आज जहाँ शराब ने होली के रंग को भंग करने का काम किया है वहीं गंगोलीहाट का सदूरवर्ती एक गाँव कुनल्ता ऐसा भी है जो शराबियों के हुड़दंग से बचा हुआ है। लोग इस गाँव की होली की मिसाल पेश करते नहीं थकते। कई ऐसे गाँव भी हैं जहाँ पर शराबियों के हुड़दंग के चलते शान्तिप्रिय व होली के शौकीन लोग होली का आनंद नहीं ले पाते तो उनके पाँव इस गाँव की और खिंचे चले आते हैं। गाँव के सयानों के साथ ही गाँव के युवाओं ने लंबे समय से चली आ रही इस शांतिप्रियता की पंरपरा का निर्वहन बखूबी किया है। युवाओं ने अपने बुजुर्गों से मिली हुई सीख को न सिर्फ सहेजकर रखा हुआ है बल्कि वह खुद अपने आचरण से आने वाली पीढ़ी के लिए भी एक सीख दे रहे हैं।
सभ्य व शिक्षित माने जाने वाले इस गाँव में आज भी शांतिपूर्ण तरीके से होली आयोजित होती है। होली के दौरान होल्यिारों की मस्त टोली में सिर्फ होली की मस्ती होती है। शराब की मस्ती को यह समाज न स्वीकारता है न बर्दाश्त करता है। यहाँ पर पुरुष व महिलाओं की होली अलग-अलग होती है। एक ओर जहाँ महिलाएं बगैर किसी भय के होली का आनंद उठाती हैं वहीं पुरुषों की होली भी एक अलग रंग में रंगी होती है। होली का प्रारंभ लंबे समय से गाँव के एक घर से होता है। जहाँ पर पूजा अर्चना के साथ ही चीर बाँधी जाती है। इस दिन सभी लोग अपने-अपने घरों से पूजा सामग्री व चीर के लिए कपड़े का टुकड़ा लेकर पहुँचते हैं। पूजा के साथ होली आरंभ होती है। होली गायन के साथ सभी उपस्थित होल्यिारों को तिलक आदि लगाया जाता है। इसी रोज दोपहर बाद फिर बैठकी होली शुरू हो जाती है। गाँव के हर आंगन में खड़ी होली के साथ बैठकी होली भी आयोजित होती है। जिस भी घर में होली होती है वह पूरे जोशोखरोश के साथ होल्यिारों का स्वागत करता है। होल्यिारों के स्वागत में सौंप, सुपारी, गुड़, चिप्स, ठंडा सहित कई तरह की सामग्री पूरे मनोयोग के साथ होल्यिारों के समक्ष परोसी जाती है। हर रोज तीन से चार बैठकी होली आयोजित होती है। हर बैठक में तीन से चार होलियाँ गायी जाती हैं। वियोग हो या फिर श्रृंगार हर तरह का रस इन होलियों में होता है।
होली के बीच-बीच में देश दुनिया के सवालों को लेकर होल्यिारों में बहस भी जारी रहती है। इस दौरान समाज के उन लोगों को भी याद कर लिया जाता है जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, इसमें युवाओं के लिए अपने समाज के लोगों के बारे में जानने की बड़े काम की जानकारी भी होती है। हारमोनियम, तबले, मजूरे की संगत से तो होली खिल उठती है। सुबह से ही खाने की व्यवस्थाओं में लोग जुट जाते हैं। दोपहर 11 बजे तक सभी होल्यिार तैयार होकर उस आंगन में पहुँच जाते हैं जहाँ पहले रोज रात की होली का समापन हुआ था। सायं पाँच बजे तक लोग अपने-अपने घरों में लौटकर आ जाते हैं। उसके बाद परिवार के सभी सदस्यों को रात की होली में जाने की जल्दी रहती है इसलिए नौ बजे तक खाने की तैयारियाँ पूरी हो जाती हैं। रात नौ बजे जिस घर में होली आयोजित होनी है उसके आंगन में धूनी जला दी जाती है। घूनी के चारों और होल्यिारों के बैठने की व्यवस्था की जाती है ताकि होल्यिारों को ठंड से बचाया जा सके। रात ग्यारह से बारह बजे तक यह होली आयोजित होती है। महिलाओं की होलियाँ दिन तक ही सीमित रहती हैं। एक दिन मंदिरों के लिए होता है। इस दिन गाँव की सरहद में बसे इष्ट देवताओं के मंदिरों में होलियाँ आयोजित होती हैं। होली के अंतिम रोज छलड़ी के दिन पूरे गाँव में खड़ी होली आयोजित होती है। इस दिन होल्यिार हर आंगन में पहुँचते हैं। रंगों की बर्षा के साथ गाँव के एक आंगन में हो-होलखरे के साथ होली का समापन होता है। इस अंतिम रोज गाँव, घर, आस-पड़ोस के सभी लोगों की लंबी जीवन कामना के साथ सुख, समृद्वि का आशीर्वाद दिया जाता है।
शांतिप्रिय होली के चलते ही नगरों, महानगरों में रहने वाले लोग होलियों में घर आना पंसद करते हैं। गाँव में शराब पिए हुए लोग आपको नहीं मिल पाएंगे। बीड़ी- सिगरेट पीने वाले लोगों की तादाद भी नहीं के बराबर है। जो लोग इसके शौकीन भी हैं तो वह समाज के मिजाज का ध्यान रखते हुए दूर कहीं इस शौक को पूरा कर लेते हैं। शराबियों के आंतक के चलते जहाँ लोग गाँवों की होलियों में जाना पंसद नहीं करते वहीं इस गाँव के लोग होली के बहाने गाँव आना चाहते हैं अगर किन्हीं कारणों से गाँव में नहीं आ पाते तो वे यहाँ की होलियों को मिस करते हैं। इस गाँव की होली को एनडीटीवी चैनल ने न सिर्फ कवर किया बल्कि इसे अपने चैनल में प्रसारित भी किया। होली का हर मिजाज व रंगत यहाँ की होली में भी दिखता है लेकिन जिस शांतिप्रियता के साथ होली आयोजित की जाती है वह अपने आप में अनूठा है।