हरदा ठीक ही ठहरा 
शहर जाकर तुम भी बदल गये
तुम्हारे बदलते ही बदल गया समयचक्र
समय से पहले पकने लगे हैं काफल और हिसालू
और फसल सूखने के बाद बरसता है आसमान
कुछ होता भी है तो चले आते हैं जंगली जानवर
कहीं खो गयाी है फूलदेई और घुघुती
फलों में बौर लगते ही होने लगती है
बेमौसमी बड़े-बड़े ओलों की मार।
मुझे आज भी याद है तुम्हारा पहली बार
गाँव छोड़कर जाना।
देवीथान में करार मांगना, भेट चढ़ाना
डबडबाती आँखों से हमें
लहलहाती फसलों के सपने दिखना
फिर आँसुओं की छोटी-छोटी नदिया निकाल कर
कई बीजों को हमारे दिलों में रोपना
और हमारा, तुम्हारी सलामती के लिये
ईष्टदेव के चरणों में दण्डवत होना।
सालों बाद तुम्हारा घर आना
हमें देखकर अजनबियों की तरह रास्ता बदल लेना
हरदा तुम तो शब्दों के भण्डार हो
हर बात की काट अपने साथ लाये हो
हम बंगरुटियाँ छाप सूखे पेउ़ों पर/
खुशबूदार बेलों की तरह
कुछ समय के लिये तुम ऐसे चढ़ जाते हो
जैसे पेड़ सदाबहार हों।
हरदा तुम तो चले गये
पर घूर में लटका तुम्हारा हुड़का
तुमसे ऐंचे-पेंचे का हिसाब जरूर मांगेगा
बूढ़ा जर्जर मोतिया बल्द, खाली बंजर खेत,
बेडू, मडुवे की रोटियाँ, सूखते नौले,
झोउ़ा, चाँचरी और कच्ची खुमानियां
तुम्हारे सपनों में आयेगी और पूछेंगी
कब आओगे घर, चिट्टी लिखना
हरदा तुम लिख सकोगे चिट्टी ?
तुम्हें डर है कि कहीं गाँव से कोई
चार तिनड़े हरेले के लेकर
कुछ माँगने न आ जाय
हरदा ठीकी ठैरा
बखत भी तो बदलने वाला ठैरा बल।
अभी परसों चैपाल में तुम
कुछ ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कह रहे थे
हरदा, कहीं ये भी वही तो नहीं है।
bhuwan ji aap ki kavita man ko chhooti hai…nainital samachar ka anugrah manta hoon jo usne aapki bhawana se sabhi bhaag chuke…chhama karna ji… pahadion ko…yah kavita sunai hai