गंगोलीहाट इलाके में होली के जानकार लोगों को महन्त कहा जाता है। ये महन्त गीत संगीत के विशेषज्ञ माने जाते हैं। ऐसे ही एक महन्त चहज गाँव के तारा दत्त भी हैं, जिन्हें लोक कलाकार कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पारीगाँव तोक में 1928 में जन्मे तारादत्त जी जन्म से ही दृष्टिहीन हैं। मगर सीखने की लालसा बचपन से थी। कोई स्वर यदि आप के कानों तक पहुँचते तो कंठाग्र याद हो जाते। पूरे गंगोलीहाट इलाके में आप झाड़-फूक में सिद्धहस्त माने जाते थे। लकवा से लेकर फोड़ी तक झाड़ने दूर-दराज के गाँवों तक जाना आप के लिए आम बात थी। चहज में लगने वाले पाण्डवों के 22 दिन के जागर गायन में भी आपकी प्रमुख भूमिका थी। वर्तमान में बुढापे के कारण असमर्थ होने पर आप अपने भतीजे उमाकान्त के घर बालावाला गाँव, देहरादून में रह रहे हैं।
तारा दत्त जी बताते हैं कि हर जगह होली की कुछ विशेषतायें होती हैं। गंगोलीहाट में होली की अनौपचारिक शुरूआत वसंत पंचमी से बैठकी होलियों से होती है। फागुन मास की एकादशी के दिन चीर बाँध कर होली की विधिवत शुरूआत की जाती है। गाँव के ही अन्दर से मेहल का एक सीधा पेड़ लाया जाता है। सारे गाँव के लोग आकर नये कपड़ों की कतरनें पेड़ पर बाँधते हैं फिर परम्परागत आंगन में उसे खड़ा किया जाता है। होली समाप्त होने तक उसकी सुरक्षा भी की जाती है, ताकि कोई दूसरा गाँव वाला उसे चुरा न ले जाय। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन चीर की ध्वजा चोरी हो कर गाँव से बाहर चली जायेगी तो होली भी उसी के साथ चली जायेगी। चीर बाँधने के साथ ही खड़ी होली प्रारम्भ हो जाती है:-
बाँधो कन्हैया चीर ……
दूसरे दिन सबसे पहले गाँव की धार में स्थित पाण्डव मंदिर में होली जाती है। यहाँ रंग लगाकर होली गाई जाती है:-
भज दशरथनन्दन जनक लली…..
दशरथ राजा के पुत्र भये हैं, जनक राजा की भई है लली।
भज दशरथनन्दन जनक लली…..
फिर होली देवी के मंदिर में जाती है। यहाँ भी होली गायन के साथ रंग अबीर डाला जाता है -
अम्बा के भवन विराजै हो …..
पैरि पिताम्बर कृष्ण जी आये ग्वाल बाल सब साथ हो।
अम्बा के भवन विराजै हो……
इसके बाद नजदीक के घरों में होली जाती है। हर घर में एक होली गायन अनिवार्य होता है। जिस घर में होल्यारों के जलपान की व्यवस्था होती है, वहाँ बैठकी होली बाजे वाली या महीन होली गायन होता है-
आवन कह गये अजहुँ न आये उधो श्याम मुरारी मोहन गिरधारी….
उधो श्याम मुरारी मोहन गिरधारी.
हमको जोग लिखो कपटी ने आप बने घर बारी मोहन गिरधारी……
हाँ हाँ मोहन गिरधारी…..
जा दिन खाते थे चोर के माखन वा दिन की सुधि क्यों बिसराई…..
हाँ हाँ मोहन गिरधारी….
गोकुल जाय बसे मथुरा में कुबजा प्राण पियारी मोहन गिरधारी……
हाँ हाँ मोहन गिरधारी…..
उधो कर्मन की गति न्यारी मोहन गिरधारी
हाँ हाँ मोहन गिरधारी….
महीन या बैठकी होली में एक तो समय ज्यादा लगता है व दूसरा होल्यार अच्छे गाने वाले व लौटाने वाले होने चाहिए। क्रम खराब होने से रंग में भंग हो जाता है।
दिन छिपने के बाद होली घरों में नहीं जाती। सभी होल्यारों को महन्त द्वारा रात को खाना खाने के बाद होली के खाल (परम्परागत आँगन) में बुलवाया जाता है। भीड़ के कारण कभी-कभी तो बैठने की जगह भी नहीं मिल पाती। रात भर होली गायन व कई प्रकार के स्वांग (हास्य अभिनय) किये जाते हैं। गायन के बीच कई लोग उठ कर नाचने लगते हैं।
फिर दूसरे दिन से होली तयशुदा जगहों पर ले जायी जाती है। लक्ष्य होता है कि छलड़ी तक पूरे गाँव के घरों को निपटा लिया जाय। पहले होली तीन गाँवों तक जाती थी। चहज, ड्यूल, निगल्टी के लगभग दो हजार परिवार होंगे। तब बहुत व्यस्तता रहती थी। अब एक दशक से सिर्फ चहज गाँव में ही होली जाती है। होल्यारों को आम तौर पर गुड़, सौंप, सुपारी, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, पपीता, आलू के गुटके, भंगोटा आदि खिलाया जाता है। अब लोग गुड़ की जगह पर मिठाई भी बाँटते हैं। फलों में अँगूर, नारंगी आदि भी बाँटते हैं। पुराने दिन याद करते हुए तारादत्त जी कहते हैं कि कुछ बड़े (खोली वाले घरों के) आँगनों में होली ऐसी जमती थी कि कभी-कभी होल्यार ये भी भूल जाते कि हमें और घरों में भी जाना है। पंक्तिबद्ध होल्यार, बिना किसी के हाथ पकड़े, पैरों की लय मिलाते हुए नचाते हाथों व पैरों को ढोल की थाप पर चलाते और गाते हुए खो जाते थे:-
ब्रज मंडल देश देखो रसिया…..
