होली को कामकाका के अगियाये हुए जीवन का ‘इजर’ समझना चाहिये। पाँच दिनों में फाँणा, काटा, सुखाया और जलाया। इस ऊखड़ मल्याट में रतिकाकी को भी साथ रहना पड़ता है। जिस समय आग धमकी होती है उस समय वह हाथ में हाथ धरे तमाशा नहीं देखती। पानी-पन्यार, नदी-पनघट की सोचती है। आग और पानी के जैसे स्वभाव हैं काम और रति के। यह विरोधाभास है, कहने वाला अयाना होगा सयाना नहीं। बड़ा मेल है कामकाका और रतिकाकी का। उनकी दाह और ठंडाई का, मानसून-मौसम जैसा संघनन समझने के लिये होलियों के खेल में कम भाषा पाठ में ज्यादा रुचि रखनी पड़ती है। पानी, वहाँ किसी व्यक्ति के प्राणों का वाचक मात्र नहीं है। वह सनातन जीवन के सातत्य, चिरन्तनत्व और गति की अभिव्यक्ति का उपमान बनकर आता है। पानी के सरोकार गुलाल, अबीर, कुंकुम और रंगों से बढ़कर हैं। होलियों के पाठों के प्रसंग, काम दग्धों के गाड़-गधेरों के पनघटों, नदियों के तटों, विशेषकर यमुना और कृष्ण राधा की ठिठोलियों, हाव-भाव, कुट्टुमित, हेला, संभ्रम, ललचाहट और खींचातानी के संदर्भों से जोड़ कर समझने चाहिये।
होली के एक बिंब में काम के बाणों से घायल हुआ एक नौजवान हाथ में पिचकारी लिये हुए पनघट के मार्ग में इधर-उधर डोल रहा है। उधर से आती हुई गोरी उससे भिड़ जाती है। वह पुलकी हुई है। रीझने को तैयार लगती है। इस तैयारी की बदौलत वह छैले पर काबू पा जाती है। वह कुछ ऐसी-वैसी हरकत पर उतारू हो, इससे पहले ही वह मुखातिब हो उठती है। कहती है बेझिझक होली कर लो आज। रास्ता रोके हुए हो। दोनों हाथों से गुलाल मलो मेरे। पिचकारी मारो न मेरे दिल पर। जो तुम्हारा मन हो सो करो, पर दो चीजें मत करना। एक घूँघट न हटाना। दूसरा मेरी आँखों में अबीर मत डाल देना। मैं देखूँगी कैसे ? गोरी की पहल में रति है। रति यानी प्रेम। वह छैले के काम यानी सैक्स को रूपान्तरित करता है। आग को पानी ने बुझा दिया। यदि न करती तो पता नहीं क्या कर डालता वह।
गोरी के घूँघट हटाने की मनाही में हया और मर्यादा है। आँख बचाने की मनुहार में एहतियात है। दोनों बचे रहेंगे, तभी तो होली की मौज है।
एक दूसरे बिंब में हुड़दंग की तैयारी है। बीती रात होली जल चुकी है। छरड़ी की सुबह है। घर में पानी की बूँद नहीं। गोरी, झुरमुटे में ही उठकर घड़ा लिये पनघट को चली गयी। वह चटपट पानी भरकर लौट आना चाहती है। तनिक भी अबेर न होने पाये, इसलिये गँवई-गुवई छोटी बाट पकड़ लेती हैं। उस बटिया में मीठी नीम और कुरी की झाडि़याँ फूली हुई हैं। चलमोड़ी और पुनर्नवा के तृणमूलों पर बुंदकों जैसे उगे हुए नन्हें-नन्हें फूल पैर के बिछुओं में उलझ रहे हैं। शंखपुष्पी और भ्रंगराज के गुप्फों पर टिकी हुई ओस की बूँदें कदमों में झड़ती हैं और बटिया की गर्द से सनकर पैरों के तलुओं पर चिपकती हैं। फागुनी बयार के साथ मेह की फुहार झड़ी है तो होली का आँगन कीच-कीच हो गया है। अल्ल सुबह ही है, फिर भी वहाँ मनचले इकट्ठे होने लगे हैं। देखते ही दौड़ पड़ते हैं गोरी-पनिहारिन बेचारी के पीछे। वह लपक कर घर में घुसती है और दरवाजे उड़का कर भीतर से आगला डाल देती है। रति की आश्रय तो यह गोरी भी है, परंतु कामजलों से बचने की सावधानी उसे बचा लेती है।
