विनीत फुलारा/धीरज पाण्डे
नैनीताल के निकट भीमताल में हरेला पर्व को सौ साल पहले से भी अधिक समय से मेले के रूप में मनाया जाता है। विगत दशकों में बहुत सारे बदलाव देख चुके यहाँ के बुजुर्गों के अनुसार बाजार के अभाव में आजादी से पहले लोग व्यापार के लिये यहाँ आते थे। व्यापारी घोड़ों पर लादकर अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुएँ बरेली आदि जगहों से लाते थे। उन्हें खरीदने के लिये सुदूर पदमपुरी, गुनियालेख, मुक्तेश्वर, ओखलकांडा आदि गाँवों से ग्रामीण यहाँ एकत्रित होते थे। इस प्रकार से यह मेला व्यापार का केन्द्र भी होता था। पूर्व में मेला लीलावती पन्त इंटर कॉलेज (डाँठ) के पास मनाया जाता था, क्योंकि यह स्थान नगर का केन्द्र था। पर्याप्त स्थान न होने की वजह से 1980 के बाद इसे मल्लीताल के रामलीला मैदान में लगाया जाने लगा।
आजादी से पूर्व मेला स्वतंत्रता सेनानियो,संस्कृतिप्रेमियों के आपस में वार्ताओं और जनमिलन का संपर्क केन्द्र होता था। आजादी के बाद भी राजनीतिक दल मेले में अपने स्टाल लगाते थे और अपने दलों के विचारों को जनता के बीच बताते थे। नारायण दत्त तिवारी भी अपने राजनैतिक जीवन की शुरूआत में इस मेले में शामिल होकर यहाँ की जनता से जुड़े। पूर्व में मेले का संचालन यहाँ के स्थानीय बुजुर्ग और समाजसेवी करते रहे, जिनमें प्रताप सिंह बिष्ट आदि प्रमुख थे। आयोजन में सनवाल जी तथा मोती राम पांडे जी का बहुत बड़ा योगदान रहा। प्रेम सिंह कुर्याल तथा चन्दन सिंह बिष्ट आदि काफी उत्साहित होकर बताते हैं कि दशकों से मेले के आयोजन का सिलसिला इसी तरह चला आ रहा है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता है।
कुछ वर्ष पूर्व तक मेले का आयोजन ‘हरेला खेल एवं सांस्कृतिक मंच’ द्वारा किया जाता था। लेकिन इस बार इसका आयोजन नगर पंचायत के जिम्मे सौंपा गया है। पहले दो दिन का आयोजन होता था लेकिन वर्तमान में यह मेला पाँच दिन तक चलता है। मेले के अस्तित्व को बचाये रखने और इसमें सांस्कृतिक पहलू की मौलिकता को बनाये रखने के लिये सरकार को आगे आना चाहिये। नंदा देवी मेला, उत्तरायणी मेला, देवीधूरा का बग्वाल मेला आदि की तरह हरेला मेला के संरक्षण के लिये आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिये। हरेले के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण एवं वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का संदेश दिया जा सकता है।
























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