• मुखपृष्ठ
  • पुराने अंक
  • हमारे बारे में
  • समाचार सूची
नैनीताल समाचार
Uttarakhand's Premium and Real Newspaper
  • मुखपृष्ठ
  • सम्पादकीय
  • आपकी बात
  • हास्य-व्यंग्य
  • कविताऐं-छंद-शेर
  • जन आन्दोलन
  • विविध
  • विशेषांक
You are here: Home / पद संचालन की दृष्टि से खास है काली कुमाऊँ की होली

पद संचालन की दृष्टि से खास है काली कुमाऊँ की होली

लेखक : नैनीताल समाचार ::अंक: 14 || 01 मार्च से 14 मार्च 2012:: वर्ष :: 35:

जगदीश महर

holi-lohaghat-keeगायन और पद संचालन की दृष्टि से काली कुमाऊँ की होली का अन्दाज अलग हो जाता है। इस इलाके में होली का मतलब है-मौजा ही मौजा। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या महिलायें….. सब होली के खुमार में रहते हैं। चम्पावत जिले के अपने छोटे से गाँव डुँगरी, पट्टी खिलबिती की होली की ढेर सारी यादें मेरे मन में बसी हुई हैं। पहाडी किसान का बेटा होने के कारण मेरे लिये यहाँ की होली, दीपावली, हरेला, चैतोला, नवरात, देवीधूरा की पत्थरमार बग्वाल आदि का कुछ खास ही मतलब होता था। इन सब में भी हमारे लिये सबसे खास होती थी होली!

एकादशी की दोपहर में पूरा गाँव पधान के आंगन पर एकतित्र होता था। उस दिन पूरी होली के दिनों का समय निर्धारित किया जाता था। होली गाने का क्रम सुबह खाना खाने के बाद 11 बजे से शुरू होता था और रात 10 बजे तक चलता रहता। जब तक धूप रहती थी, खड़ी होली चलती। उसके बाद बैठकी होली। गाँव के प्रत्येक आंगन मे दो-दो होली गाने का प्रचलन था। जिस परिवार के आंगन में होली पहुँचती, उसे ढूँडा माई के नाम पर पिठाई देनी होती थी। पहले यह पिठाई 20 रुपया होती थी, अब 50 रु. हो गयी है। एकत्रित पैसे गाँव के पधान के पास जमा किये जाते थे, जिनका हिसाब-किताब टीके के दिन होता था। होली में मायर्के आइं गाँव की विवाहित लड़कियों को इस पैसे से दक्षिणा दी जाती थी। सार्वजनिक उपयोग की चीजें- जैसे लोटे, गिलास, थाली, परात, डेग आदि बर्तन भी खरीदे जाते थे।

काली कुमाऊँ की खड़ी होली में दो पंक्तियाँ होती हैं। एक पंक्ति में 15 से 20 लोग होते हैं। होल्यार सफेद कुर्ता, पैजामा व सफेद टोपी पहने होते हैं और सर से पाँव तक अबीर-गुलाल से रंगे हुए दिखते हैं। होल्यारों के गोलाकार घेरे के मध्य में मुख्य गायक ढोल, मजीरा और झाँझ की ताल बजाने वाले होते हैं। दोनों पंक्तियाँ बारी-बारी से गाती हैं। बीच-बीच में उत्साह में भरे बच्चे भी ‘होली भै छलबल’ के नारे लगाते हैं। काली कुमाऊँ में स्वांग का प्रचलन भी है। अक्सर कुछ युवक महिलाओं का वेश धारण कर के स्वांग भी करते रहते हैं। धीरे-धीरे रंग जमना शुरू होता है। बीच-बीच में होल्यारों को गोला, बीड़ी-सिगरेट, सुपारी, मिठाई, लौंग, इलायची के साथ अनेक प्रकार के स्थानीय पकवान बाँटे जाते हैं। ढोल-मंजीरे की ताल के साथ होली के मादक भरे गीत सभी को उत्साह व उमंग से सरोबार कर देते हैं। गाँववासी बिना किसी भेद-भाव के एक-दूसरे से गले मिलते हैं और शुभकामना देते हैं। एकादशी से होली की पूर्णिमा तक गाई जाने वाली होलियों में प्रमुख हैं- ‘खेलत गोपी-ग्वाल-बाल रे मथुरा से होली आई…’, ‘मेरो मोहन भयो अवतार प्यारे मोहनियाँ…’, ‘तुम दे के मिलो राजा राम सीता दे के मिलो…’, ‘गई गई असुर तेरी नारि मन्दोदर सिया मिलन गई बागा में…’., ‘होरी धर मुकुट खेले होरी’, ‘दहि लूटो माखन लूटो बिंद्रावन मोहन दहि लूटो’, ‘गोपी चन्द्र अमर भयो काहे से गोपी चन्द्र अमर भयो काहे से’ तथा ‘पूरी तपस्या होय कुँवर भागीरथ गंगा ले आये…आदि।

