उच्च शिक्षा (आशय बारहवीं के बाद की शिक्षा से है) के दो रूप हैं- ज्ञानमूलक एवं क्षमतामूलक। दोनों के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींच पाना कठिन है किन्तु ‘बुद्धि के लिये बुद्धि का प्रशिक्षण’ एवं ‘क्रियात्मक शिक्षा या रोजगार के लिये दक्षता का प्रशिक्षण’ जैसी मोटी रेखा खींची जा सकती है। पहले प्रकार में यह चिंतन के परिष्कार से जुड़ा मामला अधिक है, रोजगारपरक किसी कौशल के सृजन का कम। यह प्रखर मेधा युक्त विद्यार्थी की कर्मस्थली है। इस क्षेत्र में सभी के लिये उच्च शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का नगाड़ा बजाते हुए प्रत्येक ‘आडू-बेडू-घिंघारू’ विद्यार्थी को प्रवेश देने की लोक लुभावन बात नहीं की जा सकती। दूसरी ओर यदि उच्च शिक्षा जनता के लिये है और उसे रोजगार प्राप्ति का साधन मानना ज्यादा जरूरी समझा जाये तो व्यावसायिक शिक्षा की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि पात्र-कुपात्र सभी के लिये ज्ञानमूलक शिक्षा के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प उपलब्ध न हो तो डिग्री धारी बेरोजगारों संख्या में वृद्धि होना स्वाभाविक है। इस पृष्ठभूमि में उत्तराखंड राज्य की स्थापना के साथ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक नीतिगत परिवर्तन दक्षतामूलक- उन्मुखता की ओर लाया जाना आवश्यक था, ताकि बढ़ती बेरोजगारी के कारण समाज विरोधी कामों एवं तोड़-फोड़ में संलग्न या फिर बजरी-पत्थर-शराब, भू, वन एवं बिल्डर माफिया से जुड़ती युवा कार्यकारी जनसंख्या को सकारात्मक दिशा मिल सके। ऐसा कोई नीतिगत परिवर्तन दिखाई नहीं दिया है।
राज्य स्थापना के समय 34 महाविद्यालय थे। नौ साल बाद अब 69 हैं। सतह के नीचे का सच यह है कि एक अदद डिग्री कॉलेज की स्थापना सरकार के लिये सर्वाधिक सरल काम है। इसके लिये घोषणा के अतिरिक्त विशेष कुछ नहीं करना होता। स्थान विशेष की स्थापना की आवश्यकता, उपयुक्तता संबंधी कोई आँकलन नहीं किया जाता। अतिरिक्त बजट संबंधी कोई दबाव नहीं होता, नियुक्तियों एवं बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर के बिना इन्हें खोले जाने का खेल सालों से चल रहा है। किसी भी सरकारी स्कूल/कॉलेज के दो कमरे, यहाँ तक कि बंद हो गई दुकान का एक दर भर चाहिये। फिर अगल-बगल के किसी कॉलेज से एक प्रवक्ता और बाबू का एटेचमेंट किया और खुल गया डिग्री कॉलेज। जानकार बताते हैं कि ऐसे कई डिग्री कॉलेज के प्रभारी प्राचार्यों ने बुनियादी स्टेशनरी आदि की व्यवस्था अपनी जेब से की थी। बी.ए. की पढ़ाई के लिये चार विषयों के चार नहीं, बस प्रभारी प्राचार्य (बच्चीराम हवलदार) का दायित्व निभाने वाला एक प्राध्यापक और कहीं बेहतर जगह जाकर पढ़ने में असमर्थ दस-बारह विवश विद्यार्थी- उत्तराखंड की बहुत के कई डिग्री कॉलेजों का यह सामान्य परिदृश्य है। इसी अगस्त में सम्पन्न प्रमोशनों से पूर्व इन 69 में से 52 महाविद्यालय प्रभारी प्राचार्यों के जिम्मे थे और एक वरिष्ठ प्राध्यापक के पास अपने कॉलेज के अतिरिक्त दो अन्य महाविद्यालयों (कुल मिलाकर तीन) का चार्ज था। इस छद्म पर आपत्ति किसी को नहीं है। मान्यता देने वाले विश्वविद्यालय को नहीं, उच्च शिक्षा निदेशालय को नहीं, शासन-प्रशासन को नहीं, सर्वोपरि शिक्षकों-विद्यार्थियों, अभिभावकों को भी नहीं।
नये खोले जाने वाले डिग्री कॉलेजों में व्यावसायिक/ रोजगारपरक शिक्षा की संभावना की तलाश एक शिक्षा-सचिव ने बी.कॉम. कक्षाओं के संचालन में की। परिणामतः नये खोले गये पाँच-सात महाविद्यालय केवल कॉमर्स विषयक रहे। एक अनदेखी जरूर हो गयी कि निकटवर्ती इंटर कॉलेजों में कॉमर्स विषय था ही नहीं, परिणामतः कॉलेज तो खुले, विद्यार्थी नहीं मिले !
