प्रस्तुति : माया पाण्डे
कुमाऊँ में हरियाला वर्ष में तीन बार मनाने का प्रचलन है- चैत, आश्विन एवं सावन के महिने में। चैत के महिने में नवरात्रि में देवी के नाम से हरियाला बोया जाता है। सावन में शिव-पार्वती की पूजा के प्रतीक डिकारे बनाये जाते हैं। शिव-पार्वती को हरित आसन में बैठने के लिये हरेला बोते हैं। अश्विन मास में दुर्गापूजा के निमित्त हरेला बोया जाता है। कर्क संक्रान्ति से सूर्य कर्क रेखा से मकर रेखा की ओर बढ़ने लगता है इसलिये इसे कर्क या श्रावण संक्रान्ति भी कहा जाता है। यह त्यौहार सावन की पहली तिथि को मनाते हैं।
हरियाले को कृषकों का त्यौहार भी कहा जाता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध खेती-बाड़ी से होता है। सावन मास में वर्षा के कारण प्रकृति हरी-भरी हो जाती है और इस हरीतिमा के कारण ही इसको हरेला कहा जाता है। गर्मी के कारण तपती धरती वर्षा ऋतु में जब वर्षा की फुहारों से हरी-हरी दिखने लगती है, तब अच्छी फसल की कामना से इस त्यौहार को मनाने का प्रचलन है। गेंहू, जौं, उर्द, गहत इत्यादि 5 या 7 अनाजों को बोया जाता है। सावन का हरियाला टोकरी या डिब्बे में साफ छनी मिट्टी को भरकर बोते हैं। चैत व आश्विन हरेला पूजा गृह में मिट्टी बिछाकर बोये जाने की परंपरा है। त्यौहार से दस दिन पूर्व हरेला बोने की तैयारी की जाती है। तेज रोशनी वाले स्थान में हरेला बोने से धूप की रोशनी से हरेला हरा हो जाता है। पीला हरेला देखने में सुन्दर लगता है, इसलिये पूजा स्थल की अंधेरी जगह में सावन के हरेले की टोकरी व चैत व आश्विन के लिये अंधेरा कोना ढूँढा जाता है। हरेला चार-पाँच दिन में उगने लगता है। दस दिन तक उसमें पानी डाला जाता है। नवें दिन हल्की गुड़ाई करके दसवें दिन हरेला शिव-पार्वती को चढ़ाकर घर के सभी सदस्यों के सिर पर रखा जाता है।
शिव-पार्वती, गणेश- कार्तिकेय की मिट्टी की मूर्तियाँ, जिन्हें डिकारा कहा जाता है, बनाकर उन्हें रंगों से सजाकर पूजा जाता है। पकवान बनाकर उसे प्रसादस्वरूप चढ़ाकर बाँटा जाता है। कुमाऊँ में पूजा में प्रायः सूजी व चावल के आटे के पुवे व सिंगल बनाने का रिवाज है। अपनी सुविधा के अनुसार लोग हलवा, पूरी, बड़ा, खीर भगवान को नैवेद्य के प्रयोजन से समर्पित करते हैं।
हरियाला माँ-बहिन-बेटी की अपने पारिवारिक जनों के प्रति शुभकामनाओं का त्यौहार है। बहिन और बेटी पाँव से छुवाकर घुटने से ऊपर हरेले के तिनकों को तीन या पाँच बार सिर में लेकर सिर पर रखती हैं – ‘‘ लाग हरयाव लाग दसें, लाग वगवाव लाग पंचमी जी रये जागि रये, य दिन यो मास भेंटने रये, धरती बराबर चाकव है जाये आसमान बराबर उच्च है जाये। ‘‘स्यूव जस तराण है जो, स्याव जस बुद्धि है जो, दुब जस पङ्गुरिये, गदुवे जस झाल है जो। गोपीचंद चार अमर है जाये, सिल पिस भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये।’’ आशीर्वाद दिये जाते हैं। बच्चे बड़ों को नतमस्तक हरेला समर्पित करते हैं और बड़े उन्हें जीवन के सांगोपांग उन्नति- वैभव के साथ-साथ उनकी वृद्धावस्था की तक कल्पना करके आशिर्वाद देते हैं। सुदूर प्रान्तों में बसे अपने पारिवारिक जनों को लिफाफे में जौं के तिनड़े व बग्वाली के च्यूड़ भेजने की परंपरा आज भी हमारे समाज में मौजूद है।

























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