हमारे यहाँ कौन होली किस दिन गानी है, इस तरह का चुनाव परम्परा-परिपाटी से ही देखने में आता है। देशाचार के अनुसार दशमी बेध एकादशी को देवी-देवताओं की होलियाँ होती हैं। आँवला एकादशी और द्वादशी को भगवान की बाल-लीलाओं, विनय और स्तुतियों की होलियाँ सुनने को मिलती हैं। त्रयोदशी से रस की होलियों के साथ-साथ प्रौढ़ व धार्मिक होलियों के खाते खुलते हैं। प्रौढ़ होलियाँ श्रृंगार की भी हैं और दार्शनिक स्पर्श की भी। श्रृंगारिक होलियों में जनानियों को खूबसूरती, बनाव-हनाव, आरसी-बिंदुली, ठसक-ठाण, जोबन-जवानी और दिल में मचती फागुनी फरफराटों की अकुण्ठ अभिव्यक्ति की झलक मिलती है। हमने बचपन में बूढ़े बड़बाज्युओं को बौराते देखा है। उन दिनों न तो शराब की भट्टियाँ थीं, न दुकानें। ठेकेदारी संस्कृति के बीज नहीं पड़े थे पहाड़ों में। किसी को यदि ‘तू भ्रष्ट है‘ कह दिया तो वह मारपीट पर उतारू हो जाता था। शब्द का ही इतना असर हो जाता था, कहाँ तो जानहार का। उन दिनों यह प्रदेश सचमुच की ‘देवभूमि‘ था। आज तो वह ‘विज्ञापन‘ है। विज्ञापन अब सच कहाँ होते हैं ?
श्रृंगारिक होलियों की देखा-सुनी से ही हमने भाभियों को ‘तुम बहुत अच्छी हो‘ कहना सीखा था। वे भी कहती थीं, ‘तुम अच्छे हो‘ और इसी अच्छा-अच्छी में ओरे-दोरे भी हो जाते तो जेठबाज्यू-काका लोग गुस्सा नहीं होते थे। हाँ, छरड़ी की रोज भाभी सहित ‘आज बठे कूंला त मुख में मुट्ठी हाणिया‘ समझा दिया जाता था। जरूर यह व्याख्या न हमें अच्छी लगती थी, न भाभियों को परन्तु अगले वर्ष तक की होलियों तक हम छेड़खानियों को स्थगित करके स्कूलों को चले जाते और वे घास-पात, खेती-पाती में लगती थीं।
श्रृंगारी होलियाँ प्रायः दिन में ही गाई जाती हैं। रातों में धर्म और दर्शन के लटकों की होलियाँ होती हैं। ऐसी होलियों को ‘विष्णुपदी‘ होलियाँ कहते हैं। प्रौढ़ विष्णुपदियों में हमारे आसपास के प्रति ही नहीं, अपितु निश्चल सृष्टि के प्रति भी असाधारण और अद्भुत इशारे हैं। ऐसे इशारे जैसे अबोध-तोतली भाषा में निश्छल बच्चा करता है। वे इशारे लोक मानस रूपी अगाध समुद्र की लहरों से उठते हैं। लहराते हुए जीवन की धरती के तट तक आते हैं और उसे छूकर वापस लौट जाते हैं। भीषण द्वन्द्वों से भरी हुई हमारी दुनियाँ को जितनी सरल-तरल रेखाओं द्वारा बने चित्रों द्वारा ये विष्णुपदियाँ चित्रित करती हैं, विश्वविख्यात चित्रकार भी नहीं कर सकते।
इन विष्णुपदियों में सीता-राम, चित्रगुप्त और पाण्डवों जैसे चरित्र भी गुँथे हुए हैं, सूरज-चन्द्रमा, गंगा-यमुना व धरती और आकाश जैसे धरती के अचेतन पदार्थ भी। कमाल यह कि लोक संवेदना इन्हें भी हमारी ही तरह रात-दिन के पचड़ों से लस्त-पस्त, थका-हारा और विराम-विश्राम के लिये आतुर समझती है। वहाँ सचेत-अचेत सभी द्वन्द्वों में घिरते-तिरते दिखते हैं। द्विविधा ने अखण्ड-अनादि जीवन को ऐसे घेरा हुआ है, जैसे जाड़ों के कुहासे से सड़कें घिरती हैं।
विपद पड़ी अति चंद्र सुरीज को
कैसे तपै दिन रात लछिमन धीर चलो।
विपद पड़ी अति गंग-जमुन को
कैसे बहैं दिन रात लछिमन धीर चलो।
विपद पड़ी अति चित्रगुप्त को
कैसे लिखै दिन रात लछिमन धीर चलो।
विपद पड़ी अति पंच पाण्डव को
गुपुत भयो वनवास लछिमन धीर चलो।