परन्तु होली के हर ‘पाठ’ में ऐसा नहीं होता। देवर लोग, छैले, बरजोरिये, मनचले, रसिये और कन्हाई ‘गोरियों’ को ताके रहते हैं। शरीफ आदमी वहाँ दुर्लभ हैं जितनी सांवली, कलस्वरवी, गेहुईं और लाटी कालियाँ।
होलियों में आये एक कामकाका के सभी भतीजे नादान दिखते हैं पर हैं वे एक लंपट। उनके फगवे उपहार बाजार में ढूँढने लगे तो पूरा फागुन बीत जायेगा। वे नवोढ़ा परस्त्रियों के लिये स्योनियों की डंडिया, माथे की बिंदिया, कंठ की हँसिया, आँखों का कजरा, नाक का बेसर, हाथ की चूडि़याँ…. क्या-क्या जो लेकर नहीं आते। पनघटों पर कमसिन-किशोरियाँ, टीन-एजर अयानियाँ, वयःसंधिनियाँ तो गुझिया, मिठाई और मिसरी गोला में ही रीझ जाती है। वे अबीर गुलाल लगाने के बहाने उनके दरस-परस से ही बाग-बाग ही नहीं होतीं, बाजी-बाजी तो छुई-मुई ही हो जाती हैं। गीत गोविन्द के रसियाओं को गोरे कपोल गोल मसलने को मिल जायें और बल्लरियाँ न डोलें, यह कैसे हो सकता है। इसलिये नवेली-ललनाओं, नवोढ़ा ध्याँणियों, दिलफेंक लौंडियों पर सयानियाँ होलियों भर नजर रखती हैं। कहती हैं, बरजती हैं- जमुना अकेली मत जइयो।
एक गोरी के साथ बरजोरियों ने पनघट में बदतमीजी कर दी। उसकी गागर छीनने की कोशिश की। उसने उँडेल देना चाहा उन्हीं पर। छीना झपटी में गागर फूट गयी। अबीर पोत दिया उसके मुँह पर। बाँह मरोड़ दी। आँखों से तीर भी चलाये। वे भी बेनिशाने नहीं। इशारा करते हुए कि उधर चलो। पनघट से जल भुन कर घर आई। माँ को बताया। माँ गई डंडा लेकर उस आवारा के मुहल्ले की तरफ। वह तो सुबह से ही फरार था। उसकी माँ से इसकी माँ की झड़प हो गयी। वह इसे झूठी ठहराये और इसकी लड़की को मनचली। लड़की, जैसा मुँह लिये पनघट से लौटी थी वैसा ही मुँह लिये माँ भी लौटी। बड़बड़ाती हुई आ रही थी कि ‘सत्यव्रती तो सिर्फ तू ही है और दूसरा है तो सिर्फ तेरा लौंडा।’ पाठ में यशोदा, कान्हा, नन्दलाला नाम न होते तो वह गुमनाम माता, लड़की का नाम छिपा कर अवश्य ही पुलिस थाने रिपोर्ट करने जाती। काम-कला-विलास का कौतुहल और हरि स्मरण के निमित्त बने ‘नामों’ ने सरस बना दिया होली के पाठ को।

मैं जमुना जल भरन चली थी की मारे तीर कमाना
बरजोरी मोरी गागर फोड़ी
अबीर उड़ा मुख साना
तेरों लौंडा बहुत खिंझावै
नैना देत निशाना
मेरो लला तो घर में नाही
बालक है नादाना
वो का जानै रति की बतियाँ
तू ही करती बहाना
तू सांची तेरो सुत सांचो
हम ही करत बहाना
बरजो यशोदा तुम कान्हा,
ऐसो मनमाना।