प्रस्तुति : आलोक साह गंगोला
स्वस्ती श्री सर्वोपमा योग्य नैनीताल समाचार वालों को हरेला भेज रहे हैं। आशा है स्वीकार करेंगे और सुधी पाठक प्रवर को भी हमारी शुभकामनाओं के साथ पहुँचा देंगे। यो दिन यो हरेला बरस-बरस ऊनै रून रीतिरिवाज निभूणे रून। यो पाती इन्तजार रूनेरे भै।
याँ आशल कुशल सब ठीक ठाक छू। बारिश भली हो रही है बलि। डर जै लागनै, अच्छी बारिश अब सुकून न देकर मन को अन्दर से कहीं कँपा देती है। पिछले साल प्राकृतिक कोप से सुमगढ़ में नानातिनों का वैसा जो नुकसान हुआ ठहरा। अभी सप्ताह भर पहले हुई बारिश ने हमारी तैयारी की पोल खोल दी। कैंची में रोड क्या बन्द हुई लोगों को रामगढ़ का फेरा लगा कर अल्मोड़ा-बागेश्वर जाना पड़ा। उधर अचानक सरकारी फरमान आ गया ठहरा कि भारी वर्षा को देखते हुए एहतियातन दो दिवसीय अवकाश रखा जायेगा करके। अब फरमान की देरी थी, इधर फरमान आया नहीं उधर मौसम साफ हो गया। सम्पादकज्यू, क्या आपको नही लगता कि अवकाश करने से बेहतर होता कि हम समाधान की तलाश करते ?कार्यो में गुणवत्ता लाते ? ऐसे निखिद काम हमारी आँखो में जैसे जज्ब हो गये हैं। ‘‘सरकारी काम के हिसाब से अच्छा ही काम हो रहा ठहरा,’’ क्यों कहते हैं हम सब ? क्या सरकारी पैसा हमारा नहीं हुआ ? बागेश्वर बाजार में काम हुआ। कभी कोई राहगीर गुजर गया, उसके पदछाप पड़ गये या ठेकेदार ने सिमेन्ट में ठप्पा डिजायन लगा दिया। आज दो माह का लम्बा समय बीतने पर वह ठप्पीकरण बाजार में कही नही दिखलायी दे रहा है। दिखलाई दे रहे हैं तो रेता के कण, जो सफाईकर्मियों के झाड़ू से ही निकल जा रहे हैं। पता नही नदियों में कैसा रेता आ रहा है आजकल, जो कि निर्माण कार्यों का साथ देने को ही राजी नही है। खनन माफियाओं की तो बड़ी मौज करा रखी ठहरी इस रेता-बजरी ने!
उधर इंजीनियरों को देखो। बेरीनाग बाजार में कौन अभियन्ता होगा, जिसने कि ऐसी सड़क रचना डिजायन की कि लोगों के दुकान व मकान ऐसे हो गये कि तीन-चार सीढ़ी उतरकर ही वहाँ तक पहुँचा जा सकता है। पानी जो घरों-दुकानों में घुसेगा, वह अलग। हाँ, यह जरूर है कि आपदा प्रबन्धन करने का मौका मिल जायेगा। आर.टी.ओ. बागेश्वर के पास लो.नि.वि. की एक पाँच फिट ऊँची दीवार, जैसे-तैसे अपना अस्तित्व कायम रखे थी। एक सज्जन ने उसी पर दस-बारह फिट ऊँची दीवार दे डाली तो भरभरा कर गिर गई। अच्छा हुआ, गिरने में थोड़ी देरी हो गई, अन्यथा गैरजिम्मेदार अभियन्ता एवं दीवार देने वाले ने तो इन्तजाम में कोई कसर नही छोड़ी थी। क्या ये अभियन्ता महोदय यही चाहते होंगे कि इनके बच्चे जिस विद्यालय में पढ़ने जाते हैं, उसकी छत भरभरा कर गिर जाये ? क्या इनके घर का काम भी इसी गुणवत्ता का होता होगा ?
