पूर्वी छोर गौला नदी के किनारे से कटघरिया तक 10 किलोमीटर और काठगोदाम से तीन पानी तक 14 किमी, कुल 140 वर्ग किलोमीटर के इस दायरे में फैले हल्द्वानी शहर की घोषित आबादी तीन लाख के करीब है। इसमें किराये में रहने वालों की सही संख्या का आंकलन नहीं हो पाया है। हर मुहल्ले में, हर कालोनी में किरायेदार रहते हैं। मकान मालिकों की आय का एक स्थायी जरिया किरायेदार हैं। तीस हजार के करीब लोग हल्द्वानी में किराये के मकानों में रहते हैं। ये शहर की अतिरिक्त अस्थायी आबादी है।
सन् अस्सी के बाद हल्द्वानी शहर में घरों के लिये जमीन खरीदने का सिलसिला धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा। इससे पहले सड़कों और अन्य महत्वपूर्ण जगहों पर, ग्राम पंचायत या कैनाल की जमीन जो सड़क के किनारे थी, वहाँ बैठे लोगों को शुरूआती जमीन के खरीद-फरोख्त करने वाले गलेदारों ने लोगों को दूसरी जगहों पर बदले में जमीन देकर सौदा-बदला किया और सड़क के किनारों की जगहों से उठाकर उन जमीनों की भावी कीमत को बढ़ाया। इस तरह जमीनों की गलेदारी, जिसे आजकल ‘प्रापर्टी डीलिंग’ के भव्य नाम से पुकारा जाता है, की कईं तरीके से शुरूआत हो गयी। ऐसा नहीं कि इससे पहले भाबर में जमीनों की खरीद-फरोख्त न होती हो। मगर तब एक-दो एकड़ या इससे बड़ी काश्तें बेची-खरीदी जाती थीं। खन्ना फार्म, सिंधी फार्म, दयाल फार्म, सरदार की रोढ़ी फार्म, खटीक फार्म, हिमालया फार्म, जज फार्म जैसी तबकी पचास से सौ एकड़ तक की बड़ी जोतें, अब कालोनियों में बदल गयीं हैं या फिर छोटी-छोटी एकड़-दो एकड़ की काश्त में तब्दील हो गयीं हैं। जगह का पुराना नाम कायम है, मगर फार्म जैसी कोई चीज नहीं रह गयी है। शहर का विस्तार कालोनियों के रूप में हो गया है और सैकड़ों कालोनियाँ अस्तित्व में आ चुकी हैं। रोज दर्जनों भवनों की छतें ढाली जा रही हैं और नये मकान बन रहे हैं।
पुरानी जमीन के गलेदारों (दलालों) में कुछ लोग तो तबाह हो गये, क्योंकि इनको जमीनों की दुकानदारी की बदलती समझ की दूरदर्शिता नहीं थी। मगर जो कुछ समझदार लोग थे, उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी को ये काम सौंप दिया। जमीनों की खरीद-फरोख्त का धंधा समानांतर माफिया लाबी और नेताओं के संरक्षण में जटिल हो गया। जमीन खाली कराने व औने-पौने दामों में खरीदने का काला धंधा पनपने लगा। अब इसमें कई लोग अपनी जान से भी हाथ धो बैठते हैं, पर कुछ दिन दबी-दबी चर्चा के बाद मामले का निस्तारण हो जाता है। शांत और सभ्य दिखने वाले और ताकतवर लोग बड़ी-बड़ी सफेद गाडि़यों- सफारी, इनोवा, स्कॉर्पियो, बुलेरो, फारच्यूनर, होंडा सी.आर.बी में ही नमूदार होते हैं। कम बोलते हैं और भाषा भी फ्यूडो-कॉमर्शियल होती है। भाबर क्षेत्र की इंच-इंच जमीन की इनको खबर रहती है। नेताओं, माफिया, काश्तकार से होती हुई ये चेन नीचे तक जाती है, जहाँ छोटे-मोटे ‘प्रापर्टी एडवाइजर कम दलाल’ ग्राहक तलाशते हैं। लोगों से कहते फिरते हैं, बताना यार कोई खरीदार है तो दो परसेंट आपका भी बनवा देंगे। आज हल्द्वानी शहर में हर तीसरा व्यक्ति प्रॉपर्टी डीलर है। उसके अपने तमाम धंधों में एक अघोषित धंधा ये भी शामिल है- क्या पता कब ग्राहक टकरा जाये!
