फिर बसन्त फिर होली आई
रस बरसा रंग बिखरा
चूनर रंगी, फागुन लहराई
कुछ बुरांस कुछ टेसु टपके
राख हुए गुलमोहर रंगीले![]()
कुछ पलाश डाली से टूटे
हवा ले उड़ी स्वप्न सजीले
बादल घिर आये मन भीतर
बहुत दिनों तक उमेड़े-घुमड़े
रुक न सके फिर किसी जतन से
फिर-फिर छलके, फिर-फिर बरसे
धुल सा गया विषाद स्वतः ही
एक सुनहरी धूप खिल गयी
फिर उजास फिर आस जगी है
जीवन की गति सहज हो गयी
गुझिया बनी, चीरी भी बाँधी
स्वांग बने ढोलक भी बाजी
मले गुलाल अबीर परस्पर
दादी-पोती दोनों नाची
बरस दिवाली, बरसे फाग
ऋतुओं के सतरंगी मेले
हर घर हर आंगन फिर आये
दीप जलें फिर होली खेलें-
- उमा पंत