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त्तराखंड की अंतराष्ट्रीय सीमा सुरक्षित नहीं रही है। हिमालय के दर्रों, ग्लेशियर मार्गों समेत सामरिक क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सैटेलाइट फोन के जरिए सीधे विदेशों को भेजी जा रही हैं। उत्तराखंड सरकार इस मामले में अनभिज्ञ है। अमेरिकी संस्था ‘नेशनल आउटडोर लीडरशिप स्कूल’ (नोल्स) 20 वर्षों से भारत में कार्यरत है। 1989 में कृष्णन कुट्टी को संस्था ने भारत में डायरेक्टर बना कर बैंगलौर में अपना ठिकाना बनाया। 2000 में संस्था ने रानीखेत के वानिया काटेज, पोस्ट बाक्स नं. 10 के पते पर अपना कार्यालय बनाया। वर्तमान में इसके डायरेक्टर रवि कुमार हैं। संस्था वर्ष भर में चार से छः बार विदेशी दलों के लिये माउंटेनियरिंग कोर्स चलाती है। एक ग्रुप में लगभग 30 सदस्य होते हैं। 40 दिन तक चलने वाले इस प्रशिक्षण में प्रशिक्षु 28 दिन हिमालय क्षेत्र में गुजारते हैं। रानीखेत से बागेश्वर, सौंग, धाकुड़ी, खाती होते हुए दल बेस कैम्प पिंडारी ग्लेशियर पहुँचता है। यहाँ से दल दो भागों में बँट कर एक दल ट्रेल दर्रे को पार कर मिलम पहुँचता है। दूसरा कुपियाधौड़ के रास्ते लामचीर चोटी के कैम्प दो से होते हुए चोटी के पीछे निकल जाता है। यहाँ से दल पिथौरागढ़ जिले की सीमा में प्रवेश कर मार्तोली गाँव निकलता है। इस बात की आशंका है कि ग्रुप में शामिल कुछ सदस्य आधुनिक सैटेलाइट फोन से फोटो व वीडियो के जरिये इनर लाइन के भीतर की सूचनाएँ विदेशों को भेजते हैं। अपने अत्याधुनिक कैमरों से सीमाओं की फोटोग्राफी कर बाद में वे उन्हें विदेशों में बेचते भी हैं। प्रशिक्षण में लाइजनिंग ऑफीसर के न होने की वजह से इस सबकी खबर नोल्स के अधिकारियों को या तो लग नहीं पाती या फिर व्यवसाय को ध्यान में रखते हुए वे चुप्पी साध लेते हैं।
नोल्स के कोर्सों में विदेशियों की ही संख्या ज्यादा रहती है। प्रति विदेशी सदस्य एक लाख से लेकर साढ़े तीन लाख रुपये तक की फीस है। इस प्रशिक्षण को केन्द्र व उत्तराखंड सरकार द्वारा हल्के तौर पर लिये जाने का फायदा कुछ प्रशिक्षु उठाते हैं। बाहरी देशों के जासूसों के सम्पर्क में आकर वे उन्हें इनर लाइन के भीतर की सामरिक महत्व की जानकारियाँ आसानी से मुहैया करा सकते हैं। पिंडारी ग्लेशियर से ट्रेल दर्रे को पार करते वक्त इनर लाइन के भीतर नंदादेवी रेंज से ये दल गुजरता है। इसी तरह इन विदेशियों को चमोली जिले में रूपकुंड से कुँवारी पास होते हुए जोशीमठ के शीर्ष में तपोवन व पिथौरागढ़ जिले में तिब्बत की सीमा पर व्याँस घाटी में नाभीढांग, छोटा कैलाश व सिलना दर्रा में भी चहलकदमी करने का मौका मिलता है। सूत्रों के मुताबिक पूर्व में नोल्स के इन कोर्सों में शामिल अमेरिका, चीन, पाकिस्तान, कनाडा सहित कई देशों के नागरिक इनर लाईन की पूर्ण जानकारी जुटा चुके हैं। इधर भारतीय पर्वतारोहण संस्थान (आई.