होली गाने व मनाने के तरीकों में जो अंतर कुमाऊँ में अलग-अलग जिलों में व इलाकों में है वही अंतर नंधौर घाटी में भी है। यहाँ पुरुष ही होली गाते हैं। वसंत ऋतु अपने साथ अनेक रंगों को भी लाती है। किसानों को खेती के काम से भी इसी समय अधिकतर राहत रहती है, इसलिये इसी समय होली गायन, सामूहिक मिलन व रंगों के साथ खेलकर अपनी भावनाओं व दबी इच्छाओं को बाहर निकालने का अवसर मिलता है। भले ही ये भावनायें श्रृंगार रस और यौवन की उच्छृंखलता में डूबी अश्लीलता भरी ही क्यों न हों। कुछ जगहों पर होली में भक्तिभाव, सामाजिक पीड़ा व समस्याओं को भी सृजनात्मक रूप में गाया, रचा जाता है। पर यह पक्ष बहुत कम देखने को मिलेगा:
तुम लौटी चलो घर जाय भरत, मेरी प्रजा को दुःख मत दीजो,
दोस नहीं कुछ मातु का भाई…
कुछ लोग अब कैसेट, सीडी सुनते हैं और कुछ लोग होली की कुछ पंक्तियां गुनगुनाते व गाते हैं:-
खिड़कियों पर ठाड़ो देख राधे, ![]()
लौंडा बजा गयो बाँसुरिया
काहे की तेरी बाँसुरिया हो बाँसुरिया
काहे को मेरा बने राधे-लौडा…
एक होली और:-
बृज मण्डल देश देखो रसिया
बृज मंडल देख देखो रसिया
तेरे बृज में धान बहुत हैं।
फटकत नारी कुटे रसिया…..
मगर ज्यादातर होलियाँ श्रृंगार और महिमामंडित करने वाली ही होती हैं।
मटेला, डालकन्या, अधोड़ा, पश्याँ, झड़गाँव, गरगड़ी के आसपास अन्य गाँवों में भी ज्यादातर एक सी ही होलियाँ गायी जाती है। अंतर थोड़ा जल्दी तर्ज में गाने, ज्यादा जोर देकर गाने व धीरे-धीरे तर्ज में गाने का है। डालकन्या गाँव में होली के पाँच फड़ लगाते हैं कभी यह छः भी हो जाते हैं।
15 साल में होली की परंपरा में बहुत सारे बदलाव भी आये हैं। पुराने होल्यार एक-दो ही हैं, वे भी काफी उम्रदराज। दूसरा उथलापन व हल्कापन बढ़ गया है। अश्लीलता व लड़ना झगड़ना भी बढ़ा है। शराब पीना, पिलाना पहले नहीं के बराबर था, अब शराब की बाढ़ जैसी आ गयी है। पहले पीने को दही, मट्ठा देते थे और लोग माँग भी दही व मट्ठे की ही करते थे। पर अब माँगने वाला भी शराब माँगता है और देने वाला भी शराब ही देने का प्रयास करता है। इससे अभद्रता व झगड़ा बढ़ रहा है।
यहाँ पर होली दिन में एक घर से शुरूआत करके जितने परिवार उस होली में आते हैं, उन सभी में एक-एक करके छरड़ी से पहले पूरी करनी होती है। एक घर के आँगन में कभी एक होली से लेकर तीन-चार होली तक भी गाते हैं। रात में सभी एक जगह पर फड़ में इकट्ठा हो होली गाते हैं। ढोल ही एकमात्र प्रमुख बाजा है। यहाँ पुरुष ही खड़े होकर गोल चक्कर में घूम-घूम कर होली गाते हैं। जो देखने व साथ गाने में व पैर मिलाकर घूम-घूम कर चक्कर लगाने के साथ ही ढोल की आवाज में काफी मनोहारी लगती है, जिसका पूरा आनन्द तो शामिल होकर ही लिया जा सकता है। बाहर रहने वाले लोग भी घर आकर होली में मिलते हैं। होली का गुड़ और आलू-घुइयाँ के गुटके प्रसिद्ध हैं। साथ ही अन्य पकवान व चीजें भी लोग घर-घर होली में खिलाते हैं। होली के दिनों में होल्यारों के लिये केवल 2-3 घंटा ही नींद हो पाती है। कभी कभी तो वह भी नहीं। छरड़ी की शुरूआत रात के फड़ वाली जगह से सुबह 4 बजे बाद महिलाओं के द्वारा रंग व पानी से भिगाने से होती है। छरड़ी में सभी एक-दूसरे को बधाई व आशीर्वाद देते हैं। छरड़ी में भीगने-भिगाने में कम ही लोग भागीदारी करते हैं। छरड़ी के दूसरे दिन मंदिर में होली के बाद हलुवा खाकर सभी विदा लेते हैं। अगले साल की होली के आने का इंतजार करते हैं।
























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