दूसरी पंक्ति एवं तीसरी पंक्ति के नेताओं की सम्पादक जी, बाढ़ जैसी आ गयी है। विद्यालय खुलवाना एवं उसके भवन का निर्माण करना ही इनके नैतिक दायित्व की इतिश्री है। जगह-जगह शिक्षकों का टोटा है। दुर्गम-सुगम के चक्कर में पड़े शिक्षको से पढ़ाई में गुणवत्ता की उम्मीद करना तो अब गैरवाजिब ही होगा। विद्यालयों में नियत संख्या के हिसाब से तो बच्चे हैं नहीं। जबर्दस्ती, जैसे-तैसे संख्या को बनाये रखा जा रहा है कि कहीं विद्यालय बन्द हो गया तो दुर्गम स्थान में न जाना पड़े। जगह-जगह विद्यालय खोल दिये हैं। कौन करेगा इन विद्यालयों की बारिश और बर्फ से सुरक्षा ? क्या दौरेबाज नेता यह सब करेंगे या फिर ये दूसरी पंक्ति तीसरी पंक्ति के नेता, जिन्होंने यह विद्यालया माँगा था ? आसपास के ग्रामीण क्षेत्र से नगरों को आबादी का स्थानान्तरण अभी जारी है अतः आने वाले वर्षो में दूरदराज के विद्यालयों में संख्या बल में और गिरावट आने की सम्भावना है। अब क्यों इतने लोग गाँवों से शहरों की ओर भाग रहे हैं सम्पादक जी, यह बताना तो मुश्किल है। शायद हो कि जानवरों या बन्दरों के आतंक से खेती-बाड़ी करने का माहौल में चौपट हो गया है इसलिये अथवा बच्चे टाई की गाँठ बाँध कर इंग्लिश मीडियम स्कूल में ‘ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार’ पढ़ लेंगे और बड़े आदमी हो जायेंगे इसलिये। या हो सकता है कि मन में कहीं गोबर-मिट्टी से सनने से बचने की छिपी हुई इच्छा हो। सम्पादक जी, देश आजाद हो गया, अपना राज्य बन गया, बागेश्वर तो अलग जिला भी बन गया मगर हम अपने गाँवों को रहने लायक क्यों नहीं बनाते होंगे ? क्या हम सोचते हैं कि गाँवों में रहने वाले भेड़-बकरी होते हैं और उनकी जरूरत सिर्फ वोट झटकने के लिये ही होती है ?
मैं तो समझ भी नहीं पाता सम्पादक जी कि बगैर अपने खान-पान, अपनी भाषा-बोली के हम कितने दिन और इन पहाड़ों को ढो पाएँगे ? अपनी संस्कृति से विमुख हो गये तो अपना पर्यावरण कितने दिन बचा पायेंगे ? संस्कृति से विलग, सामाजिक दायित्व से बेपरवाह समाज में ही तो भ्रष्ट आचरण पनपने की सम्भावना रहती है और फिर इसी समाज में से निकलते हैं नेतागण। समाज ऐसा हो गया तो आप कहाँ से ले आयेंगे साफ-सुथरे नेता ?
मगर आजकल भ्रष्टाचार को लेकर देश भर में बेचैनी बहुत है सम्पादक जी। पहले अण्णा हजारे….फिर बाबा रामदेव। जन जन तक बहिरंग योग के विविध आयामों को पहुँचाने के साथ काले धन के मुद्दे को पहुँचाने का महती कार्य बेशक बाबा रामदेव ने किया। मगर राजनीति के योग में शिकस्त मिलने से बाबा का एक अतिवादी रूप सामने आया। हमारे यहाँ तो कथा बाँचने वाले, क्रिकेटर और शारीरिक व्यायाम कराने वाले तक भगवान बन जाते हैं, बाबा जी तो नौली क्रिया तक करने में माहिर ठहरे। अगर वे अतिवाद के शिकार हो गये तो इसमें गलती उनकी कहाँ? बाबा जी अण्णा के साथ चलते तो शायद बात बन जाती, सिविल सोसायटी में भी दम आ जाता। मगर बाबा जी ने तो मुद्दा हाथ से फिसलते देख अलतलाट कर दिया और सरकार के हाथ में फँस गये। अब भ्रष्टाचार में डूबी राजनैतिक ताकतें क्योंकर चाहेंगी कि जनबल सशक्त हो जाये ? कानून यदि जरा सा भी सही ढंग से लागू हो जाये तो राजा और कलमाडी जैसे लोगों को भी अन्दर होते कितनी देर लगती है…..
और आपने अपने नैनीताल का ये क्या हाल कर दिया है सम्पादक जी ? जरा नगरपालिका और झील प्राधिकरण की भी खबर लिया करो। फिलहाल तो ताल का पानी साफ हो गया ऑक्सीजन प्लाण्ट की बदौलत, मगर यदि गन्दगी इसी तरह जाती रही तो कितने दिन ताल का पानी पीने लायक रह पायेगा ? क्या करेंगे आपके होटल एसोसिएशन और व्यापार मंडल तब ? क्यों नहीं पर्यटकों के दबाव एवं उनके साथ आने वाले गाड़ियों के सैलाब को नियन्त्रित करने पर ध्यान दिया जाता ? सच्ची कहूँ तो अब सीजन के दिनों में आपके नैनीताल आने में पहले की तरह खुशी नही मिलती सम्पादक जी। जिन्दगी ज्यादा ही कष्टप्रद हो जाती है इन दिनों।
पत्र थोड़ा ज्यादा ही लम्बा हो गया। अब क्या किया जाये, बरसों से तरसी हुई कलम जो ठहरी। बरस में एक बार तो हमें मौका मिलने वाला ठहरा। नक झन मानना हो। कलम की भूल-चूक माफ कर देना।
आपका एक पुराना पाठक, बागेश्वर से,
आलोक साह गंगोला