उच्च शिक्षा निदेशालय राज्य स्थापना के तत्काल बाद से शासन एवं शिक्षण संस्थाओं के बीच एक पोस्ट ऑफिस में तब्दील हो गया है। समस्त नीति निर्माण, क्रियान्वयन, चिंतन-विमर्श से लेकर पदोन्नतियों एवं स्थानान्तरणों तक का समूचा दायित्व नौकरशाहों के जिम्मे है। आई.ए.एस. से बड़ा चिंतक एवं ‘विजनरी’ कोई और हो सकता है भला ? इन नौ सालों में जो कुछ तथाकथित नया दिखायी दिया है वह इन्हीं के चिंतन (सनक बेहतर शब्द है) का नतीजा है। नये खोले जाने वाले डिग्री कॉलेजों में व्यावसायिक/ रोजगारपरक शिक्षा की संभावना की तलाश एक शिक्षा-सचिव ने बी.कॉम. कक्षाओं के संचालन में की। परिणामतः नये खोले गये पाँच-सात महाविद्यालय केवल कॉमर्स विषयक रहे। एक अनदेखी जरूर हो गयी कि निकटवर्ती इंटर कॉलेजों में कॉमर्स विषय था ही नहीं, परिणामतः कॉलेज तो खुले, विद्यार्थी नहीं मिले !
कम्प्यूटर को रोजगारपरक शिक्षा की ‘महोषधि’ मानते हुए ‘एप्टेक’ के साथ मिलकर महाविद्यालयों में एक परियोजना का सूत्रपात किया गया। दावा था कि इससे महाविद्यालय की डिग्री के साथ-साथ विद्यार्थी एस.सी.ए. स्तर तक का कम्प्यूटर प्रशिक्षण (बी लेबल प्राप्त कर सकेगा)। परियोजना का एम.ओ.यू. साइन करने के बाद तत्कालीन शिक्षा सचिव (कोई सिन्हा थे शायद) का बयान भी आया कि इस व्यवस्था से तीन सालों के भीतर उत्तराखंड में आई.टी. प्रोफेशनल्स की ऐसी बाढ़ आयेगी कि उत्तराखंड अपनी ही नहीं वरन् पूरे देश की तत्संबंधी आपूर्ति कर सकेगा। किसी ने नहीं सोचा कि किसी तरह गाइड्स और बैक-पेपर्स की सुविधा की मदद से घिसट-घिसट कर स्नातक की परीक्षा पास कर सकने वाला विद्यार्थी कैसे ऐसा कर सकेगा ? सो वर्तमान में ‘शिखर’ नाम की यह परियोजना पातालोन्मुखी है।
एक शिक्षा सचिव को विचार आया कि जब इतने सारे निजी संस्थान बी.एड. की डिग्री बाँट रहे हैं तो क्यों न राजकीय महाविद्यालय भी वित्त जुटाने की मुहिम के तहत इस गंगा में गोते लगायें। फरमान जारी हुआ कि तत्काल तत्संबंधी प्रस्ताव भेजे जायें। सरकारी नौकर को बिना सोचे-विचारे आदेश पालन करना होता है। परिणामतः अपनी कक्षाओं तक के लिये अपर्याप्य आधारभूत संरचना की सच्चाई को अनदेखा कर तमाम कॉलेजों से प्रस्ताव भेजे गये। ए.आई.सी.टी.ई. एवं विश्वविद्यालय के निरीक्षण-पैनल्स को मौजूदा पाठ्यक्रमों के लिये ही अपर्याप्य शिक्षण कक्ष एवं प्रयोगशालायें बी.एड. के निमित्त बता कर दिखाई गई। पत्रं पुष्पम भी हुआ और बी.एड. कक्षायें चलाने की अनुमति मिल गई। एक महाविद्यालय के प्राचार्य ऐसे छद्म को निभाने में असमर्थ पाये गये तो उनको निलम्बित कर दिये जाने की धमकी शिक्षा सचिव ने दी।
