हैलो!…. नैनीताल समाचार और इसे पढ़ने वालो!…. हैप्पी हरेला…। तमाम एस. एम. एस. के जरिये ऐसे ही पहुँचनी हैं आपके फोनों में हरेले की शुभकामनाएँ तो मेरे पत्र में भी ऐसे ही सही। और फिर अब तो नैनीताल समाचार का इन्टरनेट संस्करण भी आ गया है। कुछ तो मॉडर्न यहाँ भी होना चाहिए। खैर…. अब की हरेले के कुछ खास मायने हैं मेरे लिए। उत्तराखण्ड से खिसकने की फिराक में हूँ दरअसल। यूँ तो अभी कुछ पढ़ने-लिखने के बहाने जा रहा हूँ दिल्ली। उम्मीद है कि लौटूँगा वापस…। लेकिन सुना है दिल्ली जकड़ लेती है और मैं जाकर समर्पण ही तो कर रहा हूँ।
नैनीताल समाचार को यह मेरा पहला ही पत्र है। हर बार मैं बेशर्मों की तरह टालता गया था। लेकिन इस बार हरेले का यह पत्र लिखने बैठ ही गया हूँ। उम्मीद है कि नैनीताल समाचार वाले इसे स्वीकार करेंगे। पिछले दिनों आप लोगों ने एक नई पहल की थी। आपसे आये एक ई-मेल ने ‘नैनीताल समाचार’ के लिए कई उम्मींदों को जगा दिया था। इस ई-मेल से पता चला कि आप लोग नैनीताल समाचार के प्रबन्धन को लेकर चिंतित हैं और नई पहल कर इसे सुधारने वाले हैं। इसके बाद सुना कि आपने कुछ जिलों में अपने नियमित प्रतिनिधि रखकर इसमें कुछ शुरूआत भी की। लेकिन ई-मेल में जितनी बड़ी स्ट्रटेजी थी उसके हिसाब से तो अब तक किया गया काम तो नगण्य ही है। अगर काम करने की स्पीड यही रही तो मैं समझता हूँ कि एक बार फिर हताशा ही हाथ आयेगी। उत्तराखण्ड के लिए तो ‘नैनीताल समाचार’ बेशक एक जरूरी अख़बार है, मेरे जैसे नये लिखने वालों के लिए इसकी बहुत ही जरूरत है। मेरे लायक जो काम है, आदेश करें। मैं अपनी जिम्मेदारी पूरी करने की हर सम्भव कोशिश करूँगा।
आजकल फुटबाल का बुखार दुनिया के सिर पर सवार है। हो भी क्यूँ नहीं भई! आखिर बढ़िया खेल है। महज डेढ़ घण्टे का। हर क्षण रोमांच अपने चरम पर और पूरी टीम स्प्रिट का गेम। लेकिन भारत में इसका बुखार कम ही है। बस वर्ल्ड कप के दौरान ही याद आती है इसकी। वह भी दूरी बनाते हुए ही, क्योंकि अपनी टीम तो है ही नहीं वहाँ। टीम वहाँ हो भी कैसे ? दरअसल भारत में लोगों को लात मारना नहीं आता। वरना पिछले 60 सालों से इस देश के जो हाल नेताओं-अफसरों ने मिलकर बनाये हैं, ये उन्हें भी लात मार देते। उत्तराखण्ड की जनता भी इस मामले में पीछे तो है नहीं। लात मारने के मौके भी कई बार इसे मिले हैं।
हरेले का पत्र शुरू कर ही रहा था कि एक खबर ने स्तब्ध कर दिया है। जो-जो लिखूँगा सोचा था, इस ख़बर के उद्वेलन में फँस गया है और इस ख़बर से जुड़ी चीजें मस्तिष्क में हावी हो गई हैं। पता चला कि आन्ध्र प्रदेश में एक माओवादी नेता ‘आजाद’ के साथ हेम पाण्डे की भी एनकाउन्टर में मृत्यु हो गयी है। यह भी बताया जा रहा है कि यह एक फर्जी एनकाउण्टर है। दरअसल हेम दा के साथ बहुत सी मुलाकातें रही हैं मेरी। उनके साथ ही उनके भीतर की बहुत सी खासियतों से भी मिलना हुआ। वे अद्भुत आदमी थे। सहज, सरल, गम्भीर …. और बेशक वैचारिक और समर्पित कम्यूनिस्ट। मैंने उन्हें लिखते-पढ़ते देखा है और उनके लिखे आलेख पढ़ने का भी मौका मुझे मिला है। लेकिन मैं फिर भी उन्हें पत्रकार से पहले एक राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर ही याद कर पाता हूँ। पिथौरागढ़ के अपने छात्र जीवन में वे वामपंथी छात्र संगठन आइसा और उसके बाद ए.