जन्मदिन (10 सितम्बर) पर याद
पंडित गोविन्द बल्लभ पंत में तिलक की देशभक्ति, महात्मा गांधी की शांतिप्रियता एवं सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति का समन्वय था। वे दूरदर्शी एवं कुशल प्रशासक थे। वृद्धावस्था के कारण उनका प्रकम्पित शरीर शिथिल दिखाई पड़ता था, परंतु उनकी कार्यशक्ति अद्भुत थी। उन्होंने अनेक जटिल समस्याओं को बड़ी कुशलता से सुलझाया।
पंडित गोविन्द बल्लभ पंत का जन्म 30 अगस्त 1887 को हुआ था। 1946 में दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने पर उनका जन्म दिवस पहली बार सार्वजनिक रूप से लखनऊ में मनाया गया। उस साल अनंत चतुर्दशी 10 सितम्बर को थी। तब से 10 सितम्बर को उनकी जन्मतिथि मान ली गई। उनके पिता मनोरथ पंत गढ़वाल में राजस्व विभाग में कार्यरत थे। उनकी माता श्रीमती गोबिन्दी दनिया के रायबहादुर पंडित बद्रीदत्त जोशी की पुत्री थी। आपका जन्म अल्मोड़ा के निकट स्याही देवी पर्वत की तलहटी में स्थित एक छोटे से गाँव खूँट में हुआ। चार वर्ष की आयु में उनके नाना पंडित बद्रीदत्त जोशी जी उन्हें अल्मोड़ा ले गये। बद्रीदत्त जी की योग्य प्रशासक के रूप में काफी ख्याति थी। नाना के कार्यकलापों से उन्हें सामाजिक सक्रियता की प्रेरणा मिली। सन् 1897 में पंत जी ने रैमजे कॉलेज में प्राथमिक पाठशाला में प्रवेश किया। 12 वर्ष की आयु में पंत जी का विवाह हो गया। कुछ ही समय बाद नाना जी का देहांत हो जाने से उनका पूरा परिवार प्रभावित हुआ।
1903 में हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की और 1905 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। 1909 में कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हीं दिनों उनकी पहली पत्नी गंगादेवी का देहांत हो गया। उनका दूसरा विवाह 1912 में हुआ परंतु दूसरी पत्नी भी 1914 में चल बसीं। तत्पश्चात् घर की परिस्थिति से विवश होकर उन्होंने काशीपुर के तारा दत्त पाण्डे जी की पुत्री कला देवी से 30 वर्ष की अवस्था में 1916 में पुनः विवाह किया, जिनसे उन्हें तीन संतानें हुईं, दो पुत्रियाँ लक्ष्मी, पुष्पा तथा एक पुत्र कृष्ण (राजा)। एल.एलबी. परीक्षा पास करने के बाद पंत जी ने अल्मोड़ा में वकालत प्रारम्भ की, परंतु शीघ्र ही रानीखेत चले गये और वहाँ से काशीपुर तथा अंत में नैनीताल बस गये। एक अच्छे वकील के रूप में उनकी कुमाऊँ में बहुत अधिक माँग थी और उन्होंने अच्छा नाम तथा धन कमाया। एक वकील के रूप में सुप्रसिद्ध काकोरी मुकदमे में वे अपने शीर्ष पर थे।
काशीपुर में उस समय सामाजिक तथा राजनैतिक चेतना की एक लहर चल रही थी। केशव सेन, रवीन्द्र बाबू व स्वामी विवेकानन्द के इस क्षेत्र में आने से एक नव जागरण का सूत्रपात हुआ। काशी नागरी प्रचारिणी सभा साहित्यिक और सांस्कृतिक जागरूकता पैदा करने की दिशा में काम कर रही थी। पंत जी ने हिन्दी भाषा की शाखा के रूप में, 1914 में प्रेम सभा की स्थापना में प्रमुख कार्य किया। इसी वर्ष उनके प्रयत्न से काशीपुर में पहले हाईस्कूल, उदय राज हाईस्कूल की स्थापना हुई। 1916 में वे काशीपुर नोटिफाइड एरिया के सदस्य बने। तब तक वे कुमाऊँ के सर्वमान्य नेता बन चुके थे। कुमाऊँ परिषद के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। परिषद की मुख्य उपलब्धि कुली बेगार प्रथा का उन्मूलन था। महात्मा गांधी के आह्वान पर पंत जी ने स्वयं को स्वतंत्रता संघर्ष में झोंक दिया। उन्होंने 6 अप्रेल 1919 को रोलेट ऐक्ट के विरोध में काशीपुर में भाषण दिया। मांटेग्यू चैम्सफोर्ड सुधार के अंतर्गत 1923 में वे संयुक्त प्रांत विधान परिषद के लिये चुन लिये गये और शीघ्र ही स्वराज पार्टी के नेता नियुक्त हुए। 30 जनवरी 1924 को परिषद् में अपने पहले ही भाषण में उन्होंने कठोर वन कानूनों से पीड़ित कुमाऊँ वासियों की व्यथा को मुखरित किया।
1927 में पंत जी संयुक्त प्रांत कमेटी के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1928 में पं. जवाहर लाल नेहरू जी के साथ लखनऊ में साइमन कमीशन के विरोध में सत्याग्रहियों के प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए उन पर भारी लाठी प्रहार हुआ। 1928 को पंत जी नैनीताल जिला बोर्ड के पुनः चेयरमैन चुने गये। 1928 में ही संयुक्त प्रांत परिषद ने नायक सुधार कानून पास किया। 6 अप्रेल 1930 को गांधी जी ने नमक आंदोलन शुरू कर दिया। हल्द्वानी में एक सभा करने के कारण पंडित पंत को छः माह की जेल हुई। 1931 वे में कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य बने और मृत्युपर्यन्त इस रूप में दल को अपना योगदान देते रहे। 1934 में वे केन्द्रीय विधान सभा के सदस्य चुने गये। 17 जनवरी 1935 को विधान सभा के कांग्रेस दल की बैठक में भूला भाई देसाई को नेता तथा पंत जी को उपनेता चुना गया। एक कुशल सांसद के रूप में पंत जी की ख्याति लगातार बढ़ती गई।
1937 में संयुक्त प्रांत की विधान सभा के चुनाव में खड़े होने के लिये गोविन्द बल्लभ पंत को त्यागपत्र देना पड़ा। चुनाव में विजयी होकर वे प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और इस पद पर 1939 तक रहे। 24 नवम्बर 1940 को वे व्यक्तिगत सत्याग्रह में गिरफ्तार हुए; 17 नवम्बर 1941 अल्मोड़ा जेल से उनकी रिहाई हुई और 9 अगस्त 1942 भारत छोड़ो आन्दोलन के सिलसिले में वे मुंबई में गिरफ्तार हुए। 1945 में अहमदाबाद जेल से रिहाई के बाद वे 1946 से 1954 तक उत्तर प्रदेश के दुबारा मुख्यमंत्री बने। 1 दिसम्बर 1954 को पंत जी केन्द्रीय मंत्रिमंडल में कैबिनेट स्तर के मंत्री नियुक्त हुए और 10 जनवरी 1955 को उन्होंने भारत सरकार के गृह मंत्री का पद भर सम्हाला। 26 जनवरी 1957 को उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 20 फरवरी 1961 को उन पर पक्षाघात का आक्रमण हुआ। 7 मार्च 1961 को पंडित पंत का देहान्त हो गया।
देश के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में पंडित गोविन्द बल्लभ पंत का विशाल व्यक्तित्व पचास वर्षों तक छाया रहा।
























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