शंभु ने आज होली मचाई।
इत दल साज्यो शिव शंकर ने, उत दल गिरिजा लाई।
रंग गुलाल चलें दोउ दल में, शोभा ललित बनाई-सखी
छवि वरणि न जाई।
शंभु ने आज होरी मचाई
गिरिजा झपट चली सखियन ते शंकर सन्मुख आई।
भर पिचकारी दृगन में मारी मुख से लख मुसकाई।।
देख शिव रूप लुभाई शंभु ने आज।।2।।
शंभु ने धाय धरी गिरिजा को, भाग के जान न पाई।
मुख में पकरि गुलाल लगायो पीछे भंग लगाई।
तनिक हंस तारि बजाई-शंभु ने आज होली मचाई।।
वासुदेव स्वामी जुगल छवि सुन्दर को कवि कहै सुनाई।
देखत काम करोड़न लागे छवि लखि इन्द्र लजाई। ![]()
छटा अद्भुत बन आई, शंभु ने आज होली मचाई।
-कवि कृष्णदास
होली-काफी
पिचकारिन काहे को मारे
बेदर्दी रंग से अंग में चोट लगत
पिचकारिन काहे को मारे।।
हाल मेरा तुम जानत मोहन,
माल हजारी को भारी लागत।।
पिचकारी काहे..
होली-झिझौंटी
ऊंचे भवन परवत बस रहि
अन्त तेरा नहिं पाया है री
हरियल पीपल द्वारे बिराजे
लाल घ्वजा पहिराया है री…
.
जंगला काफी
कैसी रँग दी पिया ने मोरी चोली-सखी(री)
मैं तो लाज भरी ना बोली (सखी री)
चारु अंग मोरे रंग में भिगोये
करत अनोखी ठिठोली
बय्याँ पकर मोहे अंग लगावत-
कौन खेलै ऐसी होली। सखी-कैसी….
आओ सब मिलि होली खेलनूं
रागैद्वेष भुली रसिया।
होली हिल मिल खेलें आओ रसिया।
मणि ‘गौर्दा’ की लै ठठोली सुणला होली
मेरी सब गावौ रसिया।
बहार कसि कसि होई रैछन
फागुन में खिली कली रसिया।
आओ सब मिलि होली खेलनूं रागैद्वेष
भुली रसिया।
अलबेर सब चीज अकरी हैगेछ
दस आना गूड़ भेली रसिया।
ईश्वर लै सब नियमै बदलि दीं,
वर्षा न पाणी तली रसिया।
अब तो क्वे कैको हलिया नि रै, बामण
होला हली रसिया।
पास करी बेर घर बैठी छन, गुड़ लै न
लूणा डली रसिया।
रिमझिम बरसै मेह आँगनि कीच भरायो रे।।2।।
तोड़ो पत्ता ढाक कान्हा ने दधि खायो रे, रिमझिम…।
अहो नदनियाँ बैल चढ़ि पूरब को जायो रे, रिमझिम…।
ढूँढो पूरब देश जोगिया नहिं खोजि पायो रे, रिमझिम…।
अहो नदनियाँ बैल चढ़ि दक्षिण को जायो रे, रिमझिम…।
ढूँढो दक्षिण देश जोगिया नहिं खोजि पायो रे रिमझिम…।
अहो नदनियाँ बैल चढ़ि पश्चिम को जायो रे, रिमझिम…।
ढूँढो पश्चिम देश, जोगिया नहिं खोजि पायो रे, रिमझिम…।
ओहो नदनियाँ बैल चढ़ि उत्तर को जायो रे, रिमझिम…।
खोजो उत्तर देश, जोगिया नहिं खोजि पायो रे, रिमझिम…।
खोजो चारों देश जोगिया नहिं खोजि पायो रे, रिमझिम…।
दो पर्वत के बीच जोगिया धूनि रमायो रे, रिमझिम…।
करि अंचल की ओट जोगिया लुकायो छिपायो रे, रिमझिम…।
बाघम्बरिया खाल जोगिया तले बिछायो रे, रिमझिम….।
सरप छुटै दस बीस जोगिया भाजि घर आयो रे, रिमझिम…।
और नदी सब कीच गंगा निर्मल पायो रे, रिमझिम…।
भागीरथ को पूत जोगियापरसन आयो रे, रिमझिम…।
चुक चलमोड़ि को साग जोगिया मीठा बतायो रे, रिमझिम…।
देश
चलो री चलो सखी, होरी खेलन को तट यमुना की ओर।
अगर चन्दन को पलना बनो है रेशम लागी डोर
चढ़त आकाश लहर यमुना की (खेलत) झूलत नन्द किशोर।।चलोरी…।।
जंगला काफी
सुन पाई री आज कहीं होली की भनक
कहिं होरी की भनक कहिं मुरली की सनह
शीष घुमन लागो, देह कँपन लागी
छतिया करन लागी न्यारी धक धक।।सुन पाई…।।
होली ठाड़ी
तुम आवौ कन्हैया भीं उतरी।
बसन्त ऋतु अब आई गेछ होलि होली हमरी तुमरी।
भारत को रंग फुस्यरो भयो छ पिङलो सुनूं ग्वे जहाज भरी।
कागज रूपैं निकलको धातू काम चलूणा सूं याँ छ धरी।
माल बिदेशी याँ भरि देछ चाल स्वदेसी गेछ मरी।
दुःख गीत गैण में दाफा लागंछ हर घड़ि रूनूं डरि डरी।
वर्षा नि हूँनी अकालै पड़नी पुजनौ नि हांती पेट भरी।
ख्वार हुँ चिथड़ि नै आङ भिदड़ि नै तन की चीर सबै गे हरी।
जब तुम आला रंग रचाला तब हमरी बाजली डफरी।
होली को फगुवा दे आशीष – हो होलक रे।।
बरस दियाली बरसै फाग – हो होलक रे।।
आज का वसंत हो कैका घर ? हो होलक रे।।
आज का वसंत य अंक वाचनेर वालनौ घर – हो हो होलक रे।।






















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