उसने मेरी बैठक में टँगे पोस्टर में छपी कविता को पढ़ा -
वह मारे जायेंगे …….
जो सच-सच बोलेंगे
कत्ल कर दिये जायेंगे
जो विरोध में बोलेंगे
जो गुन नहीं गायेंगे
मारे जायेंगे
सबसे बड़ा अपराध है इस समय
निहत्थे और निरपराध होना
जो अपराधी नहीं होंगे
मारे जायेंगे
पोस्टर में सत्ता द्वारा मारे गये बहुत से लोगों की फोटो थे….. श्रीदेव सुमन, नागेन्द्र सकलानी। उसने पूछा -सर! ये पोस्टर आपके पास कहाँ से आया ? मैंने कहा पता नहीं, पर इस कविता के साथ आगे अभी बहुत से फोटो चिपकते जायेंगे। वह मुस्कुराया, उस कविता को फिर देखा और थोड़ी देर के लिए खामोश रह गया।
नाजुक स्वास्थ्य के साथ आँख में चश्मा पहिने, पीठ झुकाये और बगल में कोई किताब दबाये हुए यदा-कदा जब वह मेरे घर आता तो लगता था, जैसे कोई विद्यार्थी बिना फीस ट्यूशन पढ़ने आया है। वह किसी बात पर हँ..हँ…हँ…हँ करके विशेष प्रकार की हँसी हँसता और जीभ बाहर निकाल कर अपने खुश्क होंठों को गीला करता रहता था। इस्नोफीलिया के कारण बार-बार नाक में हाथ लगाता था। बालों के कट बदलता रहता…….कभी ऊपर किये हुए, कभी सामान्य। किताबों के प्रति उसे इतना लगाव था कि हर किस्म की किताब पढ़ता था। चाहे वह साहित्य हो या फिर कोई गम्भीर किताब। किताब देख कर वह उस पर झपटता था। पैसे बचा-बचा कर किताबें खरीदता। उसे पढ़ने की कला आती थी। एक रात में दो-दो किताबें निबटा लेता। शेक्सपियर से लेकर उपनिषद् और कार्ल मार्क्स को वह समान रूप से उद्धृत कर सकता था। अपनी अंग्रेजी की कमजोरी को उसने दूर कर लिया था। मुझे भी प्रोत्साहित करता लिखने के लिए। जब उसे मेरी लिखी किताबें ’जिंदगी में कविता’ और ‘गाँव-गाँव में’ मिली तो वह उन्हें यह कह कर ले गया कि वह उन पर ‘समयांतर’ में समीक्षा लिखेगा। अच्छी फिल्में देखने का उसे शौक था। मानसिक रूप से बहुत मजबूत होने के कारण उसने अपनी शारीरिक कमजोरी को पछाड़ दिया था। दिल्ली में दो महीने उसने अपना इलाज भी कराया था। मैंने जब उससे कहा- बाबा रामदेव के प्राणायाम को क्यों नहीं अपनाते ? क्या पता फायदा हो जाये। तो उसने कहा- हाँ सर, वह करता रहता हूँ। थोड़ा फायदा तो लगता है। अपनी बीमारी से सिर्फ इसलिए परेशान था कि उससे लिखने-पढ़ने में व्यवधान होता है।
उसके पास सटीक तर्क होता था। वह छद्म मार्क्सवादी नहीं कि गाहे-बगाहे वर्ग संघर्ष या अतिरिक्त मूल्य की बात कर लें, मई दिवस मना लें और फिर सब भूल जायें….. हर सही काम में अडंगा डाल कर कहें कि यह गलत है, इससे क्रांति नहीं आने वाली….। वह जनहित में किये जा रहे हर काम को सराहता था और कहता था- कम से कम जनजागरण तो हो रहा है। एक दिन मैंने पूछा- हिंसक क्रांति के बारे में क्या सोचते हो ? कुछ देर तक चुप रह कर वह बोला- कौन हिंसक है वह तो इस बात से तय होगा कि हिंसा शुरू किसने की। जो बचाव में है उसकी हिंसा को कैसे हिंसा कहेंगे ? वह तो ’मरता क्या न करता’ वाली स्थिति में है।
उसने महाविद्यालय में चुनाव लड़ा तो एक ग्रुप ने उस पर हिंसक आक्रमण करने की धमकी दी, पर उसने विरोधियों को भी कनविंस कर लिया कि हिंसा कोई समाधान नहीं। वह भले ही चुनाव हार गया, पर विरोधी भी मान गये कि वह साफ, भला और समझदार आदमी है। वह कम्युनिस्टों की धड़ेबाजी को कोसता था और कहता था, ये साम्प्रदायिक ताकतों से बात कर लेंगे, पर आपस में बात करना पसंद नहीं करेंगें…। वह अपने चरित्र में पूरा अहिंसावादी था, एक फूल या पत्ती तोड़ना भी पसंद नहीं करता था। वह किसी को भी गाली देना पसंद नहीं करता था। जब कोई किसी ब्यूरोक्रेट या नेता की आलोचना करता तो कहता- वह तो करेगा ही। यह उसका क्लास करेक्टर है। यह आदमी की बात नहीं व्यवस्था की बात है।
एक बार मैं किसी काम से उसके गाँव देवलथल गया तो पता चला उसकी शादी हो रही है और शाम को गैट-टु-गैदर है। एक ग्रामीण कह रहे थे, ‘‘ये कम्युनिस्ट बनते हैं…… कैसे शादी की ? न पूजा, न रिवाज न रस्म। फिर यह गैट-टु गैदर क्यों ?’’ भूख लगी थी तो सोचा कि वहीं खा लिया जाये। वहाँ गया तो देखा कि वही सज्जन डट कर खा रहे हैं। मैंने उनकी बात हेम को बतलाई तो वह हँस कर कहने लगा, -सर! गाँव में ऐसा होता ही रहता है। फिर उसने बतलाया कि कैसे खेत खड़िया खनन से बरबाद हो रहे हैं। लोगों ने अपने बच्चों का भविष्य दाँव पर लगा दिया है।
वह कहता था- जिस नौजवान में सोच होती है, कुछ करने का माद्दा होता है तो वह किसी आदर्श में अपने को बिछा देता है, फिर भले ही वे कम्युनिस्ट कार्यकर्ता हों या आरएसएस के। वे यूज भी होते हैं। अब सवाल यह है कि इस संवेदना की तीव्रता को कौन सी दिशा मिले ?
