बीसवीं सदी का आखिरी दशक
लोकल कमान से लेकर हाई कमान तक हुक्काराम के संघर्ष की कहानी अब हमारे लिये कम रोचक नहीं रही। एक बार अनजाने में हमने उन्हें अनसुना कर दिया तो उन्होंने हमें विरोधी गुट वालों की सूची में शामिल कर हमारी छलड़ी कर दी। तब से हमारी मेजबानी का तरीका ही बदल गया। हो सकता है इसके पीछे अल्लादीनी चिराग की कल्पना हो।
यह बात ज्यादा पुरानी नहीं है। इक्कीसवीं सदी प्रारम्भ होने के पहले अंतिम दशक की बात रही होगी। तब सत्ता के विरोध में राज्य आंदोलन का गुबार निकल रहा था। अंदर ही अंदर हुक्काराम जी खुश थे। कितनी बार उन्होंने लखनौ के चक्कर लगाये-टिकट से लेकर चुनाव एजेंटी तक उनके नाम को विरोधी गुट ने लटकवा दिया। तब वे सोच रहे थे कि इस मौके पर विरोधी खेमे को पटकनी देने के लिये लखनौ को फोन मारा जाये। लखनौ वालों ने तुरन्त हुक्काराम जी के हुनर का डंका पीटते हुए उन्हें आंदोलनकारियों के विरुद्ध आंदोलन तैयार करने को कहा, जिसे विरोधी गुट वाले नहीं कर पा रहे थे।
फिर क्या था ? इस छलड़ी में अपने आप को बधाई देते हुए हुक्काराम जी दायित्व को स्वीकार कर गये और लखनौ को फोन करते हुए दौरे पर निकल पड़े। बाहर राज्य आंदोलन की फिजाँ का ज्वालामुखी का लावा बढ़ता जा रहा था। हुक्काराम जी के शहर के मुहल्ले के बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलायें राज्य आंदोलन के नाम पर कोतवाली को घेर चुके थे। कोतवाल होल्यार वाले अंदाज में न जाने कहाँ छुप गये थे। उन्हें मालूम था कि आंदोलनकारी निहत्थे हैं। इसलिये वे भयहीन थे।
जुलूस पर जुलूस ! मातृशक्ति, छात्र, बूढ़े-बच्चे, कर्मचारी, सब्जी किसान ने पोटली वाली बोरी की आढ़त लगा छोड़ दिया। आढ़ती भी आंदोलनकारी हो गया। उसकी आढ़त बंद हो गयी। दुकानदार ने कहा- अब अपने राज्य की चीजें बेचेगा और कुछ नहीं बेचेगा।
हुक्काराम जी एक अखबारनवीस को थामे थे। एक गली में चिल्ला रहे थे- अलग राज्य वाले विरोधी लोगों के सिखाये हैं। वे विकास विरोधी हैं। हमारी अच्छी वाली सरकार की खिलाफत कर रहे हैं। इनके बहकावे में मत आओ। हमारी सरकार गंगोत्री को काश्मीर ले जायेगी। पटना को बम्बई ले जायेगी। पूरे राज्य को शिव की जटा द्वारा गंगामय बनायेगी। उंगली भर चार जिलों का राज्य क्या भाड़ झोंकेगा ?
