केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करने वाली सांसदों की राजभाषा समिति का काम महज तीर्थाटन, पर्यटन और घुमक्कड़ी रह गया है। यह समिति सरकारी स्तर पर हिन्दी के प्रचलन और प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए बनाई गयी थी, ताकि हिन्दी सही अर्थों में देश की राजभाषा बन सके। इस समिति में सभी दलों के सांसद शामिल रहते हैं। समिति विभिन्न राज्यों में केन्द्र सरकार के प्रतिष्ठानों और संस्थानों का निरीक्षण कर यह देखती है कि उनमें हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए साल भर के अन्दर क्या-क्या कार्य किए गए हैं, जैसे प्रेस विज्ञप्तियाँ हिन्दी में जारी करना, हिन्दी की पुस्तकें खरीदना, हिन्दी में पत्र व्यवहार करना आदि। इन कार्यों से हिन्दी को कितना बढ़ावा मिला, इसका आंकलन किया जाता है।
राजभाषा समिति धरातल पर कितना काम कर पाती है, यह तो देश मे हिन्दी की स्थिति देखकर स्पष्ट है। अब तो यह सैर-सपाटे और तीर्थाटन का माध्यम बन कर रह गयी है। उत्तराखण्ड मे, विशेषकर देहरादून में, केन्द्र सरकार के अनेक संस्थान ओ.एन.जी.सी., आई.आई.पी., एफ.आर.आई.डील, भारतीय वन्य जीव संस्थान हैं। नेहरू युवा केन्द्र की अनेक शाखाएँ भी उत्तराखण्ड में हैं। समिति को उत्तराखण्ड मे हिन्दी की प्रगति के आंकलन की याद तब ही आती है, जब राजधानी दिल्ली सूरज की किरणों से तप रही होती है। गर्मी न हो तो राजभाषा समिति को उत्तराखण्ड की कभी याद ही न आये। तब यह समिति आपसी सहमति से तय करती है कि इस बार उत्तराखण्ड मे कहाँ-कहाँ जाना है और कितने दिन के लिए जाना है। यह दौरा कम से कम एक हफ्ते का होता है। कार्यक्रम इस तरह बनाया जाता है कि खानापूर्ति के लिए कुछ संस्थानों का निरीक्षण भी हो जाये और पर्यटक स्थलों व तीर्थ स्थलों का भी भ्रमण हो जाये।
इस बार सांसदों की राजभाषा समिति 8-9 जून से 15 जून तक देहरादून, पौड़ी और चमोली जिलों के दौरे पर आ रही है। समिति में इस बार अल्मोड़ा के सांसद प्रदीप टम्टा सहित 11 सांसद हैं। देहरादून मे जिन भी संस्थानों मे समिति निरीक्षण करेगी, वहाँ आने-जाने के लिए ओ.एन.जी.सी. द्वारा वातानुकूलित कारों की व्यवस्था की जाएगी। पौड़ी और चमोली के दौरे के लिए भी सांसद इन्हीं कारों मे सफर करेंगे। चमोली दौरे के समय सांसदों का केदारनाथ व बदरीनाथ के दर्शनों का भी कार्यक्रम है, जहाँ के दर्शन ये सांसद हेलीकॉप्टर से करेंगे।
दरअसल राजभाषा समिति को बनाने का उद्देश्य गैर हिन्दी भाषी राज्यों मे हिन्दी को बढ़ावा देने व गैर हिन्दी भाषी अधिकारियों व कर्मचारियों को हिन्दी मे काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना था। लेकिन इस दिशा में समिति ने शायद ही कभी कोई प्रयास किए हों। हर दौरे के बाद समिति एक रिपोर्ट तैयार करती है। मगर यह रिपोर्ट लिखी भी जाती है या नहीं, और लिखी जाती है तो उन पर क्या कार्यवाही होती है यह कोई नहीं जानता। न आज तक उन रिपोर्टो पर कोई कार्यवाही हुई है। एक दौरे पर दस लाख से लेकर बीस लाख रुपए का खर्च आता है।