एम.एफ.) के सूत्रों का कहना है कि इस संस्था द्वारा अपनी गतिविधियों के लिए कोई औपचारिक अनुमति नहीं ली जाती। आई.एम.एफ. के निदेशक कर्नल रवीन्द्र कुमार का कहना है कि ट्रैकिंग के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं है। हाल ही में नोल्स का 17 सदस्यीय अमेरिकी दल 6000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित दानधूरा पास तक जाकर वापस लौटा है। जबकि आईएमएफ के ही हरीश ममगई का कहना है कि भारत में 6000 मीटर का कोई भी ट्रैकिंग का कोई दर्रा नहीं है। पर्वतारोही सुमित आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कैसे एक विदेशी संस्था भारत सरकार को रॉयल्टी दिए बिना व्यवसायिक गतिविधियाँ चला रही है। उत्तराखंड सरकार की जानकारी के बगैर ‘नोल्स’ संस्था द्वारा विदेशियों को सीमान्त क्षेत्र में कोर्स कराना कई सवाल खड़े कर रहा है।
स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर आर.सी.एस. बनकोटी की सक्रियता के चलते नोल्स के दो सैटेलाइट फोन फरवरी 2010 में उनके रानीखेत स्थित कार्यालय से बरामद हुए। संस्था के दो लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन ऊँची पहुँच के चलते मात्र आठ घंटे में ही उनकी जमानत हो गई। मामला अभी चल रहा है। नोल्स के साथ अठारह वर्षों तक काम कर चुके गाईड मगराम का कहना है कि नोल्स के पास छः सैटेलाइट फोन हैं। उन्होंने बताया कि ‘नोल्स’ के भारत में डायरेक्टर कृष्णन कुटटी से उनकी मुलाकात 1989 में भराड़ी में तब हुई थी, जब पाँच लोगों का दल पिंडारी रेंज में पँवालीद्वार चोटी पर आरोहण के लिए जा रहा था। 1991 से बैंगलौर से दल आने शुरू हुए। तब तक ये लोग बल्जूरी व लामचीर की चोटियों में क्लाइम्बिंग किया करते थे और उनके साथ आई.एम.एफ. का लाइजनिंग ऑफिसर होता था। यह क्रम 5 वर्ष तक चला। बाद में इन्होंने आई.एम.एफ. से यह कह कर पल्ला छुड़ा लिया कि अब हमारा दल इस क्षेत्र में सिर्फ ट्रैकिंग ही करेगा। इसके बावजूद संस्था माउंटेनियरिंग कोर्स जारी रखे हुए है। इस तरह आईएमएफ को गलत सूचना देकर संस्था मोटी फीस देने से बच जाती है। ‘हिमालियन माउंटेनियर्स’ बागेश्वर के अध्यक्ष भुवन चौबे का कहना है कि जब नोल्स कोफलाज, क्रम्पोन, आईस एक्स, गैटर आदि उपकरणों का पूरा उपयोग करती है तो इस गतिविधि को ट्रैकिंग कैसे कह सकते हैं ? आईएमएफ ने इस मामले में चुप्पी क्यों साध रखी है ? वह बिना लाईजनिंग आफिसर के दल को सीमान्त क्षेत्र में जाने क्यों दे रहा है ? सूत्र यह भी बतलाते हैं कि आपात्काल की स्थिति में दल के सदस्य सैटेलाईट फोन के द्वारा रानीखेत या अमेरिका को सूचना दे प्राईवेट हैलिकॉप्टर मँगा लेते हैं। लेकिन उच्च हिमालयी क्षेत्र में उड़ान भरने वाले इन हैलिकॉप्टरों के बारे में स्थानीय प्रशासन के पास कोई जानकारी नहीं है।