हमारे इलाके में ढोल बजाने मे रूप सिंह, उनके भाई दलीप सिंह व दिवान सिंह, प्रकाश चन्द्र, तारा दत्त, जगत सिंह आदि पारंगत थे। इन सब में भी रूप सिंह का अंदाज जुदा था। सेवानिवृत फौजी होने के नाते रम का खुमार, होली का रंग और उनकी बड़ी-बड़ी मूँछों का हिलना तथा ढोल को बजाते-बजाते कमर से घुटनों तक ले जाना मनोहारी लगता थ। ढोल एक साथ दो या तीन बजाये जाते थे। सभी का एक साथ थाप देना और गोल घेरे के बीच में इधर से उधर घूमना, एक-दूसरे से कभी ढोल से ढोल मिलाना और कमर से कमर मिलाना….. यह सब कितना अद्भुत था ? झाँझ की झँन झँन ढोल के बीच ऐसे घुल जाती, मानो फगारों (होल्यारों) की ताल में ताल मिला रहा हो।

फगार तीन प्रकार के होते थे, बुजुर्ग, जवान और बच्चे। बुजुर्गों में स्व. पिताम्बर दत्त पान्डे की महत्वपूर्ण भूमिका रहती। वे पेशे से पोस्टमास्टर थे। क्षेत्रवासी उनकी बहुत इज्जत करते थे। फगारों मे वह पंक्ति में सबसे पहले रहते थे। उनकी आवाज और धुन जादुई थे। जैसे ही एक होली खत्म होती, बीच में मजाक का छींटा डाल देते। उनकी जेब में एक हरड़ अवश्य रहता, जिसे हाथ में रख कर दिखाते थे कि यह अद्भुत बूटी है। स्त्रियों-पुरुषों के सब विकार दूर करती है। नव विवाहितों का इस पर अटूट विश्वास है। यह कहीं बाजार में नहीं मिलती, यह सिर्फ हमारे पास उपलब्ध रहती है। ऐसे कई बुजुर्ग हमारे बीच से चले गये हैं, जिन की कमी हमेशा खलती है।

होली की दोनों लाइनों में आठ-दस बुजुर्ग और इतने ही जवान और बच्चे होते थे। जो जवान और बच्चे अच्छा गाते, बुजुर्ग उन्हें उत्साहित करने के लिए अपने बगल में खडे़ हो कर गाने को कहते। मेरे जैसे नौजवान होलियार के लिए यह पुरस्कार जैसा होता। सूर्य अस्त होते ही होली बैठकों का आयोजन होता था, जिसमें हारमोनियम पर दलीप सिंह, ढोलक में भवान सिंह और अन्य कोई चिमटा बजाते थे। दलीप सिंह की सुरमई आवाज से जैसे ही लफ़्ज निकलते, तो नौजवान अपने आप को नाचने से रोक नहीं पाते थे। बोल होते थे- ‘होली आइ रे कनहाइ रंग बरसे बजा दे जरा बाँसुरी’, ‘तुम तो मोहन लाल जनम के कपटी’, ‘छुप छुप के रोज पीते थे जिन से आज वे भी लगाए हुए हैं’। हम लोग कहते, जियो चचा जियो। जब नौजवान गानों की फरमाईश पर फरममाईश करते और दलीप चचा गाते रहते। देर रात तक यह मौज-मस्ती चलती थी।

