अन्ततः नदी बचाओ अभियान के दबाव में आकर उत्तराखंड शासन को आन्दोलनकारियों की बात सुननी ही पड़ी। 14 मई की शाम मुख्य सचिव एस.के. दास की अध्यक्षता में उनके ही सभा कक्ष में एक बैठक बुलाई गई, जिसमें नदी बचाओ अभियान से जुड़े प्रतिनिधियों के अतिरिक्त उत्तराखंड जल विद्युत निगम लि. के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक, उत्तराखंड इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट कम्पनी लि. के प्रबंध निदेशक, सचिव ऊर्जा, सचिव वन तथा प्रमुख सचिव विभापुरी दास मौजूद थे।
अभियान के संयोजक मंडल की ओर से राधा बहन ने बताया कि अव्यावहारिक तरीके से बनने वाली जल विद्युत परियोजनाओं से उत्तराखंड के लिये व्यापक खतरा पैदा हो गया है। स्थानीय आबादी बुरी तरह प्रभावित है। लिहाजा ऐसी सभी बाँध परियोजनाओं पर रोक लगनी चाहिये। यहाँ की नदियों का जल स्तर लगातार घट रहा है। लेकिन जलागम क्षेत्रों में बाँज-उतीस आदि के वृक्षारोपण जैसे कोई सकारात्मक प्रयास करने के बदले पानी का बेतरतीब दोहन किया जा रहा है। जीवनदायिनी सदानीरा नदियाँ भोग की वस्तु नहीं हो सकतीं। सरकारी हस्तक्षेप के बढ़ने और जनता को वनाधिकारों से वंचित रखने के कारण ग्रामीण वनों की आग बुझाने भी नहीं जाते। विद्युत परियोजनाओं के कुल उत्पादन का सिर्फ 12 प्रतिशत राजस्व ही राज्य को मिलना है। सरकार को चाहिये कि छोटी-छोटी विद्युत परियोजनाओं का निर्माण स्वयं करे। यदि स्थानीय लोग परियोजना नहीं चाहते हैं तो जबरन नहीं बनानी चाहिये।
हिमालय पर्यावरण आश्रम, मातली, उत्तरकाशी के सचिव सुरेश भाई ने कहा कि सरकार आपदाओं के प्रति सचेत नहीं है। रायड़ी की महिला मंगल दल अध्यक्षा सुशीला देवी का कहना था कि हमारी आजीविका का आधार खेती है, मगर सरकार हमें बर्बाद करने पर तुली है। हमने संघर्ष कर पिछले छः माह से कम्पनी का काम बंद करवा रखा है। रायड़ी गाँव के ही गजपाल सिंह नेगी ने बताया कि एल.एन.टी. कम्पनी द्वारा मंदाकिनी नदी पर सिगोली-भटवाड़ी नाम से बनाई जा रही 99 मेगावाट क्षमता की जल विद्युत परियोजना की विस्तृत परियोजना तथा पर्यावरणीय आंकलन रिपोर्ट में जनता का पक्ष नदारद है। कम्पनी के लोग ग्रामीणों को तोड़ने और खरीदने में लगे हैं।
जनदेश के लक्ष्मण सिंह नेगी ने बताया कि परियोजनाओं के पर्यावरणीय आंकल रिपोर्ट में जनता का पक्ष, स्थानीय भागीदारी, लोक ज्ञान विज्ञान, परम्पराओं आदि का ध्यान नहीं रखा जा रहा है। एन.टी.पी.सी. द्वारा धौली गंगा में बनाई जा रही 170 मेगावाट की लाता तपोवन विद्युत परियोजना के जन विरोध के बावजूद अखबारों में छपा दिया गया कि जनसुनवाई हो गई। असंतुष्ट ग्रामीणों ने उपजिलाधिकारी जोशी मठ व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के लोगों को जनसुनवाई किये बगैर वापस लौटा दिया। एन.टी.पी.सी. द्वारा ही धौली गंगा में बनाई जा रही 500 मेगावाट की तपोवन से हेलंग अणिमठ विद्युत परियोजना, टी.एच. डी.सी. की 444 मेगावाट की हेलंग हाट परियोजना आदि से भी जबर्दस्त आक्रोश है। गंगा रक्षक समिति टिहरी के अध्यक्ष पूरन सिंह कठैत की शिकायत थी कोटली भेल विद्युत परियोजना से बन रहीं तीन झीलों से 30-35 किमी. क्षेत्र से अधिक नदी घाटी समाप्त हो रही है। फिलहाल तीन माह से कम्पनी का काम जनता ने रोका है।
पी.एस.आई. देहरादून के वैज्ञानिक रवि चोपड़ा ने कहा कि समस्त परियोजनाओं की जब तक सही पर्यावरणीय आंकलन नहीं होता, तब तक निर्माण कार्यों पर रोक लगे। बांध परियोजनाओं से नदियों में प्रदूषण बढ़ रहा है और पारिस्थितिकी तंत्र के लिये खतरा उत्पन्न हो गया है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन व प्रबंधन का हक यहाँ के लोगों को मिलना चाहिये और जनता के हक-हकूक सुनिश्चित किये जाये। सरकारी आँकड़ों के अनुसार ही जब नदियों का जल स्तर कम हो रहा है तो क्या ये जल विद्युत परियोजनायें 40 वर्षों तक चल पायेंगी ? 60 वर्ष तक उत्पादन कर सकने की क्षमता वाला अमेरीका का हुंगर बाँध मात्र 9 वर्षों में उत्पादन बंद कर देता है, तो ये कैसे पूरी अवधि चल पायेंगी ? अधिकारियों द्वारा अपना पक्ष न रखने पर मुख्य सचिव एस.के. दास ने कहा कि वे बैठक की रिपोर्ट बनाकर मुख्यमंत्री को सौंप देंगे। फिर मंत्रिमंडल में बातचीत के बाद जो सुझाव आयेंगे तदनुसार सरकार कार्रवाही करें।
तमाम तरह की ठेकेदारियों में लिप्त ये विधायक/मंत्री ही ऊर्जा प्रदेश का नारा देकर जनता को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। बागेश्वर के सौंग गाँव में सरयू नदी पर बनाये जा रही परियोजना के विरोध में 1 जनवरी 2008 से लगातार आमरण अनशन कर रहे ग्रामीण मुख्यमंत्री को अपनी व्यथा सुनाने और उनसे आश्वासन पाने के बाद भी उस विनाशकारी परियोजना से मुक्ति नहीं पा सके हैं। फलिण्डा (टिहरी) में बन रही विद्युत परियोजना का काम ग्रामीणों ने फिर रोक दिया है, क्योंकि कम्पनी ने 4 मई 2006 को हुए ऐतिहासिक समझौते के किसी भी बिन्दु का पालन नहीं किया। ऐसे में यदि ये विधायक/मंत्री ही परियोजनाओं का निर्णय करेंगे तो क्या उम्मीद हो सकती है ? इस बैठक से तसल्ली यही हो सकती है कि सरकार ने बातचीत के दरवाजे खोले तो सही!
























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