सभ्य समाज के पास ज्ञान होता है, संसाधन होते हैं, उपभोग होता है, और ढेर सारा कचरा होता है। कचरे को वह या तो किसी खाली प्लाट में डाल देता है या पड़ोसी के आंगन में या फिर नदी, नाले, नहर में विसर्जित कर देता है। बस अपना घर साफ रहना चाहिये।
गौला नदी का पानी रानीबाग के श्मशान से ही पानी कम, मुरदों का जूस ज्यादा हो जाता है। घोर प्रदूषित यह पानी हल्द्वानी में पेयजल बन कर नहरों द्वारा गौलापार और हल्द्वानी भाबर की बची-खुची काश्तकारी के लिए सिंचाई हेतु प्रयोग होता है। इस पानी में शहर भर का कचरा बहाया जाता है। पॉलीथीन, मुर्गे के पंख, थर्माकोल के टुकड़े, मरे जानवर, अस्पतालों का कचरा, खाली बोतलें, अंड-बंड चीजें, जो भी इस्तेमाल हो चुकें हों, नहर में बहा दिये जातें हैं। शहर भर की गंदी नालियाँ नहर में निस्तारित की जाती हैं, जिसके बाद गूलों में पानी की जगह काले रंग का डरावना द्रव बहता है। यह पानी टनों कचरा साथ लाता है, जिससे नहरों में जाम लग जाता है और ये उफन कर सड़क पर आ जाता है। अगर ये खेतों तक पहुँचा तो खेतों में पॉलीथीन और कूड़ा करकट भर जाता है। काश्तकार के सिर पर एक अतिरिक्त काम आ जाता है, इस कचरे को बीन कर अलग करना। यह पानी जानवरों के पीने योग्य नहीं है। जानवर इसे पीकर बीमार पड़ जाते हैं।
ये बात भले ही आज कल्पना लगे पर सच है कि तीस साल पहले नहर का पानी साफ-सुथरा और पारदर्शी था। यह न सिर्फ भाबर की जमीन सींचता था, बल्कि बतौर पेयजल इस्तेमाल होता था। शहर के बीच से इंदिरा नगर से होती हुई नहर, जो नवीन मंडी के पास खुलती है, तो सीवर बन चुकी है। मल-मूत्र और काले रंग के कचरे का यह गाढ़ा घोल मुख्य नहर में मिल जाता है। एक नहर तो कब्रिस्तान गेट से मंडी तक अब कचरे से भर कर भूमिगत हो गयी है। काश्तकारों ने कचरे को लेकर कई बार प्रर्दशन किये। मगर कोई नतीजा नहीं निकला। उल्टे पिछले दिनों तीन पानी के पास शहर भर के कचरे के कारण नहर जाम हुई और सारा कचरा सड़क पर आ गया। बरेली रोड बंद हो गई। गौजाजाली के ग्रामप्रधान हेमंत पाठक ने अपनी जेसीबी से घंटो कचरा हटाया। मगर अब भी हालात सुधरे नहीं। स्थानीय विधायक हरीश दुर्गापाल ने तब कहा था कि 48 घंटो के भीतर समस्या का समाधान कर दिया जायेगा। पर मामला दो विभागों, नगर निगम और सिंचाई विभाग के बीच नहर में फँसे कचरे की तरह उलझा हुआ था। विधायक की बैठक खत्म और समस्या जस की तस। गोरापड़ाव के ग्राम प्रधान दरबान सिंह नहर खुलवाने को भागते रहते हैं। इंदिरा नगर के गंदे नाले का डायवर्जन गौला में किये जाने का प्रस्ताव रखा गया, पर बीच में मामला रेलवे विभाग (रेल-पटरी) के पाले में फँस कर उलझ गया है। केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच सहमति बने बगैर यह नहीं हो पायेगा। ये बात और है कि गौलापार और तमाम जगहों, अमृतपुर, रुद्रपुर, सिडकुल आदि स्थानों पर राज्य सरकार ने ’दीगर महकमों’, जो केन्द्र सरकार के हैं, जमीनें आबंटित कर दीं। करोड़ों रुपयों से वहाँ कालोनियाँ, ऑफिस जाने कब बनकर खड़े हो गये। मगर छः- बारह फुट नाली निकासी के लिए मामला फँसा पड़ा है।
काठगोदाम से सुशीला तिवारी अस्पताल तक अब नहर के मुख्य भाग को कवर किये जाने का काम चल रहा है। इससे शायद राहत मिले, क्योंकि कम से कम 13 किमी कवर्ड नहर में लोग कचरा नहीं डाल पायेंगे। शहर के बीच से गुजरती नहर में तो लोग दबादब कचरा डालते हैं। वैसे काठगोदाम के पास एक बोर्ड लगा था, ‘नहर में कचरा डालना दंडनीय अपराध है।’ पर प्रशासन की इसी बात पर गले-गले आयी रहती है कि शहर में ट्रैफिक संभाले या अतिक्रमण हटाये। तो नहर में कचरा डालने वालों को कौन दंडित करे, कब दंडित करे? सम्मानित बुजुर्ग कुत्ते घुमाते हुए कुत्तों को सड़क में हगाते हैं और कचरे की थैली नहर में डालते हैं। टोको तो अपने पद और प्रतिष्ठा की याद दिला देते हैं। ये भी इस शहर का स्वभाव है कि लोग बात-बात पर झगड़ा करने को उतारू रहते हैं। सयानी पहाड़ी महिलायें, सुदर्शन लड़कियाँ, युवा…… सबके सब घर का कूड़ा नहर में फेंकते हैं। ये बात नहीं कि इनको समझ नहीं है। नैतिकता की आदर्श की ऊँची-ऊँची बातें इनसे कभी भी सुनी जा सकती हैं।
सिंचाई के लिये जमरानी बाँध के नाम पर पूरा विभाग बरसों से कार्यरत है। जमरानी कालोनी है दमुआढूंगा में। एक पीढ़ी के कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं। पर बाँध निर्माण के नाम पर एक ईटं भी नहीं लगी है। भाबर क्षेत्र की काश्तकारी की जीवन रेखा, ये नहरें कचरे से पट गयीं हैं। सैकड़ों ट्यूबवैल हैं, पर सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने के बजाए पेयजल में भी वितरित होता है तो वह भी ठीक समय पर मोटर फुँक जाने से ठप्प पड़े रह जाते हैं। आये दिन पानी की बारी को लेकर काश्तकारों में झगड़े होते हैं। हालाँकि ये नयी बात नहीं है। पहले भी भाबर के काश्तकारों में दूसरों का पानी चुरा लेने पर झगड़े होते रहे हैं। बीघे भर का टुकड़ा झोलने के (सींचने) लिये आपस में काश्तकार एक दूसरे से या तो गिड़गिड़ाते हैं या फिर झगड़ते हैं। हालाँकि झगडे़ दिल में नहीं रखे जाते, पर होते तो हैं ही। भाबर की काश्तकारी, जिस पर बड़ी आबादी टिकी है, पर बँटाईदारों, किसानों के परिवार चलते हैं। मण्डी परिषद, नगर निगम, सिंचाई विभाग, जिलेदारी कार्यालय इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से आँख चुराते हैं। नहरों के अपासी पानी पतरौल (पानी वितरक), जिन्हे स्थानीय लोग अपासी कहते हैं, को ढूंढना मुश्किल पड़ जाता है। सिंचाई विभाग को नहरों की गंभीरता से देखरेख और प्रशासन के सहयोग से नहर को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ दंडात्मक अभियान चलाना चाहिये, तभी जाकर बात बनेगी।