राजकीय महाविद्यालयों में पारंपरिक पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के भी संचालन का एक खेल पहले यू.जी.सी. एवं तदोपरान्त राज्य सरकार की कृपा से अस्तित्व में आया है। टूरिज्म, ईकोटूरिज्म, योगा, सेक्रेटेरियल प्रेक्टिस, कम्प्यूटर संबंधी अनेक पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये गये। शुरूआती दो-तीन वर्षों तक पैसा यू.जी.सी. या राज्य सरकार से आना था तदोपरांत चूँकि पाठ्यक्रम स्व वित्तपोषित थे एक निधि बन जानी थी जिसके सहारे पाठ्यक्रम चलता रहता। अवधारणा के स्तर पर ठीक-ठाक लगने वाले इन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन अद्भुत रहा। टीचिंग फैकल्टी की व्यवस्था पाठ्यक्रम-संयोजकों को अपने आसपास से मानदेय के आधार पर करनी थी- प्रति व्याख्यान मानदेय निर्धारित था (पाठ्यक्रम संयोजक एवं महाविद्यालय प्राचार्य के लिये भी कार्यक्रम में मानदेय की व्यवस्था है)। पहली कठिनाई फैकल्टी के संदर्भ में आई। परिणामतः महाविद्यालय के ही गुरुजी लोग संलग्न हुए। मानदेय के लिये जिस तरह संभव हुआ थोड़ा बहुत पढ़ा, पढ़ाया। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से रोजगार प्राप्त करने की संभावनाओं के शून्य होने एवं प्रदत्त प्रमाणपत्रों की रोजगार-बाजार में कोई पूछ न होने से इन व्यावसायिक कार्यक्रमों की कलई तो दो-एक साल में ही खुल गयी। अब न विद्यार्थी हैं न अनुदान, किन्तु महाविद्यालयों में प्राध्यापकों को मानदेय रूपी उपरी आय का व्यावसायिक चस्का जरूर लग गया। सौ-दो सौ प्रति व्याख्यान के लिये प्राध्यापक ऐसे-ऐसे विषयों के अध्यापन में संलग्न दिखाये जाते हैं (हाजिरी रजिस्टर में) जिसके क ख ग से भी उनका परिचय नहीं है। योग जैसे व्यावहारिक पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षक की भी आवश्यकता होती है… आसन दिखाने/सिखाने पड़ेंगे। संयोजक से तो अर्द्ध पद्मासन भी नहीं लगेगा। ऐसे पाठ्यक्रमों में संयोजक ‘एको अहं द्वितीयो नास्ति’ की हैसियत में चूंकि नहीं होता. …. बंदरबाँट का सच जल्दी बाहर आ जाता है। संबंधित विषय में योग्यता प्राप्त प्रशिक्षक को विषय के सैद्धान्तिक पहलू संबंधी व्याख्यान न देकर स्वयं संयोजक महोदय इधर-उधर से थोड़ा पढ़-पढ़ा कर व्याख्यान करते हैं, मानदेय की फसल काटते हैं। कॉलेज से वेतन और व्यावसायिकता पाठ्यक्रम से मानदेय- डबल इनकम और पूरी तरह मानदेय पर निर्भर प्रशिक्षक बिसूरता रहता है।
यक्ष प्रश्न है कि उच्च शिक्षा में यह सब क्या और क्यों हो रहा है ? क्या इसलिये कि पारंपरिक पाठ्यक्रम निरर्थक हो गये हैं ? कोई नीति, चिंतन-विमर्श, विजन तो मौजूदा तथाकथित व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में भी नहीं है। हाँ, इनके नाम पर जो कुछ महाविद्यालयों में हो रहा है उससे न तो ये पारंपरिक शिक्षा देने वाले रहे न व्यावसायिक। ‘निरर्थक’ हो गये। दरअसल डिग्री कॉलेजों के निरर्थक होते जाने की शुरूआत तो उत्तर प्रदेश के ही जमाने में हो गयी थी। उत्तराखंड की स्थापना ने इसे त्वरण दिया।
