मैं महाविद्यालय प्रांगण में घूम ही रहा था कि एक छात्र ने मुझसे पूछा, ‘‘सर पोल साइंस के फर्स्ट पेपर का नाम क्या है ?’’ मैंने पूछा-‘‘अरे परसों तो इक्जाम है, तुम अब पूछ रहे हो ?’’ तो उसने कहा, ‘‘तो क्या गुरुजी, ‘लक्ष्मी’ जिन्दाबाद। वन नाइट फाइट.. …….।’’ मैने कहा मतलब ? तो वह बोला, ‘‘सर रात भर पढ़ कर हो जाता है।’’ और जब रिजल्ट निकला तो वाकई वह 58 प्रतिशत लिए था और हमारे कुछ गुडी-गुडी बॉय, जो रोज क्लास में आते थे, 50-55 के बीच ही रहे!
इस प्रकार ‘लक्ष्मी’ ने माँ शारदा, सरस्वती के प्रांगण में प्रवेश कर उन्हें अपदस्थ कर दिया। विद्यार्थी जिनको हम परीक्षा हॉल में पहचानने की कोशिश करते हैं, अगर साल भर आ ही जाते तो कोई हॉल, कक्ष ऐसा नहीं जो उन्हें स्थान दे सके। प्रारम्भ में कक्षा में छात्र-छात्राएँ खड़े रहते थे हॉल में। अब तो प्रवेश 45 प्रतिशत का भी हो जाता है। परीक्षा के प्रारम्भ होने की यह प्रक्रिया इतनी अद्भुत है कि हाल ही में प्रकाशित यशपाल कमेटी की रिपोर्ट उच्च शिक्षा के नाम पर चलते इन हादसों के नजारों को देख समझ नहीं पाई होगी। उच्च शिक्षा के नाम पर यह धाँधली हमारे नौनिहालों के भविष्य पर क्रॉस लगाती है। शिक्षा लकवा व पीलियाग्रस्त है। अपने हर क्षेत्र में, यथा प्रवेश, परीक्षा, प्रश्न पत्र, नियुक्ति, भवन, उपकरण- सब में यह एक धीमे आतंक से प्रवहमान है।
इस ‘वन नाइट फाइट’ प्रक्रिया में आज, जब कि विश्वविद्यालय येन-केन प्रकारेण परीक्षा समाप्त करा लेता है, तब उत्तर पुस्तिकायें हस्तगत करने के लिए मारामार होने लगी। कापियाँ हस्तगत करने के लिए भी बाहुबली और जुगाड़ी होना आवश्यक है। कापियाँ जाँचने की प्रक्रिया में भी कुछ प्राध्यापक गजब की तकनीक आजमाते हैं, जो कभी कई धारा 302, 307 के अन्तर्गत आता है तो कभी गिनीज बुक्ज रिकॉर्ड भी बनाता है। हमारे एक साथी प्राध्यापक ने एक दिन में 150 कॉपियाँ जाँच दी। मैंने पूछा- कैसे ? तो बोले डॉक्टर साहब! इनट्यूशन……..इनट्यूशन। इस इनट्यूशन से मैं अचम्भित था। विद्यार्थी समय में एक साथी ने बताया था तो यकीन नहीं आया था कि एक प्रोफेसर कॉपी जाँचने शोध छात्रों को देते हैं। शोधछात्र खेल खेलते कॉपी की गड्डी फेंकते हैं। जो कॉपी टेबिल में गिर गई वह फस्ट क्लास, सोफे पर गिरी सेकेंड, जमीन में गिरी थर्ड। फेल कोई नहीं होता था। हमारे कुछ प्राध्यापक संतनुमा होते हैं। किसी को फेल न करते। क्रमशः 20, 25, 30 देते रहते हैं। सब समान समाजवादी नंबर।
एक कॉपी को देखने में कम से कम 7 मिनट चाहिए। इस हिसाब से दिन भर में कॉपी देखना 60 से ज्यादा संभव नहीं। पर 200 तक का रिकॉर्ड कुछ प्राध्यापक पूरा करते हैं। फिर कॉपियों में ऐसा मैटर, फिल्मी गाने होते हैं कि संवेदनशील प्राध्यापक या तो पागल सा हो इमोशनल अत्याचार का शिकार होता है या फिर मनोवैज्ञानिक बीमारी से ग्रस्त होता है कि सारी सूचनाओं के आधार पर वही अज्ञानी है। इन सूचनाओं की भाषा को लिपिबद्ध किया जाय तो लाफ्टर चेलेंज की पूरी सिरीज चल जाये। यथा गांधी जी आतंकवादी थे…..गांधी जी ने बाल विधवा पर काम किया। अन्य जानकारी के लिए ‘बालिका वधू’ सीरियल देखिये. …….मार्क्स ने जो कार्य किये वह वर्णन के बाहर है।……हिटलर भारत का वाइसराय था…..। इमानदार प्राध्यापक कहते हैं-बी.ए. फाइनल व एम ए. की कॉपी जाँचते समय यह होता है कि ये सब यहाँ तक कैसे पहुँचे ? जाहिर है प्राध्यापकों की लापरवाही, बेइमानी…. उदारता उन्हें पहुँचाती है।
