माधुर्य, प्रेम और सौन्दर्य का पर्व होली मानव और मानवेतर प्रकृति में बदलाव का नूतन संदेश लेकर आता है। वृक्षों, लताओं, बेलों में नव पल्लव, कोपलें, पुष्प और उन पर मँडराते भ्रमरों-तितलियों के झुण्ड प्रकृति को संगीतमय बना देते हैं। नीरस पतझड़ और काटने वाली वायु के झोंकों के स्थान पर प्रकृति का नव पल्लवों से लद जाना, सुखद मन्द पवन का बहने लगना सभी कुछ अपनी माधुरी के मोहपाश में मनुष्य को जकड़ लेता है। प्रकृति और मनुष्य का यह साहचर्य प्रारम्भ से अब तक ज्यों का त्यों है। आज की भव्य अट्टालिकायें, साफ-सुथरी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें, उन पर दौड़ने वाले चमकीले वाहनों की कतार भी प्रकृति के उस सहज सौन्दर्य से होड़ लेने में पिछड़ जाती हैं। मनुष्य के कल्पनाशील मस्तिष्क में उठने वाली भावनाओं की तरंगें ‘होली’, जो मधु मास में होती है, में मादकता से भर जाया करती हैं। आदिम युग के हमारे पूर्वज मानव के लिए यह नवल बसन्त का आगमन प्रजनन के पर्व ‘मदन महोत्सव’ के रूप में सबसे पहले अस्तित्व में आया। इसके संकेत हमारे प्राचीन साहित्यिक स्रोतों में मिलते हैं। आदिम समाज में जब मातृदेवियों की सत्ता थी, वे अपने एकान्त वन निकुंजों में रहा करती थीं, जहाँ पुरुषों का प्रवेश निषिद्ध था। ऋतु परिवर्तन से उपजी मादकता से जब वे अपने को सम्भाल नहीं पाती थीं, तो पुरुष समाज को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए भाँति-भाँति की चेष्टाओं और मुद्राओं का प्रदर्शन करती थीं। इससे समाज रचना के लिए प्रजनन की शाश्वत परम्परा का जन्म हुआ। माधुर्य पूर्ण आकर्षण के मोहपाश में बँधकर दोनों का अद्भुत संगम का अवसर होली पर्व याद दिलाता है।
‘होली’ मनुष्य के आदिमयुगीन जीवन से जुड़कर सहस्रों धाराओं में कालान्तर में प्रस्फुटित होती गयी। सौन्दर्य, प्रेम और माधुर्य का यह आदिम सांस्कृतिक पर्व विभिन्न प्रकार की गाथाओं, कथाओं, विचारों, धारणाओं की भी रंगस्थली बनता गया। उनको अलग-अलग समझ पाना अब केवल अकादमिक बहस का विषय हो सकता है। वैसे वे एक-दूसरे के रंग में इतने रंग गये हैं कि उनकी अलग पहचान समाप्त हो गई है। इसलिए इसका एक निश्चित कारण बता पाना असम्भव हो गया है। इसकी उर्वर पृष्ठभूमि में सांस्कृतिकता के साथ-साथ धार्मिकता के समावेश का एक कारण यह भी है। हिन्दी के कृष्णभक्त कवियों ने भक्ति में जिस माधुर्य भाव की प्रतिष्ठा की है उसका भारी प्रभाव होली पर पड़ा है। यहाँ भक्ति रस की धारा कृष्ण भक्ति के उज्ज्वल आदर्श ‘परकीया प्रेम’ से प्रेरित है। परकीय प्रेम की अभिव्यक्ति और उसके विभिन्न अवसरों पर चित्रण की परम्परा ने भी होली में रंग घोला है। होली के रसिया परकीया प्रेम के निःस्वार्थ और निधड़क प्रेम मार्ग में चल पड़ने वाली गोपिकाओं की भावनाओं के प्रवाह में बह निकलते हैं। भक्ति और श्रृंगार की यह धारा मानव को भावविह्वल कर डालती है। इसका लोक पक्ष उसे अपने आदिम पूर्वज से मिला है।