आई.पी.एस.एफ. से जुड़ कर राजनीति करते रहे थे। इसके बाद ही मेरे अल्मोड़ा कैम्पस के छात्र जीवन में उनसे मेरी मुलाकातें रही हैं। जब भी मुलाकात हुई वे मुझे राजनीति करते मिले और राजनीति की बातें ही। तो मेरी नजर में तो वे एक वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता ही थे और शायद मेरे अलावा भी उन्हें जानने वाले कई लोग उन्हें ऐसे ही देखते हों। आज अगर इस बात को गौण कर उन्हें पत्रकार ही घोषित कर दिया जाता है तो मुझे लगता है चाहे उनका फर्जी एनकाउण्टर आन्ध्र प्रदेश पुलिस ने किया हो लेकिन उनके विचारों का फर्जी एनकाउण्टर हम कर रहे होंगे।
पिथौरागढ़ की छात्र राजनीति से कई लोग निकले हैं। अपने छात्र जीवन के आदर्शों से परे आज कोई बड़ा प्रभावशाली मंत्री है, कोई खूब मलाई चाट रहा ठेकेदार, कोई गुण्डागर्दी फैला रहा है तो कोई बेचारा हताश किनारे में पड़ा है। ऐसे में इकलौता नाम हेम पाण्डे सामने आता है जिसने अपने छात्र जीवन में बने राजनीतिक विचारों, आदर्शों को शिद्दत से ताउम्र जिया और इन्हीं के लिए कुर्बान भी हो गया। आज जब तात्कालिक तौर पर माओवाद या नक्सलवाद के विचार को सरकारें अपने मीडिया संस्थानों के जरिये सामान्य आतंकवाद प्रचारित और घोषित कर पाने में सफल हो पाई है। ऐसे में सम्भवतः अगर हेम दा इस माओवादी विचार के समर्थक थे तो भी उन्होंने अपनी शहादत से लोगों को इस विचार को समझने, खंगालने, परखने का न्योता तो दिया ही है।
हम उत्तराखण्ड वालों को आंध्रप्रदेश ने इस बार हमारे दो राजनीतिक चेहरों के सच से परिचित करवाया है। पहला चेहरा है हमारे पुराने मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी का, जो आंध्रप्रदेश के राज्यपाल बन कर वहाँ गये थे। वहाँ उन्होंने अपनी अब तक की चर्चित छवि ‘नौछमी नरैणा’ को चरितार्थ कर दिखाया। वे अपने आवास में कुछ महिलाओं के साथ रंगरेलियाँ मनाते मीडिया में पकड़े गए। मीडिया की ढेर सारी सुर्खियाँ उन्हें मिलीं और उन्हें ही बटोर वापस उत्तराखण्ड लौटना पड़ा। हमारे इस महान मुख्यमंत्री के इस बेनकाब चेहरे के अलावा आदिलाबाद की इस घटना में हेम दा की राजनीतिक इच्छाशक्ति से भी आंध्र ने ही परिचित कराया है हमें। वह जिस विचार के लिए जी भर जीए उसके लिए ही जान भी लुटा दी। उत्तराखण्डवासियों को इनमें से किसका सम्मान करना चाहिए तय किया ही जाना चाहिए।
अब पत्र के लिए सोचे अपने पुराने ले-आऊट की ओर लौटता हूँ। उत्तराखण्ड में प्रतिरोध की शक्तियाँ, अब लगता है शून्य में जा बैठी हैं। जिन सपनों के लिए राज्य की परिकल्पना की थी उनके धराशायी हो जाने के बाद भी यह आलम है। प्रतिरोध के समझदार लोग और संगठन इस तरह छितरे हुए एक-दूसरे से नाक फुलाये बैठे हैं और व्यक्तिगत अहमन्यताओं की तुष्टि के लिए सुस्त और औपचारिक आन्दोलनों को खड़ा कर ही आत्ममुग्ध हैं। ऐसे में एक विवेकपूर्ण वैचारिक आन्दोलन, जो शायद कुछ नये लोगों को भी