टीके के दिन प्रसादस्वरूप हलुवा बनाया जाता था। सारे फगार इस आयोजन मे एकत्र होते। मान्यता थी कि इस प्रसाद से होलियाँ गा-गा कर गला बैठ जाने जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं। बुजुर्ग कहते, जो खुशकिस्मत होगा वह अगले साल होली खेलेगा (जो भाग्गी बच रौलो, अघल साले होरी खेललो)। इस भावुक वक्तव्य और दिल में टीस के साथ होली का समापन होता।

 

फोटो : साभार मेरापहाड़ फोरम

दुनिया को बतायें:

  • Share
  • Email
  • Print
  • Google +1
  • Facebook
  • Twitter
Posted in विविध, संस्कृति Tagged champawat, festival of colour, festivals, festivals of uttarakhand, holi, khadi holi, kumaoni holi, lohaghat
← Previous Next →

ढूंढें तो सही..

ताजा अंक

आशल-कुशल : मई -2013-1

लेखक: नैनीताल समाचार

एक सीधे पहाड़ी के नुकीले सपने .11

लेखक: नैनीताल समाचार

सम्पादकीय : अखिलेश का गुस्सा!

लेखक: राजीव लोचन साह

सांस्कृतिक पदयात्रा से जानीं नंधौर क्षेत्र की तकलीफें

लेखक: नैनीताल समाचार

कानून तो हैं, पालन नहीं होता

लेखक: दिनेश पंत

कोकाकोला का विरोध

लेखक: प्रवीण भट्ट

राजजात 2013: कई चुनौतियाँ होंगी हमारे सामने

लेखक: नैनीताल समाचार

‘गढ़वाली’ को याद करते हुए की सिविल नाफरमानी की घोषणा

लेखक: रोहित जोशी

कभी दामिनी…कभी गुडि़या

लेखक: नैनीताल समाचार

दो शब्द श्रद्धांजलि के भी नहीं थे उनके लिये !

लेखक: शमशेर सिंह बिष्ट

चिट्ठी-पत्री : ऐसे कैसे सुधरेगी शिक्षा व्यवस्था….

लेखक: नैनीताल समाचार

वनाग्नि रोकने के लिये चीड़ का सफाया जरूरी है

लेखक: गजेन्द्र पाठक

वन विभाग की शह पर होती है तस्करी

लेखक: नैनीताल समाचार

नैनीताल समाचार को सब्सक्राइब करें

Enter your email address:

 Subscribe in a reader

Subscribe By Post

जनमबार अंक -12

घामतपवे भाबर से साइबर युग में फटक मारता हल्द्वानी . 18

लेखक: आनन्द बल्लभ उप्रेती January 6, 2013

कागजों में चल रहा है कृषि विज्ञान केन्द्र जाखधार

लेखक: बिपिन कुमार संमवाल January 6, 2013

कम्पनी परियोजना प्रभावितों में फूट डाल रही है

लेखक: जे.पी. मैठाणी January 6, 2013

तीन मुख्यमंत्रियों वाले जनपद जिला अस्पताल के बुरे हाल

लेखक: जगमोहन डांगी January 6, 2013

बगावत के बीच घिसटती सरकार

लेखक: प्रवीण भट्ट January 6, 2013

आशल-कुशल : अंक: 01-02 || 15 अगस्त से 14 सितम्बर 2012

लेखक: नैनीताल समाचार January 6, 2013

10,000 की जनसंख्या प्रभावित है

लेखक: नैनीताल समाचार January 6, 2013

उत्तरकाशी वासियों का दर्द कोई नहीं सुन रहा है

लेखक: नैनीताल समाचार January 6, 2013

हालाते अब और दस्तावेज : कुछ नयी कुछ पुरानी -2

लेखक: नैनीताल समाचार January 6, 2013

इस बार गिर्दा को श्रीनगर में याद किया गया

लेखक: नैनीताल समाचार January 6, 2013

कहाँ जायें विज्ञान के छात्र

लेखक: हरीश चन्द्र चंदोला November 28, 2012

छोटा मुँह छोटी बात: चुप्पी तोड़ो,बोलो

लेखक: रमदा October 10, 2012

हरेला अंक-2012

यात्राओं पर नियंत्रण जरूरी है

लेखक: नैनीताल समाचार August 9, 2012

यह गुंडागर्दी कहाँ ले जायेगी ?