यह पहले उच्च शिक्षा की निम्नता को प्रकट करती है। अब महाविद्यालय जो राजनैतिक आधार पर खुले हैं उनकी नियति पर गौर करें। एक सेवानिवृत्त प्राचार्य कहते हैं- मैं सुबह विद्यालय शटर खोलकर एक दुकान में शुरू करता था। मैं ही चपरासी, बाबू, प्राध्यापक सब था। रात को पीतल की घंटी चोरी न हो जाये, इस डर से सिरहाने उसे रख कर सोता था, तभी नींद आती थी। आठ छात्र थे जो कभी-कभी आते थे….।
उच्च शिक्षा का एक नमूना यह है कि आज उत्तराखंड के महाविद्यालयों में पाँच प्रकार के प्राध्यापक हैं, जिन्हें वेतन संविधान के मौलिक अधिकार के खिलाफ ‘समान कार्य समान वेतन’ के आधार पर नहीं मिलता। उत्तराखंड सरकार इनमें से एक वर्ग के प्राध्यापकों पर लाठी चार्ज भी करवा चुकी है। उन्हें जेल भी डाल चुकी है। दो प्रकार कॉंट्रेक्ट बेसिस पर हैं जिन्हें 8 से 10 हजार रुपया मिलता है। एक रिटायर्ड प्राध्यापक वर्ग है, जिन्हें समयानुसार बदल-बदल कर वेतन दिया जाता है। यह इस पर निर्भर करता है कि रिटायर्ड प्राध्यापक का राज्य की राजनीति में क्या रुतबा है। कुछ प्राध्यापकों को 15 हजार रुपया भी मिलता है। कॉंट्रेक्ट वेतन रिटायर्ड डॉक्टर को 15 से 20 हजार रुपये तक मिलता है। जबकि छठे वेतन आयोग के आधार पर एक चपरासी को 10 हजार बेसिक मिलता है। उच्च शिक्षा क्षेत्र में प्राध्यापकों की यह बेइज्जती और संवैधानिक दुर्गति इसी देव भूमि में ही हो सकती है। ये सभी प्राध्यापक यू.जी.सी. मापदंडों को पूरा करते हैं। पर उन्हें सालों लटकाया जाता है। कोर्टों के चक्कर लगवाये जाते हैं। ये ड्रामेबाजी क्यों ? आप कमीशन की पोस्ट नहीं निकाल सकते तो आप ये धंधा क्यों करते हैं ? विगत 40 साल का इतिहास उच्च शिक्षा में इसी ड्रामेबाजी को दोहराता है। उत्तराखंड सरकार ने तो हद कर दी । उसने पाँच किस्म के प्रताड़ित प्राध्यापक पैदा कर दिये हैं।
अब स्थानान्तरण पोस्टिंग का धंधा देखिये- इसमें बाहुबली, पहिचान सब तिकड़म काम करती है। एक प्रवक्ता का विषय ही नहीं था, फिर भी उसे मनोवांछित जगह पर अटैच्ड करके भेज दिया गया। बहुत से बाहुबली प्राध्यापक सुविधाजनक स्थल पर ही पोस्टिंग लेते हैं और वहीं से रिटायर होते हैं। अप्रभावशाली प्रवक्ता जीवन भर दूरस्थ प्रदेश में रोते रहते हैं।
अब उच्च शिक्षा का शिक्षा सत्र देखिये- महाविद्यालयों में अध्ययन के सिवा सब होता है। किसी अनुभवी कर्मचारी का कहना है- वही प्रिंसिपल सफल जो ए.ई.ई. को निभा ले। यानी एडमिशन, इलेक्शन, इक्जाम। और पढ़ाई ? ….मैं पूछता हूँ तो वे कहते हैं- जिस प्रिंसिपल ने पढ़ाई पर ध्यान दिया वह गया। कोई पढ़ाने गया तो वह और भी गया। अगर वह क्लास गया तो हम क्लास से खींच कर ले आयेंगे-चलिये सर दस्तखत करने हैं….। महाविद्यालय की गुणवत्ता निर्धारित करने वाला प्रोफेशनल ‘नैक’ जिसे ‘नाक’ कहा जाता है, ऐसी संस्थाओं को क्या ग्रेड देगा ? एक प्रिंसिपल से जब मैंने कहा- सर! एम.ए. के लिए क्लास नहीं मिल रही तो वे बोले- अरे क्यों उन सालों को पढ़ाना है। बस बी.ए. पढ़ाओ क्योंकि वह हल्ला करते हैं। न पढ़ाने के मामले में प्राध्यापक और छात्रों में अंडरस्टेंडिंग जल्दी ही हो जाती है।
दो बजे बाद सारे महाविद्यालय में शांति फैल जाती है, श्मशान सी। ![]()