होली के लिए विशेष रूप से प्रवासी भी घर लौटते थे।
मोरे हाँ जैय्या नवल फागुन घर आ जैया..
खड़ी होली में ढोल का प्रयोग ज्यादा होता है। परम्परागत बाजकी ही ढोल वादन करता है। उसे हर परिवार चंदा देता है। ढोल के साथ दमाऊँ भी होता है, जिसे घर के आँगन पर पहुँचने व घर से जाते समय बजाया जाता है। बैठकी होली में ढोल को हाथ से थाप देकर बजाया जाता है। साथ में मिजरे, चिमटा, लोटा और सिक्कों का प्रयोग होता है। होली समापन के दिन परम्परागत आँगन से आशीष वचन दिये जाते हैं:-
आज को बसंत कहा के घर में जाय
होल होल्ला रे
आज को बसंत श्री ………के घर में जाय
होल होल्ला रे
इनकी परिवार सब जी रौ लाख सै बरी
होल होल्ला रे
बरस दिवाली बरसे फाग
होल होल्ला रे
इसप्रकार पूरे गाँव के परिवारों के मुखियाओं का नाम लिया जाता है। बच्चे बासिंग (बासा) के सफेद फूल इकट्ठा कर बरसाते हैं। इसके बाद होली के चंदे, पिछले वर्ष के खर्च आदि की जानकारी सार्वजनिक की जाती है। फिर होली गाई जाती है:-
होली खेलि खाली मथुरा को चले,
आज कन्हैया रंग भरें
रंग भरें रंग भरें रंग भरें आज कन्हैया रंग भरें ……..
इस दिन के समापन के साथ रात्रि में चीर लूटने की सूचना दी जाती है। सारा गाँव एकत्रित होता है। पहले चीर को नीचे उतार कर पूजन किया जाता है। फिर उसे पूरे आँगन में ढोल-दमाऊँ के साथ दंडुका देवी व ईष्ट देव के जैकारों के साथ कई चक्कर घुमाया जाता है। फिर उछाल कर आंगन के बीच फेंका जाता है। लोग बाँधी गई चीर को लूटने के लिये उस पर टूट पड़ते हैं। फिर लूटी गई चीर को एक बर्तन में एकत्र किया जाता है। पूजा के साथ कुछ कतरन जलाई भी जाती है। शेष सँभाल कर रखी जाती है। इसके बाद अन्त में गाई जाने वाली होली, जिसे विदाई की होली भी कहा जाता है, गाई जाती है। करुण स्वर में गायी जाने वाली इस होली को समझने वाले वयस्क व बच्चे अश्रुपूरित नेत्रों से घरों को लौट जाते हैं। सयाने कहते हैं कि इन्हें होली का निश्वास लगा है-
काँ देवी काँ तेरो थान, काँ देवि आई भवानी,
काँ देवी काँ तेरो थान
नंगारा कोट कि महामाय यो देवि,
कै न अघानी, नगारा कोट कि महामाय।
मारो महिसासूर यो देवि कै न अघानी, मारो महिसासूर।
मारो शुंभ निशुंभ यो देवि कै न अघानी,
नगार कोट कि महामाया।
यो देवि कै न अघानी…..
होली टीके के दिन गुड़ के प्रसाद के साथ हर परिवार को चीर दी जाती है। परिवार के सभी सदस्य चीर को अपने कपड़ों के बटन के काज में बाँधते हैं। होल्यारों को हलुवा बना कर खिलाने के साथ इस उत्सव का समापन होता है।
तारादत्त जी वर्तमान में होली में आ गई विकृतियों, सामाजिकता खत्म होने और जानकारियों के अभाव से दुःखी दिखाई देते हैं। उनका मानना है कि लोगों के सपरिवार विस्थापित हो जाने और शराब के बढ़ते प्रचलन ने होली की रंगत को बिगाड़ दिया है। अब होली एक रीति पूरी करने जैसी भर रह गयी है। मगर फिर भी होली आते ही एक चुलमुलाट जैसी तो होने ही लगती है….