ख्याली चन्द्र जोशी
पर्वतीय क्षेत्रों में होली लंबे कालखंड से मनाई जाती है। बुजुर्ग बताते हैं कि होली हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई यह परम्परा अपने आप में अद्वितीय है। होली के दिन सब लोग मतभेद भुला एक-दूसरे से मिलते हैं। पहाड़ों में इसे एक बड़े त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यहाँ बैठकी होली बसंत पंचमी से ही प्रारम्भ हो जाती है। होली का प्रारम्भ मंदिरों में बैठक होली गाकर किया जाता है। पहाड़ों में मैदान की तरह एक दिन की होली की बजाए छः दिन की होली मनाई जाती है। घरों में महिलाएं गुजिया के साथ ही कई तरह के व्यंजन बनाते हैं। एक-दूसरे के घरों में जाकर होलियाँ गाई जाती हैं।
बागेश्वर में रतघर गाँव के सेवानिवृत लक्ष्मी दत्त जोशी बताते हैं कि हमारे गाँव में लगभग पाँच पीढि़यों से चीर के साथ होली मना रहे हैं। इससे पहले बिना चीर के ही होली होती थी। हमारे पूर्वज मथुरा जाकर चीर लाए थे। तब से चीर बाँधकर ही होली होती है। वर्षों पहले महाशिवरात्रि से बैठकी होली गाई जाती थी। बदल-बदल कर अलग-अलग घरों में होली गाई जाती थी। होली एकादसी से खड़ी होली होती थी। हम लोग कई दिन पहले से ही इसके लिए मचलते थे। नये-नये झक सफेद कपड़े सिले जाते थे। मजीरे, ढोलक, ताल आदि वाद्य यंत्रों को ठीक-ठाक कर लिया जाता था। रात-दिन होली गायन का शौक रहता था। होलियों में पहाड़ आने के लिए लोग अपनी छुट्यिाँ बचा कर रखते थे। घर आने पर खूब मस्ती के साथ होली गाते थे। हमारे गाँव की होली लगभग बाईस गाँवों में जाती थी। हर गाँव वाले होल्यारों का बड़े जोश से स्वागत् करते थे। होल्यारों को चाय, गुड़ के साथ ही आलू-भांग की पकौडि़याँ खिलाते थे। होलिका का आशीर्वाद लेते थे। उस जमाने में हर परिवार से एक-दो गुड़ की भेली दी जाती थी। होलिका दहन के दिन देवी पूजन के बाद हर घर में होली का प्रसाद पहुँचाया जाता था। लोगों में भाईचारा था। अब तो होली के नाम पर अराजकता सी हो गई है। लोग भी अब घर कम ही आते हैं। शराब की वजह से होली की मस्ती हुडदंग बन कर रह गई है। लड़ाई-झगड़े की वजह से होली में अब बड़े-बूढ़ों का जाना ना के बराबर हो गया है। बाइस गाँवों में जो होली जाती थी वो अब शराब की वजह से बंद ही हो गई है। अब तो वो परम्परा सिमट के ही रह गई है। गाँव तो दूर अब पड़ोस में ही जाना नहीं हो पाता है। लोग हो-हुल्लड़ की डर से घरों में ही दुबके रहते हैं। बस इंतजार करते हैं कि कब ये हुडदंग बंद हो तो बाहर निकला जाए। कुछ पढ़े-लिखे लोगों ने होली की सभ्य परंपरा को जिंदा रखा तो है। काश हर कोई उनसे कुछ सीख पाता तो गाँवों का अमन-चैन लौटता। गाँव चहकने लग जाते।