सो जुलाय से परीक्षा के पहले दिन तक एडमिशन हो सकता है, फार्म भर सकते हैं। विश्वविद्यालय को पैसा चाहिये। परीक्षा- पहले प्रमुख परीक्षा, फिर इम्प्रूवमेंट, फिर छात्र संग्राम हंगामा फिर बहुत थक गये तो आराम- दशहरे की छुट्टी। 10 दिन रावण मर्दन के लिये (जो कभी नहीं मरता)…. फिर दिवाली की छुट्टी……पटाखा जुआ भी तो खेलना हुआ। फिर जाड़ा लग जाता है। फिर प्राध्यापक या छात्र या कर्मचारी हड़ताल पर। सन् 2008 के सत्र में एक आंकलन के अनुसार 20 दिन से अधिक कक्षायें नहीं हुईं। फिर इस बार देश को लोकतांत्रिक भी बनाना था। फिर छठा वेतन आयोग। एक गार्जियन कहते हैं- इन्हें छठा वेतनमान देने का क्या न्याय है। सत्तर हजार पर दस्तखत करने वाला कितने दिन पढ़ाता है। पहिले से देखिये। यह 70 हजार भी एक ऑटोग्राफ देने पर मिलते हैं। आलम है कि कुछ प्राध्यापक -प्राध्यापिकायें किसी स्कूटर पर कॉलेज आने पर उसे स्टार्ट ही किये रहते हैं। मैडम-सर दस्तखत कर तुरन्त आये और स्टार्ट स्कूटर में चले गया। एक बार मैं किसी गाँव में मंत्री जी के साथ गया था। गाँव प्रधान ने प्राइमरी स्कूल के अध्यापकों की शिकायत कर कहा – श्रीमान हमारे प्राइमरी स्कूल के अध्यापक तो किसी कॉलेज के प्राध्यापक जैसे हो गये, दस्तखत किये और चल दिये।
प्राध्यापकों का संगठन फुक्टा का काम अपने को बढ़िया जगह रखने के अलावा और कुछ नहीं होता।
इस प्रकार उच्च शिक्षा हम्माम में नंगी न हो खुले आम नंगी है। यशपाल कमेटी ने हमारे उत्तराखंड के महाविद्यालयों के दर्शन नहीं किये होंगे वरना पगला जाते क्या उच्च शिक्षा इतनी निम्न है ? एक बार मैं गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर किसी काम से गया। गेट के पास दो व्यक्तियों में माँ-बहनों के साथ संबंध जोड़ने वाली गालियों के साथ मारामार हो रही थी। मैंने पूछा ये कौन हैं, तो बताया कि ये प्राध्यापक हैं। प्रोफेसरशिप के मामले में भिड़ रहे हैं। दिल्ली का डीयू हो जेएनयू या इलाहाबाद सब जगह नियुक्तियों को लेकर, सेमीनारों को लेकर, प्रमोशन को लेकर गंदी राजनीति हद पार कर चुकी है। इलाहाबाद जैसे संस्थान में पढ़ाई साइड बिजनैस जैसी है। जाति के नाम पर खुले प्राइवेट कॉलेज में उच्च शिक्षा का नरक दर्शन है। इस प्रकार उच्च शिक्षा में प्राइवेट कॉलेज जहाँ सामंतवादी व्यवस्था के प्रतीक हैं तो वहीं सरकारी महाविद्यालय टुच्ची राजनीति, निम्न पूँजीवादी व्यवस्था के साइड इफेक्ट हैं।
bahut achhe bani hai….mehnat jhalak rahi hai…website
वर्तमान शिक्षा के सम्बन्ध में आपके विचार बिल्कुल सत्य हैं मैं भी प्रदेश के एक बड़े निजी विश्वविद्यालय में कार्यरत हुं और ऐसी घटनाओ से रोज दो चार होना पड़्ता है आज शिक्षा का एक मात्र उद्देष्य डिग्री लेने तक सिमित है छात्रो की समान्य जानकारी शुन्य है
Upreti Sahab
You have raised valid questions. But also must ask to the editor of this publication. What is the state-of- affairs in Kumaun University, where he is one of the THEKEDAR? Those who have managed themselves the degree through ‘one night fighting’ are appointed as professors (that too which blessings and active support of our editor shahib). Ask him what kinds of people are appointed professors during last three years when he was a member of the executive council. What do you expect from the type of the people coming in the system? They will deliver what they have. When the editor of this publication is himself is a part of this cartel what is the sense in putting these views here.
Thanks for removing my comment. But remember you get what you deserve. You deserve only the rubbish because you do not allow good people to come and to stay in Universities. First you do introspection what kind of the people you lobby for in university appointments.