एक बार फिर होलियाँ सामने हैं। सामाजिक सद्भाव का यह एक विलक्षण पर्व है, जिसमें हास्य होता है, लेकिन कटुता नहीं होती। व्यंग्य होता है, मगर उससे कोई रंजिश नहीं जनमती। अश्लीलता होती है, लेकिन वह सहज भाव से स्वीकार कर ली जाती है। काश, होली से इतर भी हमारे समाज में ऐसी सहिष्णुता, इतनी उदात्तता हो पाती !
असहिष्णुता आज का युगधर्म हो गया है। जो हिन्दू धर्म इतना विराट था कि उसमें सनातनियों और मूर्तिपूजकों के साथ निराकार ईश्वर को मानने वाले ही नहीं, बल्कि घनघोर नास्तिक तक मजे से रह लेते थे, वह ‘हिन्दुत्व’ के नाम पर एक कृत्रिम आचार संहिता में जकड़ा जा रहा है। विशाल हाथी को छोटे से चूहे में बदला जा रहा हो जैसे ! इससे भी आगे चल कर, इस धर्म को दूसरे धर्मों को चिढ़ाने और उकसाने के हथियार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है, ताकि उनके कठमुल्ला अनुयायी पलटवार कर देश को आतंकवाद की आग में झोंक दें। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि यह पतित विचार धर्म तक भी सीमित नहीं रहा है, बल्कि राजनीति, जो आज की सबसे बड़ी शक्ति है को भी नियंत्रित कर रहा है। सत्ता निरंकुश तो होती ही है। भारत में वह अनेकानेक कारणों से और अधिक दमनकारी भी है। सिर्फ तिरसठ साल पहले विदेशी शासन से मुक्त हुए देश के मौजूदा कर्णधार देश को नई तरह की कॉरपोरेट गुलामी में धकेलने में व्यस्त हैं और इस प्रक्रिया में आड़े आने वाले लोगों का आँख मूँद कर दमन कर रहे हैं। उन्हें उनकी बात सुनने तक का धीरज नहीं है। इससे भी गंभीर बात यह है कि जो विचारधारा मनुष्य को आर्थिक रूप से मुक्त करने का दावा करती है, वह भी उतने ही हिंसक और दमनकारी रूप में प्रकट हो रही है। सहिष्णुता आज के समाज से पूरी तरह नदारद है।
इस होली पर हम सोचें कि कैसे संस्कृति के इस विलक्षण पर्व को समाज को ज्यादा सहनशील बनाने के लिये उपयोग में ला सकते हैं।
























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