तम, यूकेलिप्टस व सरसों का मध्यम दर्जे का साबित होता है।
पूरन चन्द्र चन्दोला के पास वनस्पतियों व उससे निर्मित उत्पादों के बारे में विस्तृत जानकारियाँ मौजूद हैं। उनका नारा है, ‘‘जल के प्राण वृक्ष, वृक्ष के प्राण धरती, धरती की रक्षा करना मनुष्य व समाज का कर्तव्य है।’’
इसका शीर्षक यह भी हो सकता था “उत्तराखण्ड में स्वरोजगार का माडल- पूरन चन्द्र चन्दोला”
स्पर्श गंगा के लिये ब्रांड़ एम्बेसडरों को चुनने वाली सरकारें क्या कभी पहाड़ की ज्वलंत समस्याओं के निराकरण के लिये भी ध्यान देगी?