जगदीश महर
गायन और पद संचालन की दृष्टि से काली कुमाऊँ की होली का अन्दाज अलग हो जाता है। इस इलाके में होली का मतलब है-मौजा ही मौजा। क्या बच्चे, क्या बुजुर्ग, क्या महिलायें….. सब होली के खुमार में रहते हैं। चम्पावत जिले के अपने छोटे से गाँव डुँगरी, पट्टी खिलबिती की होली की ढेर सारी यादें मेरे मन में बसी हुई हैं। पहाडी किसान का बेटा होने के कारण मेरे लिये यहाँ की होली, दीपावली, हरेला, चैतोला, नवरात, देवीधूरा की पत्थरमार बग्वाल आदि का कुछ खास ही मतलब होता था। इन सब में भी हमारे लिये सबसे खास होती थी होली!
एकादशी की दोपहर में पूरा गाँव पधान के आंगन पर एकतित्र होता था। उस दिन पूरी होली के दिनों का समय निर्धारित किया जाता था। होली गाने का क्रम सुबह खाना खाने के बाद 11 बजे से शुरू होता था और रात 10 बजे तक चलता रहता। जब तक धूप रहती थी, खड़ी होली चलती। उसके बाद बैठकी होली। गाँव के प्रत्येक आंगन मे दो-दो होली गाने का प्रचलन था। जिस परिवार के आंगन में होली पहुँचती, उसे ढूँडा माई के नाम पर पिठाई देनी होती थी। पहले यह पिठाई 20 रुपया होती थी, अब 50 रु. हो गयी है। एकत्रित पैसे गाँव के पधान के पास जमा किये जाते थे, जिनका हिसाब-किताब टीके के दिन होता था। होली में मायर्के आइं गाँव की विवाहित लड़कियों को इस पैसे से दक्षिणा दी जाती थी। सार्वजनिक उपयोग की चीजें- जैसे लोटे, गिलास, थाली, परात, डेग आदि बर्तन भी खरीदे जाते थे।
काली कुमाऊँ की खड़ी होली में दो पंक्तियाँ होती हैं। एक पंक्ति में 15 से 20 लोग होते हैं। होल्यार सफेद कुर्ता, पैजामा व सफेद टोपी पहने होते हैं और सर से पाँव तक अबीर-गुलाल से रंगे हुए दिखते हैं। होल्यारों के गोलाकार घेरे के मध्य में मुख्य गायक ढोल, मजीरा और झाँझ की ताल बजाने वाले होते हैं। दोनों पंक्तियाँ बारी-बारी से गाती हैं। बीच-बीच में उत्साह में भरे बच्चे भी ‘होली भै छलबल’ के नारे लगाते हैं। काली कुमाऊँ में स्वांग का प्रचलन भी है। अक्सर कुछ युवक महिलाओं का वेश धारण कर के स्वांग भी करते रहते हैं। धीरे-धीरे रंग जमना शुरू होता है। बीच-बीच में होल्यारों को गोला, बीड़ी-सिगरेट, सुपारी, मिठाई, लौंग, इलायची के साथ अनेक प्रकार के स्थानीय पकवान बाँटे जाते हैं। ढोल-मंजीरे की ताल के साथ होली के मादक भरे गीत सभी को उत्साह व उमंग से सरोबार कर देते हैं। गाँववासी बिना किसी भेद-भाव के एक-दूसरे से गले मिलते हैं और शुभकामना देते हैं। एकादशी से होली की पूर्णिमा तक गाई जाने वाली होलियों में प्रमुख हैं- ‘खेलत गोपी-ग्वाल-बाल रे मथुरा से होली आई…’, ‘मेरो मोहन भयो अवतार प्यारे मोहनियाँ…’, ‘तुम दे के मिलो राजा राम सीता दे के मिलो…’, ‘गई गई असुर तेरी नारि मन्दोदर सिया मिलन गई बागा में…’., ‘होरी धर मुकुट खेले होरी’, ‘दहि लूटो माखन लूटो बिंद्रावन मोहन दहि लूटो’, ‘गोपी चन्द्र अमर भयो काहे से गोपी चन्द्र अमर भयो काहे से’ तथा ‘पूरी तपस्या होय कुँवर भागीरथ गंगा ले आये…आदि।