इधर ओपन यूनिवर्सिटी की एक कन्वर्जेंस स्कीम की चर्चा है। इसके तहत पारंपरिक एवं व्यावसायिक तमाम पाठ्यक्रम चलाये जाने हैं। बी.ए./एम. ए से लेकर एम.सी.ए., एम.बी.ए., जर्नलिज्म आदि आदि तक बत्तीसों पाठ्यक्रम। बी.एड. की भी व्यवस्था होगी। एक ही कॉलेज में बी.एड. के दो कार्यक्रम। एक कॉलेज से ही बी.एड. की डिग्री प्राप्त तीन सौ स्नातक प्रतिवर्ष निकलेंगे। अब जायेंगे कहाँ यह प्रश्न न उठाया जाये। बत्तीसों कार्यक्रमों की सूचना देने वाले फ्लेक्सी पट्ट आजकल महाविद्यालयों में लगे हैं। इन पाठ्यक्रमों के शुल्क का आधा ओपन-यूनिवर्सटी को जायेगा स्टडी मैटीरियल के बदले और आधे से पाठ्यक्रम संचालित होंगे- संयोजक महाविद्यालय के भीतर से आयेंगे। संबंधित विषयों के विशेषज्ञ आमंत्रित होंगे, मानदेय के आधार पर। विषय विशेषज्ञ हर जगह तो उपलब्ध होंगे नहीं, परिणामतः अंततः ‘तू मेरे विषय में विशेषज्ञ, मैं तेरे विषय में विशेषज्ञ’ की बंदरबाँट होनी है। दो-तीन साल में इसने भी बैठ ही जाना है।
यक्ष प्रश्न है कि उच्च शिक्षा में यह सब क्या और क्यों हो रहा है ? क्या इसलिये कि पारंपरिक पाठ्यक्रम निरर्थक हो गये हैं ? कोई नीति, चिंतन-विमर्श, विजन तो मौजूदा तथाकथित व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में भी नहीं है। हाँ, इनके नाम पर जो कुछ महाविद्यालयों में हो रहा है उससे न तो ये पारंपरिक शिक्षा देने वाले रहे न व्यावसायिक। ‘निरर्थक’ हो गये। दरअसल डिग्री कॉलेजों के निरर्थक होते जाने की शुरूआत तो उत्तर प्रदेश के ही जमाने में हो गयी थी। उत्तराखंड की स्थापना ने इसे त्वरण दिया।
‘बुद्धि के लिये बुद्धि का प्रशिक्षण’ देने वाले पाठ्यक्रम चलाने वाले इन महाविद्यालयों में विशेषतः कला एवं वाणिज्य विषयक कक्षाओं में (यदि प्रयोगशाला संबंधी बंधन न होता तो शायद विज्ञान में भी) प्रवेश हेतु विद्यार्थियों की संख्या निर्धारित नहीं है। प्रवेश हेतु न्यूनतम अर्हता इंटर में 40 प्रतिशत प्राप्तांक हैं (जिसको भी थोड़ा-बहुत घटा लेने की मारा-मारी रहती है)। परिणामतः स्थिति यह रहती है कि यदि स्नातक प्रथम वर्ष के कला के कुछ विषयों में प्रवेश प्राप्त छात्रों में से आधे भी किसी दिन पढ़ने आ जायें तो किसी शिक्षण कक्ष में अँटा नहीं पायेंगे। वह तो इधर चूंकि पढ़ने कोई आता ही नहीं है, या फिर दस-बारह प्रतिशत विद्यार्थी ही छात्र संघ का चुनाव हो जाने तक आते हैं। काम चल रहा है। किसी भी डिग्री कॉलेज में दोपहर दो बजे बाद विद्यार्थी तो विद्यार्थी प्राध्यापक भी नहीं मिलते। शिक्षक एक ऐसा दुकानदार हो गया है, जिसका माल कोई मुफ्त में भी लेने को तैयार नहीं।