वर्ग चार की जमीन, वर्ग ख की जमीन, नजूल की जमीन, खाम की जमीन, लावारिस और खुर्द-बुर्द की गई जमीन, ग्राम पंचायत की जमीन, नगर निगम की जमीन……..न जाने कैसे और कब ये फ्रीहोल्ड हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। साथ ही पहाड़ों में भी नाली मुट्ठी की नाप लिये जगह-जगह की खरीद-बेच की जमीनों की सूची ये अपने साथ रखते हैं। खेतों में कटे प्लाटों में गड़ी खूँटियाँ जगह-जगह काश्तकारी की जमीनों में देखी जाती हैं। हल्द्वानी क्षेत्र के दूरस्थ गाँवों में अब ग्रेटर हल्द्वानी जैसे नाम दिये गये हैं जो भविष्य की नयी कालोनियों की सूचक हैं। दो-तीन साल में यहाँ कालोनियाँ खड़ी हो जायेंगी। हालत ये है कि आज आप प्लाट लेकर छोड़ दो और छः महीने में लौटोगे तो आपको गश आ जायेगा कि आपका प्लाट था कहाँ पर ? नक्शा-सूरत ही बदल चुकी होगी। जंगल से सटी जमीनें बढ़ा दी गयीं होंगी और आप पता करेंगे कि ये प्रॉपर्टी/जमीन किसकी है तो जरा सी खोजबीन के बाद आपको ताकतवर नेता, विधायक या दबंग आदमी का नाम सुनने को मिलेगा। तहसील महकमा और जमीन रजिस्ट्रीकरण ऑफिस उनकी जमीनों के लिये रास्ता साफ कर रहे होंगे।
हल्द्वानी शहर को आप ‘गूगल अर्थ’ की नजर से देखें तो जो तस्वीर दिखती है, वो बड़ी डरावनी है। इस शहर को अब योजनाबद्ध नहीं बसाया/बनाया जा सकता है। जैसे बन गया है, आगे भी वैसे ही बढ़ता जायेगा। प्रापर्टी की ताकतवर लॉबी के पास उत्तराखण्ड की पहाड़ और तराई की सारी जमीनों की न सिर्फ जानकारी है, बल्कि खरीद-फरोख्त संबंधी कानून को वापस लेने, बदलने या मनमाफिक बनाने की कूवत भी है। धार की जमीन, सेरे की जमीन, बंजर जमीन, सिंचित जमीन…….. आज पहाड़ के पुराने गाँव जो बंजर पड़े हैं, उनको कैसे, कहाँ, कब किस तरह से उपयोग में लायेंगे ये योजनायें उनकी फाइलों में तैयार हैं। घीरे-धीरे वे अपनी इन कार्ययोजनाओं पर अमल करना शुरू करेंगे। फिलहाल यह बात अतिशयोक्ति लग सकती है, पर परियोजना-संरक्षण और पुनः बसासत के नाम पर ये काम आगे किये जायेंगे।
तराई में हजारों एकड़ सीलिंग की जमीनें व बड़ी जोते हैं। मंगल देव विशारद कमेटी की रिपोर्ट मिलती ही नहीं है। हालाँकि तराई के जोतदारों को सीलिंग एक्ट का विशेष डर नहीं था, फर्जी मालिक दिखाकर वे जमीन वैध बनाये रखते थे। पर इधर हल्द्वानी शहर से ऊँचे दामों में जमीन बेचकर काशीपुर, बाजपुर, खटीमा, नानकमत्ता, जसपुर में हजारों एकड़ जमीन खरीदकर हल्द्वानी में काश्तकारों ने न सिर्फ यहाँ की बड़ी जोतों को छोटी जोतों में बदला है, बल्कि सीलिंग एक्ट में आती जमीन खरीद कर बड़े जोतदारों को राहत दी है। ये बारीक बदलाव है जो समझ में आता है और दिखता भी है, पर इसको विषय बनाकर खोजा नहीं गया है। बदलाव का एक चरण पूरा हो चुका है और दूसरा संक्रमण काल में है। जमीनों को लेकर तराई हमेशा सुर्खियों में बनी रहती है। वहाँ की कोर्ट-कचहरियों में जमीन संबंधी दीवानी वाद भी हैं और फौजदारी भी। कचहरी प्रशासन को चलाने के लिए रोज नये मुकदमे आते रहते हैं। वहीं भाबर में जमीन के मुकदमे ज्यादा नहीं हैं, क्योंकि जमीन बचेगी तभी तो मुकदमे भी होंगे।
थारू-बुक्सा और बंगालियों की जमीनों पर कब्जे और औने-पौने दामों पर खरीदने के सैकड़ों वाकये हैं। तराई की जमीनों पर बसे ये लोग आज खेतिहर किसान से खेतिहर मजदूर में बदल गये हैं। कई तो अपनी ही जमीन में बँटाईदार हो गये हैं तो कई जमीनों से पलायन कर मजदूरी में आ गये हैं। इस पर कुछ समय पहले तक अखबारों में यदा-कदा चर्चा होती थी, पर अब यह विषय अखबारों के लिये अछूत है। सुप्रीम कोर्ट का यह दिशा-निर्देश, कि दलित की जमीन सिर्फ दलित ही खरीद सकता है, जमीन माफियाओं के लिए बड़ी फाँस है। इसका तोड़ ढूँढने में वे जोर-शोर से लगे हैं। लेकिन ऐसा भी किया गया है कि दलितों की पूरी कॉलोनी दूसरी जगह शिफ्ट कर दी गयी, मगर रजिस्ट्री की प्रक्रिया न कर दस-दस रुपये के स्टांप पेपर पर हीं की गई और इकरारनामा थमा दिया गया। बाद में वह जमीन बिक गयी, जिसकी रजिस्ट्री किसी और ने खरीददार के नाम कर दी। ऐसे कुछ उदाहरण तो हल्द्वानी शहर के पास के हैं।
हर आदमी को जमीन खरीद कर घर बनाना है। पर खरीददार और विक्रेता के बीच जमीनों के रेट आकाश में पहुँचाने वाली बीच की एक परोपजीवी कड़ी है, जो हर चीज का रेट निर्धारित करती है और बगैर जमीन पर दिखे करोड़ों-अरबों रुपये बटोरती है। वे जमीनों के अघोषित मालिक हैं। ये लोग ऐसे हालात पैदा करने में माहिर हैं कि उनकी पसंदीदा जगह, भले ही वह किसी के कब्जे में हो, उस व्यक्ति को मजबूर कर देते हैं जमीन बेचने के लिये। जमीनों की खरीद-फरोख्त का यह बहुत ताकतवर धंधा है, जो उत्तराखण्ड राज्य की मशीनरी पर भारी पड़ता है। ऐसे लोग ही राज्य मशीनरी को चला रहे हैं और सरकार की सोच जमीन की मौजूदा खरीद-फरोख्त के मॉडल को बदलने की नहीं है।