विजय वर्द्धन उप्रेती
हेम के बारे में कभी लिखूँगा। वह भी उसकी शहादत के बाद उसके इतिहास पर…। सपने में भी नहीं सोचा था। कैसे हो गया सब कुछ एक झटके में ? अभी भी लगता है कि कोई बहुत बुरा सपना देखा था, जिसका असर कुछ ज्यादा ही रह गया। लेकिन नहीं झकझोर देने वाली 1 जुलाई 2010 की वह खबर झूठ कतई नहीं थी। सच और सौ फीसदी सही। हेम का चेहरा तब से लेकर अब-तक भूले नहीं भूल पा रहा हूँ। इस घटना ने मुझे इस कदर झकझोर दिया है कि मैं उस व्यथा को शब्दों में भी व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। हेम के जाने की खबर से मैं एक बार नहीं, बल्कि हजार बार भावनात्मक तौर पर कमजोर हुआ हूँ।
हेम मेरे स्कूली दिनों का साथी ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा दोस्त था जिसके साथ घंटों बैठकर मैं विश्व के इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र और राजनैतिक आंदोलनों के साथ ही राजनैतिक व्यवस्था पर चर्चा किया करता था। उत्तराखण्ड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के एक छोटे से कस्बे देवस्थल से हेम जिला मुख्यालय में उच्च शिक्षा लेने आता है। लेकिन फिर धीरे-धीरे एक दिन उन्हीं का नेता बन जाता है। ये सब कुछ हुआ उसकी प्रतिबद्धता से। इतनी मजबूत इच्छा शक्ति और लक्ष्य को लेकर जुनून की हद तक चले जाना कम ही लोगों में दिखता है। मुझे उस दौर के रेडिकल छात्र संगठन कहे जाने वाले आइसा से जोड़ने का काम हेम ने ही किया। उसने मुझ जैसे अराजक और मौज-मस्ती में जीने-वाले युवक को कब दुनिया के बारे में सोचने-समझने लायक बना डाला मुझे ही पता नहीं चला। समाज के कमजोर तबके के प्रति जो संवेदना हेम ने मुझे दिखाई, वह जवानी के उल्लास में डूबे नौजवानों में कम ही दिखाई देती है। अगर मैं कहूँ कि हेम ने मुझे दुनिया को देखने का नजरिया दिया तो गलत नहीं होगा। वह मेरे लिए दोस्त होने के साथ ही पहला अध्यापक भी रहा। हेम की इस काबिलियत का पता मुझे तब चला, जब मैं कुछ-कुछ दुनिया को जानने लायक बना। पिथौरागढ़ महाविद्यालय में आइसा ने 1993 से काम करना शुरू किया और हम इसके संस्थापक सदस्य बने। लेकिन संगठन की समझ हेम में पहले ही भूपेन बसेड़ा ने विकसित कर दी थी। ये हेम का माद्दा ही था कि जिस महाविद्यालय में वामपंथ का नाम भी किसी ने नहीं सुना था, उसे मात्र दो सालों में लालकिला कहा जाने लगा। एक के बाद एक लगातार तीन साल तक छात्र संघ के महत्वपूर्ण पद आइसा जीतती गई। बाहर देखने वाले नहीं जानते थे, लेकिन मैं भली भाँति जानता हूँ कि हेम ने महाविद्यालय से बाहर भी वामपंथी समर्थकों की अच्छी-खासी तादाद खड़ी कर दी थी, जो अपनी क्षमतानुसार संगठन को मदद करते रहते थे। लोगों में वैचारिक परिवर्तन लाने की यह कला कम ही लोगों में दिखाई देती है। हेम ने धुर दक्षिणपंथी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कई सक्रिय लोगों को भी वामपंथी बना डाला, जो आज भी उसके दिखाये रास्ते को सही मानते हैं।
हेम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, युवाओं के लिए प्रेरणा और आज की पीढ़ी के लिए एक आदर्श सन्यासी है। कॉलेज के दिनों में रात-रात भर वाल राइटिंग करते-करते हम थक जाया करते थे। मैं सोया रहता था, लेकिन हेम सुबह ठीक कॉलेज के समय में मेरे कमरे में पहुँच जाता था। मैं समझ नहीं पाता था कि शरीर से कमजोर नजर आने वाले इस शख्स में आखिर इतनी ऊर्जा कहाँ से आती है। तब मालूम हुआ कि वह ऊर्जा विचार की थी, जो मुर्दे को भी जिन्दा कर दे। इस सबके बावजूद वह तालाब के जल की तरह शांत था। गुस्सा तो उसे कभी आता ही नहीं था। मेरे उग्र स्वभाव की वह आलोचना किया करता था। वह कहता था कि उसका सपना एक ऐसा समाज बनाने का है, जिसमें पूँजी, धर्म, जाति और लिंग के आधार पर सौ फीसदी समानता हो। इसके लिए उसके पास एक विचार भी था, जिसे वह कलम के जरिये कई बार व्यक्त कर चुका था। लोग तब उससे कहते कि तुम कम्यूनिस्ट हो तो जवाब में वह कहता कि अगर एक अच्छा इन्सान होना कम्यूनिस्ट है तो मुझे उससे कोई गुरेज नहीं है। यह भी कहता था कि पूरी तरह कम्यूनिस्ट होना आसान भी नहीं है।