होली के सामाजिक पक्ष पर कम सोचा गया है। होली का घनिष्ठ सम्बन्ध मनुष्य के यौनजनित उद्गारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है। यह आदिम मानव की प्रजनन की इच्छा की अभिव्यक्ति की चिरन्तर आकांक्षा है। मनुष्य के बन्धनों में समाज के विकास से उत्तरोत्तर कसावट आती गई। उसकी आदिम प्रवृत्तियों पर रोक लगाना समाज को अनुशासित और विकसित करने के लिए आवश्यक था। उसके विपरीत लिंगी सम्बन्धों और व्यापारों को परिभाषित कर दिया गया, जो समाज के संगठन के स्थायित्व के लिए आवश्यक था। इसके परिणाम ज्यादातर अच्छे निकले, किन्तु इनके चलते मानव की भावनाओं की स्वच्छन्द अभिव्यक्ति पर रोक लग गई। परिवार की सीमा में यौन भावनाओं के सहज प्रकटीकरण में यह असहज अंकुश मनुष्य को खलने लगा। जीवन में घुटन और एकरसता को कैसे तोड़ा जाये, जीवन की नीरसता को सरस कैसे किया जाय, इसका समाधान होली में ढूँढा गया। सीमाओं को तोड़कर खुली हवा में साँस लेने के लिए होली का पर्व अस्तित्व में आया।
समाज में सभी प्रकार के सम्बन्ध हैं। उनमें देवर-भाभी, साली-साला-जीजा के सम्बन्ध ऐसे हैं, जिनके सामने अपने भीतर की घुटन (भड़ाँस) निकालने की सुविधा है। देवर द्वितीय ‘वर’ (पति) भी माना जाता है। साली-साला-जीजा में भी कुछ ऐसा ही रेशमी धागे से बँधा सम्बन्ध है, जिनके सामने संकोच और झिझक कम रहती है। इसलिए अपने भीतर के प्रेम और सौन्दर्य से ओतप्रोत सौन्दर्य श्रृंगारिक उद्गारों को व्यक्त करने की सामाजिक स्वीकृति है। यह स्वीकृति उद्गारों को व्यक्त करने तक ही सीमित है। वहीं तक, जहाँ तक हास-परिहास, हल्की छेड़-छाड़, थोड़ी-सी धक्कामुक्की या हाथापाई, जितने से मनोगत बोझ हल्का हो सके। इन सबकी सीमा है। क्योंकि भाभी देवर के लिए पूजनीया भी है। भाभी के हृदय में देवर के लिए पुत्रवत् भाव भी रहता है। अतः इन भावनाओं को भी ठेस लगने से बचाने का ध्यान रखा जाता है। इस संवेदनशीलता से यह हास-परिहास, छेड़छाड़ को होली में कोई अधिक गम्भीरता से नहीं लेता। परोक्ष रूप से यह रसीलापन साल में एक बार होने पर भी पूरे साल के लिए रंगों की बरसात कर देता है।
होली में कुछ दिनों या कहीं कुछ घण्टों के लिए सामाजिक मर्यादा की सीमाएँ या तो ढीली पड़ जाती हैं या टूट जाती हैं। बड़े-बूढ़े, बच्चे-युवा सामाजिक स्तर पर छोटे-बड़े सभी आबाल-वृद्ध एक-दूसरे के कपोलों पर रंग चुपड़ते हैं, कपड़ों में रंग डालते हैं। साधारणतया जिनसे हम सालभर बड़े अदब से पेश आते हैं, डरे-डरे से रहते हैं, होली आने पर यह कड़ाई पिघल जाती है। इसे बुरा नहीं माना जाता। एक स्वस्थ शरीर के लिए जिस प्रकार उन्मुक्त प्रदूषणरहित वातावरण आवश्यक होता है, उसी प्रकार भावनाओं की खुलकर अभिव्यक्ति का अवसर भी भीतर की घुटन (मैल) को बाहर निकालकर हल्का अनुभव करती है। इससे पारस्परिक विश्वास बढ़ता है। डर, झिझक और संकोच के स्थान पर खुलकर अपनी बात कहने की हिम्मत बढ़ती है। जिनके पैरों पर ही हमेशा हमारी नजर रहती है, साल भर में एक ऐसा भी अवसर आता है जब वे आप अपना माथा झुकाकर रंग का टीका लगवाते हैं। अपनी बात रखने की हिम्मत बढ़ने से बढ़कर अपने भीतर आत्मविश्वास की भावना जगती जाती है।
होली में रूप-कुरूप, अवस्था, आर्थिक बड़प्पन में किसी को महत्व नहीं दिया जाता। भाभी बुढ़िया हो या कुरूप, उससे बढ़कर कोई नहीं लगता है। इसी प्रकार जिससे हम रंगभरी होली खेलते हैं, उनके व्यक्तित्व में इतना घुस जाते हैं कि वे हमें अपने से भिन्न नहीं लगते हैं। भाभियाँ ‘रंङिलो चंङिलो देवर घर ऐ रौछ’ यही कामना प्रतिवर्ष करती रहती हैं। होली के अवसर पर वह भी भाभी के लिए नये जेवर, कपड़े लेकर आता है। इसी प्रकार अन्य सामाजिक सम्बन्धों में भी आदान-प्रदान से