उसने इकोनॉमिक्स से एम.ए. किया था और एनजीओज पर पी.एच.डी शुरू की थी। मगर पीएचडी का ट्रैंड उसे रास नहीं आया। वह गाँव-गाँव घूमता था। बतलाता था कि कैसे अनुसूचित जातियों में ट्राइबल इंसटिंक्ट है। आज खाओ, कल जो होगा देखा जायेगा वाला….। एक गाँव में आलू से लोग खूब कमाते थे। फिर जम कर खान-पान, मुर्गा-सुर्गा, सिगरेट होता था। जब सब खत्म हो जाता तो बीड़ी के ठुड्डे ढूँढे जाते थे। जरूरी है उन्हें बचत का महत्व समझाना। वह कहता था गाँव तीन चीजों से परेशान हैं। पहला-पटवारी से; दूसरा ब्लॉक व्यवस्था से जो कमीशन बेस्ड है और तीसरा वन विभाग से. ….। गाँव से पलायन हो रहा है, पर कोई भी नेता गाँव से पलायन नहीं करता। उसका एक घर अगर हल्द्वानी में है तो गाँव को लूटने वह गाँव में भी बना रहता है। एनजीओ के बारे में उसका कहना था- ये पूँजीवादी दलाल हैं। स्वजल योजना में गाँव वालों को स्वयं अपने पानी का प्रबंध करना पड़ेगा। उसमें टैन परसेंट गाँव वालों को देना पड़ता है। वह न भी दें तो एनजीओ वाले ही उसे दे देते हैं। उन्हें हर हाल में लाभ है। वह शिक्षा भी गाँव वालों को सौंपेंगे। देखने में यह बड़ा लोकतांत्रिक है, पर इसमें साम्राज्यवाद छिपा है। पहली जरूरत गाँव में लोगों को अपने अधिकार के लिए जगाना है, पर हो उल्टा रहा है। उन्हें करैप्शन की एबीसीडी पढ़ाई जा रही है…….।
इन छुटपुट मुलाकातों के अलावा मुझे उसके बारे में कभी यह नहीं मालूम रहा कि वह कहाँ है, क्या कर रहा है ? बस एक प्यारे इंसान, सच्चे कामरेड के रूप में ही मैं उसे जानता था। मुद्दतें गुजरीं. …. कब उससे अंतिम भेंट हुई, याद नहीं। अब बहुत सालों के बाद जब टीवी में हाथ में घड़ी, हाफ शर्ट पहिने हुए नीचे जमीन पर पुलिस एनकाउंटर में उसे गिरे हुए देखा, तो धक्क रह गया। कुछ कहना नहीं आया। उस पोस्टर पर नजर पड़ी, जिसमें वह कविता थी कि वे सब मारे जायेंगे। मेरी इच्छा हुई कि उसकी फोटो अगर कहीं से मिलती तो उसमें चस्पाँ कर देता।
हर एनकाउंटर की तरह यहाँ भी एक कहानी रची गयी कि उन दो लोगों के साथ पूरे तीन घंटे फायरिंग का एक्सचेंज हुआ और तब वे मारे गये। मुझे यह कल्पना करके ही हँसी आयी कि हेम पांडे ए. के. फोर्टी सेवन लेकर मोर्चा ले रहा है !
….जब उसे उठवा कर गोली मारी गयी होगी तो उसका गला भी सूखा होगा और दिल भी जोर से धड़का होगा। पर इतना यकीन है कि अपने सच के लिए ऐसे मरने का उसे अफसोस नहीं हुआ होगा।


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