वैचारिक हदों के कारण कई दफा हममें काफी गर्मागरम बहसें हुआ करती थीं। इन्हीं द्वन्द्वों के चलते पूरे आठ सालों तक भाइयों की तरह रहे हम लोग कुछ दूर-दूर हो चले। हमारी दिशाएँ हमारी कुछ अलग हो गईं। दुनिया को बदलने का मेरा सपना भी जमीनी हकीकतों के थपेड़ों से फीका पड़ने लगा। वहीं हेम उस सपने को साकार करने के लिए निरन्तर ऊर्जावान बनता गया। वक्त के साथ मैं एक प्रोफेशनल जर्नलिस्ट बन गया,जो सिर्फ अपनी खबरों को बेहतर बनाने में लगा रहता था। लेकिन हेम ने पत्रकार बन कर भी उन्हीं विषयों को प्रमुखता से उठाया, जिनका सरोकार आम लोगों से होता था। कृषि, आर्थिक नीतियाँ, अमेरिका, साम्राज्यवाद, राजनैतिक आंदोलनों का सामाजिक महत्व….. ये उसके पसंदीदा विषय थे। एक बार मेरी एक खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए उसने कहा भी था, यार तुमने खुद को बाजार का यंत्र बना डाला है। जबकि वह पूरी ईमानदारी से पत्रकारिता किया करता। किसी विषय पर लिखने से पहले पूरा फील्ड वर्क करता और दीन-दुनिया की किताबें पढ़ा करता था।
आदिलाबाद के फर्जी एनकाउंटर में हेम के मारे जाने की खबर ज्यों ही उत्तराखण्ड में फैली कई परिचितों के फोन मेरे पास आये। एक महिला से फोन पर बातचीत करते हुए जब मैं खुद को फफकने से रोक नहीं पाया तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा रो क्यों रहे हो ? तुम्हें तो फख्र होना चाहिए कि हेम जैसा नौजवान तुम्हारा साथी था। वह तो उत्तराखण्ड का भगत सिंह है।’’ यह बात गलत भी नहीं है। उसे जानने वालों के लिए वह भगत सिंह से कम नहीं है। उसकी विचारधारा के बारे में हर कोई जानता था। लेकिन यह उसकी ईमानदारी ही थी कि क्या कांग्रेस, क्या उक्रांद और क्या भाजपा, सबने उसकी हत्या की कड़ी निंदा की। इसलिए, क्योंकि लोग जानते थे कि हेम जैसा शांत स्वभाव का आदमी हिंसा कर ही नहीं सकता। इसी कारण हर उत्तराखण्डी का मन उसकी निर्मम हत्या से तार-तार हो गया था। उसके छोटे से कस्बे देवलथल में उसकी हत्या के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे। यूनेस्को से लेकर सामाजिक सरोकारों से ताल्लुक रखने वाले देश के कई संगठन और बुद्धिजीवियों ने सरकार प्रायोजित इस हत्याकांड को लोकतंत्र पर काला धब्बा बताया।
हेम की हत्या हुए चार महीने गुजर गये हैं। लेकिन चौतरफा दबाव के बावजूद केन्द्र और आंध्र प्रदेश की लोकतांत्रिक सरकारों ने इस घटना की जाँच पर मौन साध रखा है। अब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी हेम के परिजनों को नहीं सौंपी गई है। यह रिपोर्ट ‘फैक्ट फाइंडिंग’ टीम को तक देखने नही दी गई। जबकि ‘आउटलुक’ पत्रिका ने अपनी रिपोर्ट में इस मुठभेड़ को ठंडे दिमाग से की गई हत्या करार दिया है और खुलासा किया है कि हेम और आजाद को सात सेमी. से भी कम दूरी से गोली मारी गई है। एक नौजवान पत्रकार के मारे जाने की इस घटना की अगर सरकार ईमानदारी से जाँच करा देती तो उससे लोगों का भारतीय लोकतंत्र पर विश्वास बढ़ता ही, घटता नहीं। अब हेम के परिजनों ने मजबूर हो कर सुप्रीम कोर्ट में फरियाद लगाई है। पुलिसिया आतंक के शिकार इस परिवार को न्याय कब मिलेगा ये कह पाना कठिन है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी है कि हमारे मुल्क की पुलिस और सरकारों के लिए आम आदमी की जान की कोई कीमत नहीं है।
पिथौरागढ़ भले ही देश का सीमान्त हो, लेकिन देश के लिये खुद को मिटा देने का जज्बा यहाँ के लोगों में कभी कम नहीं रहा। यहाँ के नौजवानों ने सीमाओं की रक्षा के लिये प्राण गँवाये तो हेम ने गरीब-शोषित जनता की मुक्ति के लिये अपने प्राण न्यौछावर किये।
कॉलेज के दौर में मेरी साथी और आज की मेरी जीवनसंगिनी पूनम को अपने साथियों से डायरी लिखवाने का काफी शौक था। हेम का लिखा पन्ना मेरी आँखों के सामने है। उसके लिखे पन्ने के अन्त में पूनम ने लिखा था -
इंसाफ की लड़ाई में, मौत कोई शिकस्त नहीं होती,
शहीदों को कही अलविदा, कभी पस्त नही होती।
जिन्दगी के लिए दाँव चढ़ी जिन्दगी, कभी खत्म नहीं होती।
तब किसने सोचा था कि यह कविता कभी हकीकत में बदल जायेगी ?