लेखक: नैनीताल समाचार July 26, 2012

परियोजनाओं की नहीं, विकास के तरीकों की बात करें

लेखक: नैनीताल समाचार August 9, 2012

छोटा मुँह छोटी बात :रिश्ता नाड़े और पेटीकोट/पाजामे के बीच…..

लेखक: रमदा July 26, 2012

पहाड़ों के लिये काल बन गई हैं जेसीबी मशीनें

लेखक: शमशेर सिंह बिष्ट July 26, 2012

हरेले की चिट्ठी मेघ के नाम

लेखक: गोविंद पंत 'राजू' July 23, 2012

कर्मी की दुर्घटना से हमने कोई सबक नहीं सीखा

लेखक: नैनीताल समाचार July 26, 2012

बारिश के भीतर बारिश है

लेखक: शिरीष कुमार मौर्य July 25, 2012

आशल-कुशल : 15 जुलाई से 31 जुलाई 2012

लेखक: नैनीताल समाचार July 25, 2012

सरला बहन की याद

लेखक: नैनीताल समाचार August 6, 2012

होली अंक -2013

अंक: 14 || 01 मार्च से 14 मार्च 2013–2

लेखक: नैनीताल समाचार March 30, 2013

Category: विविध

अंक: 14 || 01 मार्च से 14 मार्च 2013–1

लेखक: नैनीताल समाचार March 30, 2013

Category: विशेषांक, होली अंक

आपकी टिप्पणीयाँ

  • riskypathak on एक सीधे पहाड़ी के नुकीले सपने .11
  • utkersh bora on अलविदा प्रताप भय्या
  • raghubir havan ronkali on मानसून में कई रूप दिखते हैं हिमालय के…
  • Navin Joshi on उद्योग शुक्ला को सजा
  • Dr. leela joshi on अल्मोड़ा में मार्क टली का व्याख्यान
  • राजेंद्र on हमें बधाई तो दीजिये !
  • DR. RAGHUNATH MISHR on हस्तलिखित पत्रिका से राष्ट्रीय बाल पत्रिका का सफर
  • अशोक कुमार शुक्ला on प्राप्ति स्वीकार : ’उत्तराखण्ड के शिल्पकार’
  • Krishna Joshi on हमारे बारे में
  • Kavinder Singh Koshyari on एक लोकपर्व की त्रासदी

RSS Samyantar

  • ऊंची विकास दर का मिथक
  • पूंजी का संकट और समाजवादी प्रयोग
  • वामपंथ ने जेंडर के सवाल को पूरी तरह छोड़ दिया
  • अस्मिता की राजनीति असली संघर्षों से ध्यान बंटाती है
  • अस्मिता की लड़ाई और वाम

RSS अपना उत्तराखंड

  • हाथन हुसकि पिलाई फूलन पिलायो रम
  • हिट भुला हाथ खुटा हला, खाण कमाणें छुईं कला
  • ना जा ना तौं भेळू पखाण, जिदेरी घसेरी बोल्यूं माण
  • बिजी जा दी लाटी, बिजी जा दी लाटी……
  • ऐसे अनपढ़ चाहिये पहाड़ को
  • चिपको के बहाने कुछ और बातें…
  • रैणी: 26 मार्च 1974: चिपको आंदोलन की सच्ची कहानी
  • एक थीं गौरा देवी: एक माँ के बहाने चिपको आन्दोलन की याद
  • मेरे को पहाड़ी मत बोलो मैं देहरादूण वाला हूं
  • भिनज्यू को बेटे में बदलने की साजिश
  • मुखपृष्ठ
  • पुराने अंक
  • हमारे बारे में
  • समाचार सूची

Many Times we use pictures which come using Google Image Search. It is not possible to give Credit Every time. These Pictures have been used for educational and non profit activities. If any copyright is violated, kindly inform and we will promptly remove the picture.

Copyright © 2013 नैनीताल समाचार.

loading Cancel
Post was not sent - check your email addresses!
Email check failed, please try again
Sorry, your blog cannot share posts by email.