चूँकि प्राध्यापक एवं विद्यार्थी के बीच सकारात्मक संपर्क शिक्षण कक्ष में ही संभव होता है (म्यूचल दुष्कर्मों संबंधी सम्पर्क के लिये कक्षाओं की जरूरत नहीं होती), यह संपर्क अब अनुपस्थित है। जब यह सम्पर्क मौजूद था, तब विद्यार्थी अच्छे एवं बुरे अध्यापकों के बीच भेद करने में समर्थ था और उनकी डाँट भी बर्दाश्त कर लेता था। इधर सभी अध्यापक एक भाव हैं। छात्र एकता का ऐसा दबदबा है कि एक प्राध्यापक से असंतुष्ट छात्र संघ ने छात्राओं के साथ अश्लील व्यवहार का आरोप लगाकर उसे हटाने के लिये दबाव बनाया। प्राध्यापक महोदय तत्काल अन्यत्र सम्बद्ध कर दिया गया- इतने संगीन आरोप की कोई जांच नहीं हुई। जाँच का प्रश्न ही नहीं उठा। महीना दो महीना बीतते न बीतते उन्हें उसी छात्र संघ के अनुरोध पर उच्च शिक्षा निदेशक उसी महाविद्यालय में वापिस ही नहीं लाये वरन् तत्संबंधी आदेश में यह उल्लेख भी किया कि ऐसा छात्र संघ के अनुरोध पर किया गया है। वास्तविकता यह है कि उच्च शिक्षा संबंधी इन संस्थानों में नियम-कानून, व्यवस्था प्रक्रिया संबंधी दायित्व या तो छात्र नेताओं के हवाले हैं या माननीय उच्च न्यायालय के। बाकी सब अफीम खाकर अण्टागफील हैं।
अगस्त 2009 में 52 महाविद्यालयों में प्राचार्यों की नियुक्ति उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से ही हो पाई। स्थानान्तरण जैसी रूटीन गतिविधि के लिये भी माननीय उच्च न्यायालय को ही सक्रिय होना पड़ा। इस हस्तक्षेप के बिना निदेशालय और शासन शायद इस दिशा में हिल भी नहीं पाते। 1980 में हुए विनियमितीकरण से असंतुष्ट एक प्राध्यापक के प्रत्यावेदनों पर उत्तर प्रदेश के जमाने से लेकर उत्तराखंड की स्थापना के बाद तक कोई निष्कर्ष ही यदि नहीं निकाला जाये तो परिणाम ऐसा ही होना था। नाम कितना ही भारी-भरकम क्यों न लगे उच्च शिक्षा निदेशालय की हैसियत एक पोस्ट ऑफिस की बना दी गयी है। ब्यूरोक्रेसी चाहती ही नहीं कि निदेशालय का अपना कोई व्यक्तित्व हो। उच्च शिक्षा निदेशक की नियुक्ति शासन की ‘दया’ पर है। संबंधित प्राध्यापक को प्रभारी निदेशक या संयुक्त निदेशक की कुर्सी पर बिठाकर नियुक्ति लटकाई जाती है। संबंधित व्यक्ति इस नियुक्ति के लिये हाथ जोड़कर घिघियाता रहता है। इस बेचारगी के बाद व्यक्तित्वविहीन इन निदेशकों से उच्च शिक्षा संबंधी किसी ‘विजन’ की उम्मीद पत्थर से पानी निकालने जैसी है। उससे उच्च शिक्षा संबंधी नीति-चिन्तन-विमर्श की क्या उम्मीद ?