खुशियाँ बाँटते हैं। जिनके साथ होली खेली जाती है, होली के बाद उनसे मिलकर उनको मिठाई या अन्य उपहार देने की पुरानी परम्परा है। गुझिया खिलाना तो अब शुरू हुआ है। होली ही एक ऐसा अवसर है जब पिछले साल का मनमुटाव, मतभेद गले मिलकर लोग भुला देते हैं और एक नये बेहतर साल की कामना करते हैं। होली के अगले दिन गाँव के देवता के प्रांगण में सबके घर से आटा, दूध, घी, तेल, गुड़, नमक इत्यादि से पूड़ी-पकवान का सामूहिक भोज होता है। अब इन सामूहिक भोजों का स्थान घर की चहारदीवारी में सिमट गया है। पहले यह त्यौहार से बढ़कर उत्सव या समारोह था, जिसमें सबकी मिलजुलकर भागीदारी रहती थी। लोग गाँव की चौपाल, गाँव की सामूहिक अधिकार की सार्वजनिक भूमि, मुखिया के आँगन में जुटते थे। अब यह त्यौहार अधिक हो चुका है, जिसका दायरा अपना घर हो जाता है। लोग घरों में गुझिया परोसकर होलियारों की प्रतीक्षा करते हैं। आज के होली मिलन के समारोहों में दबदबे वाले लोगों की उपस्थिति में वह स्वच्छन्दता और बराबरी नहीं दिखाई पड़ती है। ![]()
होलियों के अवसर पर अब पहले जैसा प्रेम सौहार्द और उत्साह देखने को नहीं मिलता है। यह विशुद्ध रूप से सामाजिक सरोकार वाला उत्सव था। अब उसका स्थान असामाजिकता ने ले लिया है। अब लोग अपने घर की दीवारों से बाहर नहीं निकलना चाहते। बाहर निकलने पर डर लगता है। असामाजिक तत्वों ने अपनी विकृतियों के फैलाव का माध्यम इसे चुन लिया है। वे यह भूल जाते हैं कि होली में स्वच्छन्दता या खुलेपन की मान्यता वहीं तक है, जहाँ वह सम्बन्धों को मधुर बनाते रहें। कटुता और वैमनस्य प्रदर्शन उसकी छवि को कलंकित करता है। इस बात का ध्यान रखे बिना कि यह पर्व अपने आदिम स्वरूप को बदलकर सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं एवं विधि-विधानों के ढलने के बाद जिन मर्यादाओं और सीमाओं में असुविधा महसूस कर रहा था, उनको दूर करने का एक सहज सर्वजन सुलभ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आधार पा गया था।
बन्धनों से कुछ समय के लिए मुक्ति भी इस सीमित स्वतंत्रता की स्वीकृति समाज के नियम-नियंत्रकों ने भी दी थी। अतः उस सीमा का अतिक्रमण नहीं होना चाहिए। होली में अधिक ओछेपन या अश्लीलता को बढ़ावा देकर इस पर्व को विकृति की ओर धकेलना सामाजिक दृष्टि से अपराध है। हमारे सभी सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व एक नयी विकृति की ओर अग्रसर होने लगे हैं, जो जुलूस या सार्वजनिक प्रदर्शन में बाजी मार लेना अपना कर्तव्य समझते हैं। दीवाली में जुआ खेलना, आतिशबाजी में फिजूलखर्ची, अनेक अवसरों पर शोर-शराबा, दिखावा, भौण्डे-प्रदर्शनों ने सामान्य व्यक्तियों की सामाजिक स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया है। अन्यथा यह पर्व प्रत्येक व्यक्ति के सामाजिक अस्तित्व को समानता प्रदान करने वाले होते हैं। किन्तु जब इनका धन, जन की शक्ति के प्रदर्शन में रूपान्तरण कर दिया जाता है, ये आम जन की अवहेलना करने वाले साबित होते हैं। इनसे केवल साधनसम्पन्न लोग ही लाभान्वित होते हैं। सामान्यजन की नींद हराम करने वाले ये दिखाऊ त्यौहार अपने मौलिक रूप से दूर हटते जाते हैं। सामान्य व्यक्ति को नगण्य मानकर उसे अहमियत न देना सामाजिक मूल्यों पर ग्रहण लगने की भाँति है, जहाँ कुछ तो मजे में रहते हैं, बाकी डरे से रहते हैं।