उमा पंत
अभी-अभी समाचार मिला कि गिरदा नहीं रहे। सत्तर-अस्सी के दशक में पति स्व. लेनिन पंत के डबल स्टोरी, न्यू राजेन्द्रनगर, नई दिल्ली, नैनीताल और फिर बाद में गोल मार्केट के फ्लैट में उनसे हुई चंद मुलाकातों के चलचित्र स्मृति में कौंध गये।
आँखों में एक अजीब सी चमक और बातों में गर्म, छूता, सरस चुटीलापन लिये गिरदा का सरल निर्मल उन्मुक्त हास भुलाया नहीं जा सकता। राजेन्द्रनगर में जब भी आते, चाय की चुस्कियों के बीच ताजा खबरों पर उनकी टिप्पणियों और ठहाके सुन लेनिन जी के साथ ईजा, गोर्की, हेमादी और मैं पूरा परिवार बैठक में आ जुटता। 13 दिसंबर 1992, दिसम्बर की ठंड और जगह-जगह कर्फ्यू। अयोध्या विवाद अपने चरम पर था। सुबह साढ़े चार बजे गोल-मार्केट के सरकारी फ्लैट में घंटी बजी। द्वार खोला। सामने राजीव लोचन साह, गिरीश तिवारी आदि नैनीताल समाचार परिवार के अपने लोगों को हाथों में ताँबे की गगरी लिये देखा तो गला भर आया। बेटी के ब्याह में ताँबे का कलश हर कोई नहीं लाता। ‘यह हमारी फुचक्यांणी के लिये है।’ (अतिमा को गिरदा फुचक्याणी कहते थे।) उन सर्दियों की वह अपनेपन की गुनगुनी सुबह हमारा परिवार और फुचक्याणी कभी भुला ही नहीं सकते।
साल दो साल पहले गिरदा का फोन आया था। मिलने का बहुत मन है। गोर्कीदा से तो नैनीताल में भेंट हुई थी, पर तुमसे मिले मुद्दत हो गई। अब तो फुचक्याणी की फुचक्याणी भी बड़ी हो गयी होगी। देखा ही नहीं। कल घर आऊँगा तब खूब बातें होंगी। मैंने कहा- खाना तैयार रखूँगी। शेखर ने खाने के लिये मना किया। कहा- कल एस्कॉर्ट्स जाना है गिरदा के चैकअप के लिये। पता नहीं डॉक्टर कब का समय दें और कब हम वहाँ से निकल पायें। घर अवश्य आयेंगे और चाय पियेंगे। मैं पूरे दिन इंतजार करती रही। रात साढ़े आठ बजे शेखर का फोन आया। हम अभी डॉक्टर को दिखला कर लौटे हैं। अभी हॉस्पिटल में ही हैं। सुबह 6 बजे की गाड़ी से इसे नैनीताल जाना है। रुकने को कतई तैयार नहीं है। मुलकात भी जरूरी है और वापसी भी। क्या करें, चलो अगली बार मिलते हैं। ‘‘जरूर मिलेंगे बड़ी-भात खिलाओगे न भाभी ?’’ गिरदा ने अपने उसी चिरपरिचित, मोहिले अंदाज में पूछा था। अजीब इत्तफाक है। आज अतिमा ने बड़ी-भात ही बनाया है। मैं उसी के पास हूँ। गिरदा न मालूम कहाँ है ?
राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक प्रपंच और छल-कपट को छलनी करे मुखौटे उधेड़ने वाले कटाक्ष। पैनी नजर और उस धारदार कलम की भरपाई नैनीताल समाचार पत्र कैसे कर पायेगा। नहीं समझ आता। वैसे गिर्दा एक कहाँ ! जनमानस में रची-बसी उनकी यादें उन्हें जाने देंगी तब ना।