एक नया ‘वायरस’ जो पिछले नौ सालों में पनपा है: पुस्तकालय-खरीद, क्रीड़ा, एन.एस.एस. , परीक्षा एवं सर्वोपरि व्यावसायिक/स्व वित्त पोषित पाठ्यक्रमों से थोड़ा बहुत पैसा बटोर सकने का वायरस। प्राध्यापक दो वर्गों मे बँटे हैं – ‘निर्लिप्त’ एवं ‘लिप्त’। जो निर्लिप्त हैं वे घोर बेचारगी में हैं। इधर उन्होंने एक दर्शन ओढ़ लिया है। ‘जब कोई आता ही नहीं है तो पढ़ायें किसे ?’ ‘अब हम पुलिस का काम करने के लिये तो रखे नही गये हैं, कैसे किसी को रोक सकते हैं ?’, ‘पापी पेट के लिये यहाँ पड़े हैं वैसे भी और कहीं तो रोजगार अब मिलेगा नहीं’, इस दर्शन के सूक्त-वाक्य हैं। प्राध्यापकों का अधिसंख्य इसी वर्ग में है। लिप्त वह है जिन्हें इधर-उधर से थोड़ा बहुत खुरच पाने में कोई आपत्ति नहीं है। वे थोड़ा उत्साह में दिखाई देते हैं। गैर अकादमिक गतिविधियों में यही वर्ग सर्वाधिक सक्रिय है। प्राचार्यों के इर्द-गिर्द इन्हीं का घेरा होता है। किसी शैक्षिक सत्र की सफलता का प्रचलित मानक है प्रवेश, छात्रसंघ निर्वाचन एवं परीक्षा का निर्विघ्न सम्पन्न हो जाना और किसी तरह यह सम्पन्न हो ही जाते हैं। इस वर्ग में प्राध्यापकों की थोड़ी ही संख्या वर्तमान में है किन्तु संख्या बढ़ रही है। किसी जुगाड़ से थोड़ा पैसा बनाने की चाह डिग्री कॉलेज के प्राचार्यों/प्राध्यापकों को ग्रस रहा नया संक्रामक रोग है।
ज्ञानी जन बताते हैं कि एक उच्च शिक्षा निदेशक ने उत्तराखंड के तमाम महाविद्यालयों को वाया ऋषिकेश पुस्तकें क्रय करने का रास्ता दिखाकर इस विषाणु को पोषित किया। पुस्तकालयों को पुस्तकें नियमानुसार निर्धारित कमीशन पर ही सप्लाई हुई किन्तु एक मलाईदार परत का सृजन निदेशक महोदय के लिये किया गया। प्राचार्यों को विश्वास में लिये बिना यह संभव नहीं था परिणामतः कई पाक-साफ प्राचार्य बड़ी छटपटाहट में रहे। इस दौरान प्राचार्यों की कार्यक्षमता, कर्तव्यनिष्ठा और दायित्वों के निर्वहन संबंधी कौशल का आंकलन भी मलाई की व्यवस्था के आधार पर ही हुआ। एक महाविद्यालय के प्राचार्य विभागीय आवश्यकताओं को दरकिनार कर अपनी अपनी निजी कार में पुस्तकें ढोने के कारण चर्चा में हैं।
यह वायरस रिसते-रिसते प्राध्यापकों में भी अपना प्रभाव दिखाने लगा है। ऐसा नहीं है कि इस भ्रष्टाचार में रकमों का बंटाधार हो रहा है। ‘मुरली डिपार्टमेंट’ में इतना माल ही नहीं होता मगर नीयत खराब हो रही है। उत्तराखंड की बेसिक एवं माध्यमिक शिक्षा में ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसे के वर्चस्व एवं एक सुसंगठित माफिया की मौजूदगी सर्वविदित है और पिछले एक-दो वर्षों से उच्च शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही है।
महज राजनैतिक लाभ के लिये नये महाविद्यालयों की स्थापना ने पुराने महाविद्यालयों के अनुदानों एवं संसाधन परिस्थिति को दुष्प्रभावित किया है। विज्ञान की स्नातकोत्तर कक्षाओं का प्रयोगात्मक कार्य स्नातक स्तरीय प्रयोगशालाओं के भरोसे हैं। नये स्नातकोत्तर विषय खोले गये किन्तु प्राध्यापकों की संख्या नहीं बढ़ाई। प्रयोगशालाओं के लिये अनुदान नहीं दिये गये। भवनों की मरम्मत आदि के लिये पर्याप्त अनुदानों की व्यवस्था नहीं है। फर्नीचर अपर्याप्त है। दीमकों की चपेट