हमारे इलाके में ढोल बजाने मे रूप सिंह, उनके भाई दलीप सिंह व दिवान सिंह, प्रकाश चन्द्र, तारा दत्त, जगत सिंह आदि पारंगत थे। इन सब में भी रूप सिंह का अंदाज जुदा था। सेवानिवृत फौजी होने के नाते रम का खुमार, होली का रंग और उनकी बड़ी-बड़ी मूँछों का हिलना तथा ढोल को बजाते-बजाते कमर से घुटनों तक ले जाना मनोहारी लगता थ। ढोल एक साथ दो या तीन बजाये जाते थे। सभी का एक साथ थाप देना और गोल घेरे के बीच में इधर से उधर घूमना, एक-दूसरे से कभी ढोल से ढोल मिलाना और कमर से कमर मिलाना….. यह सब कितना अद्भुत था ? झाँझ की झँन झँन ढोल के बीच ऐसे घुल जाती, मानो फगारों (होल्यारों) की ताल में ताल मिला रहा हो।
फगार तीन प्रकार के होते थे, बुजुर्ग, जवान और बच्चे। बुजुर्गों में स्व. पिताम्बर दत्त पान्डे की महत्वपूर्ण भूमिका रहती। वे पेशे से पोस्टमास्टर थे। क्षेत्रवासी उनकी बहुत इज्जत करते थे। फगारों मे वह पंक्ति में सबसे पहले रहते थे। उनकी आवाज और धुन जादुई थे। जैसे ही एक होली खत्म होती, बीच में मजाक का छींटा डाल देते। उनकी जेब में एक हरड़ अवश्य रहता, जिसे हाथ में रख कर दिखाते थे कि यह अद्भुत बूटी है। स्त्रियों-पुरुषों के सब विकार दूर करती है। नव विवाहितों का इस पर अटूट विश्वास है। यह कहीं बाजार में नहीं मिलती, यह सिर्फ हमारे पास उपलब्ध रहती है। ऐसे कई बुजुर्ग हमारे बीच से चले गये हैं, जिन की कमी हमेशा खलती है।
होली की दोनों लाइनों में आठ-दस बुजुर्ग और इतने ही जवान और बच्चे होते थे। जो जवान और बच्चे अच्छा गाते, बुजुर्ग उन्हें उत्साहित करने के लिए अपने बगल में खडे़ हो कर गाने को कहते। मेरे जैसे नौजवान होलियार के लिए यह पुरस्कार जैसा होता। सूर्य अस्त होते ही होली बैठकों का आयोजन होता था, जिसमें हारमोनियम पर दलीप सिंह, ढोलक में भवान सिंह और अन्य कोई चिमटा बजाते थे। दलीप सिंह की सुरमई आवाज से जैसे ही लफ़्ज निकलते, तो नौजवान अपने आप को नाचने से रोक नहीं पाते थे। बोल होते थे- ‘होली आइ रे कनहाइ रंग बरसे बजा दे जरा बाँसुरी’, ‘तुम तो मोहन लाल जनम के कपटी’, ‘छुप छुप के रोज पीते थे जिन से आज वे भी लगाए हुए हैं’। हम लोग कहते, जियो चचा जियो। जब नौजवान गानों की फरमाईश पर फरममाईश करते और दलीप चचा गाते रहते। देर रात तक यह मौज-मस्ती चलती थी।
टीके के दिन प्रसादस्वरूप हलुवा बनाया जाता था। सारे फगार इस आयोजन मे एकत्र होते। मान्यता थी कि इस प्रसाद से होलियाँ गा-गा कर गला बैठ जाने जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं। बुजुर्ग कहते, जो खुशकिस्मत होगा वह अगले साल होली खेलेगा (जो भाग्गी बच रौलो, अघल साले होरी खेललो)। इस भावुक वक्तव्य और दिल में टीस के साथ होली का समापन होता।
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