साथ ला पाता, परिदृश्य से नदारद है। यह सब ऐसे समय में है जब उत्तराखण्ड में जंगलों के हक जनता से लगातार छीने जा रहे हैं। नदियों को बाँधकर गाँवों, कस्बों-शहरों को डुबाने के मनसूबे बाँधे जा रहे हैं। राज्य पा लेने के बाद भी पलायन नियति बन चुका है। पूरे राज्य में शराब के खिलाफ महिलाएँ आंदोलित हैं लेकिन सबसे जरूरी तौर पर सरकारें गाँव-गाँव में शराब पहुँचाना अपना कर्तव्य समझती हैं। कुछ जगहों पर तो मोबाइल वैन पर भी शराब पहुँचाई जा रही है।
पिछले दिनों लोहारीनाग-पाला परियोजना को रोके जाने की खबरों ने कुछ उम्मीदें दिलाई थीं। क्या पता ऐसे ही तरस खाकर सरकारें यहाँ बनने वाले 250 से अधिक बाँधों में से कुछ एक को और खारिज कर दें और हिमालय, इसके पर्यावरण और समाज से सम्बन्धित चिंताएं करने वालों को तमाम हो-हल्ला करने का कुछ तो संतोष मिल ही पायेगा। लेकिन पहले तो हमारे मुख्यमंत्री निशंक को परियोजना को रोके जाने पर आपत्ति थी, मगर अब तो केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश के बयानों ने साफ कर दिया है कि लोहारीनाग-पाला बाँध बनना फिर से तय ही है। साथ ही यह भी साफ हो गया कि पर्यावरण और उत्तराखण्ड के जन से जुड़े मसलों पर केन्द्र की कांग्रेस सरकार और राज्य की भाजपा सरकार दोनों का रूख जनविरोधी ही है। बाँध बनते ही रहेंगे और गाँव-शहर डूबेंगे ही।
हमारे मुख्यमंत्री साहित्यकार भी हैं उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनकी रचनाधर्मिता में अद्भुत् इजाफा हुआ है। उनकी कई पुस्तकें भी मुख्यमंत्री बनने के बाद से प्रकाशित हुई हैं। जिनमें उपन्यास, कविता, कहानियाँ शामिल हैं। कई पत्रिकाएँ इन साहित्यकृतियों की तारीफ करती समीक्षाएँ छाप चुकी हैं। गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कई शोध छात्र निशंक की सृजनयात्रा पर शोधरत हो गये हैं। शायद वे अपने शोध में तलाश पायें कि ‘निशंक’ की कौन सी रचना कालजयी है कि उसे नोबेल मिल जाये। आखिर ‘कुंभ’ मेले के लिए तो इन्हें नोबेल पुरस्कार मिल नहीं पाया।
विचारों और भावनाओं के उद्वेलन में यह पत्र लिख रहा हूँ। हेम दा की स्मृतियों से इस तरह आक्रांत हो गया हूँ कि अभी कुछ और नहीं सूझ रहा है। सारे शब्द बिखर जा रहे हैं। दिल्ली की बेतहाशा गर्मी स्थिर होकर सोचने भी नहीं देती। ऐसे में ठण्डे पहाड़ों की बहुत याद आ रही है। जैसे ही मौका मिला चला आऊँगा। हेम दा को अपने ख़यालों में जिन्दा रखने की कोशिश रहेगी। अभी इतना ही। आप हरेले का तिनड़ा भेजना मत भूलना। हालाँकि मोबाइल और एस.एम.एस. का जमाना है। अपने घर-पहाड़ से सम्पर्क बना ही रहता है। लेकिन लम्बे समय के लिये प्रवास पर जा रहा हूँ। हरेले की जरूरत तो इस बार ज्यादा महसूस होगी ही। अपना ख्याल रखना। तभी पालना होगी। आप ‘नैनीताल समाचार’ को बचाये-बनाये रहोगे तो पहाड़ के बने-बचे रहने की उम्मीद भी बनी रहेगी।
Purane dino ke sathiyon ko yaad .
saalon baad harela ank pada .Rohit bhai mubarak man se likha hai . NANITAL SAMACHAR KI ULAHANA , LARAI JAARI HAI. SABHI KO HARELE KI MUBARAKWAD SHIV