मे हैं। छतें रिस रही हैं, प्लास्टर उखड़ कर गिर रहा है। पुस्तकालय पुरानी किताबों के गोदामों से अधिक कुछ नहीं है। कुल मिलाकर अध्ययन-अध्यापन हेतु वातावरण ही नहीं है। ऐसे में विद्यार्थियों का अधिसंख्य किसी मजबूरी में ही अब यहाँ प्रवेश लेता है। वास्तव में वह ऐसी शिक्षा का आकांक्षी है जो रोजगार के अवसरों को बढ़ाये, जबकि इन संस्थाओं में केवल बुद्धि के प्रशिक्षण की व्यवस्था (वह भी अपर्याप्त) है। इसके बावजूद अधिसंख्य विद्यार्थी शांत प्रकृति के हैं। जितना हो सकें पढ़ना चाहते हैं। छात्र नेता का बिल्ला लगाने वाले, भटके या राजनैतिक दलों के प्यादों की संख्या कम ही है, किन्तु बहुमत कमजोर, गूंगा, असंगठित तथा ‘लीव मी अलोन’ टाइप है परिणामतः भटका अल्पमत छात्र एकता के नाम पर अपनी इच्छा लादने में सफल हो जाता है।
प्राध्यापकों का कर्तव्य था कि वह इस बहुमत को ताकत दे, उसे संगठित करे, उद्देश्य तथा विश्वास प्रदान करे। किन्तु ऐसा तभी संभव है, जब शिक्षा एवं विद्यार्थी के बीच शिक्षण कक्ष का सम्पर्क पुनर्स्थापित किया जाये। ![]()
अब बचा कौन ? अभिभावक ? किन्तु जब दाल के दाम सैकड़ों पर पहुँचने वाले हों, आलू-मूली तीस रुपये किलो बिकती हो। उसका ध्यान अपनी आय और खर्च के बीच किसी तरह एक सामंजस्य बिठाने की ओर लगा हो: उच्च शिक्षा के ये संस्थान, भले ही अल्पकालिक ही सही, उसे तसल्ली देते हैं। अपने बच्चों को प्राइवेट प्राइमरी स्कूलों एवं माध्यमिक कॉलेजों में पढ़ाने के दौरान अपने वेतन पर जो दबाव वह महसूस करता था, वह बच्चों के डिग्री कॉलेज पहुंचने पर एकाएक कम हो जाता है। फीस कम है, यूनीफार्म नहीं बनानी पड़ती। किताबों पर व्यय नहीं करना पड़ता। ज्यादातर का काम गाइड से काम चल जाता है, जिन्हें किताब चाहिये, उन्हें पुस्तकालय से अच्छी-बुरी मिल ही जाती है। स्नातक, स्नातकोत्तर करते करते पाँच साल गुजर ही जाते हैं। चारों ओर मचे घमासान के बीच लड़कों की बेरोजगारी एवं लड़कियों के शादी ब्याह की चिंता से वह चार-पांच सालों तक बचा रहता है। उनसे उच्च शिक्षा की स्थिति में सुधार की दिशा में सक्रियता की उम्मीद न ही की जाये तो बेहतर। जिनकी दाल-रोटी उच्च शिक्षा की बदौलत है पहली जिम्मेदारी तो उन्हीं की है या फिर उनकी, जो उत्तराखंड को एक आदर्श राज्य बनाने के लिये विधानसभा एवं सरकार में हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस नव सृजित राज्य में उच्च शिक्षा की स्थिति दयनीय है। एक दुष्चक्र व्याप्त है, जिसका सिरा खोजा जाना कठिन है। किन्तु सुधार असंभव भी नहीं। (जब तक वक्त के पेट में बच्चा है सुधार की उम्मीद सर्वत्र रहती है)। इतना तय है कि सुधार का सूत्रपात शासन-प्रशासन-सरकार-ब्यूरोक्रेसी की दिशा से नहीं होगा। ऐसी उम्मीद में अपनी कठिनाइयों एवं समस्याओं के निदान का भार पूरी तरह पेशेवर राजनीतिज्ञों पर छोड़ देने की सजा हमने सालों से काटी है। समाधान का ‘ब्लू-प्रिंट’ प्रबुद्ध वर्ग से ही आना है- अपनी विवशता और बेचारगी से बाहर निकल अच्छे विद्यार्थी एवं निर्लिप्त प्राध्यापक जिस दिन परस्पर सिर जोड़ कर बैठ जायेंगे स्थितियां बदलने लगेंगी।
आमीन।


























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