उनका विज्ञापनी पत्रकार उनकी खबरें नोट करता। वे अखबार में छप रही थीं। हुक्काराम जी आंदोलनकारियों की छलड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। ये लोग अज्ञानी हैं। अशिक्षित हैं। इन छोकरों ने अंग्रेजों के बनाये प्राइमरी स्कूलों में पढ़ा है। इसलिये उनके समझ में बात नहीं आ रही है।
फिर अखबार में खबर आयी। पुलिस का रेला आंदोलनकारियों पर चढ़ गया है। रैली में अनेक महिलायें लापता हैं। बाद में छपा कुछ का अपहरण हो गया है। कुछ लापता हैं। दूसरे पन्ने पर खबर थी- दनादन गोली से सरकार विरोधी दस्ते वाले आंदोलनकारी दुनिया से अलविदा हो गये हैं। हुक्काराम जी का बयान भी छपा था, अब माँगो राज्य।
सारे जिलों की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी। सरकारी कोष में ताले लग गये। खेत-खलिहानों का उल्लास गायब हो गया। सरकारी दफ्तर आदमीविहीन हो गये थे। वहाँ न जनता थी न कर्मचारी।
हुक्काराम जी उसी गली में फँसे रह गये। उनका मुहल्ला और शहर राज्य माँगने वालों से पट गया था। हुक्काराम के वापस लौटने का रास्ता नहीं था।
हुक्काराम की चतुराई भी दाद लेने लायक ठैरी। गली से सीधे अंग्रेजी स्कूलों में घुस गये। वहाँ मालिकान अभिभावको को धमका रहे थे। अपने बच्चों से हमारे स्कूल खाली करो या बच्चों को पढ़ने दो। हमारे स्कूल को हिन्दुस्तानी स्कूल समझ रखा है ? ……. हुक्काराम जी को फिर मौका मिला। वे अभिभावकों की तरफ से गिड़गिड़ाये। बच्चों को सुरक्षा देने की माँग की। बच्चों के अभिभावकों को गैर अराजक और आंदोलनहीन घोषित किया। आंदोलन के दौरान पब्लिक कॉलेज की पढ़ाई जारी रखने का एलान कर दिया। लखनौ के अखबार में छपी ऐसी खबरें आंदोलनकारी पढ़ रहे थे……
इक्कीसवीं सदी का पहला दशक……..
राज्य बन गया। अंगुली भर जिले वाले राज्य में सिर के बालों के बराबर नेताओं के पद सृजित हो गये। फिर भी कम पड़ रहे थे। तकदीर के मारे हुक्काराम छलड़ी के दिन भी छटपटाते रहे। उन्हें कहीं कोई टिकट नहीं मिला। सब विरोधी खा गये। उनकी पार्टी में पुराने दुश्मन भी शामिल होकर हुक्काराम की छलड़ी कर गये। सरकार बन गई। इन छलड़ी में नये राज्य की राजधानी फलीभूत हो गयी। हुक्काराम जी को पद मिल गया। राज्य आंदोलनकारियों के समन्वयक। उन्हें लाल बत्ती दे दी। अब हुक्काराम हर चौराहे पर जा रहे हैं। आंदोलनकारियों से पूछ रहे हैं। वे अपना नाम घोषित करें। आंदोलनकारी समन्वयक उन्हें चिन्हित करेगा। उन्हें पेंशन मिलेगी। नौकरी मिलेगी। पेट्रोल पम्प मिलेगा। जो चाहेगा वो मिलेगा। आंदोलनकारी के पास सरकार के किसी भी दायित्वधारी का सर्टिफिकेट होना चाहिये कि वह आंदोलनकारी है।
उस मीटिंग में दर्जनों ताली बजाने वाले कर्मचारी हैं। दो दर्जन अखबारनवीस हैं। सरकार ने दायित्वधारियों को विकास की जानकारी देने के लिये विज्ञापन का कोष चौगुना कर दिया है। अखबार नये राज्य से खुश हैं। सरकार के बारे में छाप रहे हैं। आंदोलनकारी समन्वयक हुक्कारामजी की फोटो हर अखबार में छप रही है और नया माहौल बन रहा है कि अगली बार हुक्काराम टिकट पक्का कर लें और चुनाव जीत भी जायें, क्योंकि चिन्हित आंदोलनकारी हुक्काराम जी के साथ हैं। ऐसा विज्ञापनी अखबारनवीसों का कहना है।
कर्मचारी, दुकानदार, आढ़ती, किसान, बच्चे, बूढ़े, महिलायें, मृतकों के परिवार पूछ रहे हैं- ये हुक्काराम कौन हैं, जो इतनी छलड़ियों में हमें एक दिन भी नहीं दिखे ? हुक्काराम जी का नाम न जेलों में है, न कोतवालियों में। न वहाँ है, जहाँ जेल घेराव हुआ है। न गाँवों के हैं, न शहरों के। उनका नाम केवल सरकार की सूची में है जो छप गयी है। तमाम तमाम लोगों को दिख जाये इसलिये उसे छलड़ी में कम्प्यूटरी स्प्रे द्वारा सतरंगी रंगों में रंग कर चौराहे में टाँक दिया है।
इस छलड़ी में इसे आप अबीर-गुलाल जरूर चढ़ायें। अपने राज्य को नमन करें और बिना परिचय के ही सही, हुक्काराम जी को बधाई दें।























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