उत्तराखण्ड प्री-मेडिकल टेस्ट में प्रवेश परीक्षा के लिए मूल निवास प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता ने प्रदेश में राजनैतिक तूफान खड़ा कर दिया। तीन मैदानी जिलों के प्रशासन ने ऐसा कोई नियम न होने का आधार बता कर प्रमाण-पत्र देने से इंकार कर दिया। राज्य के मुख्य सचिव सुभाष कुमार का भी कहना था कि यू.पी.एम.टी. के लिए मूल निवास की कोई अनिवार्यता नहीं है। इसके विपरीत प्रमुख सचिव (चिकित्सा शिक्षा) विनीता कुमार का कहना था कि उत्तराखण्ड मूल के दूसरे राज्यों में रह रहे छात्रों को यह पेश करना ही होगा। यह शर्त नहीं लगाई गई तो बाहरी राज्यों के छात्र यहाँ के मेडिकल कॉलेजों की सीटों पर कब्जा कर लेंगे। यू.पी.एम.टी. की परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों को परेशानी होने लगी तो सरकार ने मूल निवास प्रमाण-पत्र बनाए जाने का शासनादेश जारी करने का निर्णय किया। यह शासनादेश जारी किए जाने का फैसला लेते ही पहाड़ विरोधी मानसिकता से ग्रसित सत्ताधारी दल के नेता सक्रिय हो गए। सरकार ने दबाव में आकर मूल निवास प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता को खत्म करने का मन बना लिया और प्रस्ताव किया कि मूल निवास की बजाय स्थायी निवास प्रमाण-पत्र को ही मान्यता दी जाय। दरअसल स्थायी निवास प्रमाण-पत्र से उन लोगों को ज्यादा लाभ मिलेगा, जो इस राज्य के मूल निवासी नहीं हैं। स्थाई निवास प्रमाण पत्र बड़ी आसानी से बन रहे हैं। इन्हें बनाने वाले लोग उत्तराखण्ड में तो हर तरह का लाभ ले ही रहे हैं, अपने मूल राज्य में भी मूल निवासी होने के कारण लाभ लेते हैं।
मूल निवास प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता समाप्त किए जाने की भनक लगते ही उत्तराखण्ड क्रान्ति दल ने तीखा प्रतिवाद किया। 01 अगस्त 2011 को उक्रांद अध्यक्ष पंवार ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि उनका दल इस तरह की हरकतों का तीखा विरोध करेगा और जरूरत पड़ने पर आंदोलन भी। इस विरोध के बाद सरकार को रक्षात्मक होना पड़ा। मुख्यमंत्री ने मूल निवास की अनिवार्यता को समाप्त किए जाने की संस्तुति वाली फाइल रोक ली। मूल निवास प्रमाण पत्र की अनिवार्यता समाप्त करने के प्रयासों के विरोध में उतरे उक्रांद अध्यक्ष त्रिवेन्द्र पंवार का राज्य आंदोलन के दौरान इसके विरोधी रहे तत्वों द्वारा 4 अगस्त 2011 को ऋषिकेश में पुतला फूँका। इन तत्वों की ऐसी हरकतों की पूरे राज्य में तीव्र निंदा हुई। उक्रांद ने अपना आंदोलन तेज किया। प्रदेश भर के अनेक अन्य संगठन भी विरोध में मुखर हो गये। इस विरोध के कारण राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग ने ए.एन.एम. और जी.एन.एम. परीक्षाओं के लिए मूल निवास की अनिवार्यता लागू कर दी है। सरकार सहम गयी है और उसने फिलहाल इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।