दो हजार दस भी विदा हुआ…इक्कीसवीं शताब्दी का पहला दशक पूरा हुआ।
इस गुजरे साल में बहुत कुछ अच्छा भी हुआ होगा…. जो आगे के लिये रास्ता खोले…. आशा बँधाये। अभी-अभी तो लखनऊ में 10 साल की एक लड़की सुषमा वर्मा को बी.एससी. करने की विशेष अनुमति दी गई है। ऐसे तमाम बच्चे होंगे। प्रतिभा का कोई आदि-अन्त नहीं होता। आगे जायेगा यह महादेश….. निश्चित आगे जायेगा। लेकिन यह उम्र का तकाजा है या कुछ और कि जाड़ों में आशा की किरणें हममें गर्माहट नहीं भरतीं। पाले में फिसलने या कुहासे में ट्रेन रद्द हो जाने का डर ही हमें जकड़े रहता है।
हम अगस्त के महीने में सुमगढ़ में अठारह बच्चों के जिन्दा दफ्न हो जाने के सदमे से उबर भी नहीं पाये थे कि तैंतीस साल तक कंधे से कंधा मिला कर हमारे साथ हर जाड़ा, गर्मी, बरसात झेलने वाले गिरीश तिवाड़ी ‘गिरदा’ एकाएक झोला टाँग कर अनन्त यात्रा पर चल दिये। हालाँकि उनका जाना अनपेक्षित नहीं था, मगर उनके बगैर काम करने की आदत हमें अभी भी नहीं पड़ी है।
सितम्बर तीसरे सप्ताह में तो हम बिल्कुल ही हक्के-बक्के हो गये, जब उत्तराखंड में शताब्दी की सबसे जबर्दस्त वर्षा और उससे उत्पन्न तबाही से यहाँ की जनता को जूझते देखा। ‘आधे खाली गिलास’ को ‘आधा भरा गिलास’ देखने वाले आशावादी तो उस तबाही में भी खुश थे, क्योंकि 500 करोड़ रुपये की राहत राशि तत्काल केन्द्र सरकार ने उत्तराखंड को मुहैया करा दी थी और बाकी बीस हजार करोड़ में से भी कुछ न कुछ आगे मिलता रहेगा। इस धनराशि से सारी सड़कें हॉट मिक्स हो जायेंगी, सारे स्कूल और स्वास्थ्य केन्द्र चकाचक हो जायेंगे। पहाड़ में अभी बहुत सी नई चमचमाती गाड़ियाँ और दौड़ेंगी। आखिर इतना सारा पैसा अपने साथ सम्पन्नता ही तो लायेगा। मगर हम तो उन आपदापीड़ितों के लिये लगातार आशंकित हैं, जिनके लिये अब तक इन हजारों करोड़ का कोई अर्थ नहीं है। पटवारी जिन्हें पाँच सौ रुपये थमा गया, जिसमें से दो सौ रुपये फोटोग्राफर झटक ले गया। अब जाड़ों की वर्षा सामने है और हमें उन लोगों की भी चिन्ता हो रही है, जिनके मकान पिछली वर्षा में पूरी तरह नहीं धसके थे….।
लोग कैमरा हाथ में लेकर कॉर्बेट नेशनल पार्क में बाघ की खोज कर रहे होंगे और सुन्दरखाल में घास काटने घर से निकलने से पूर्व औरतें प्रार्थना कर रही होंगी, हे ईश्वर, आज बाघ हमारे सामने न पड़े। हमारा बच्चा बिन माँ का न हो जाये देवता….
जाते-जाते यह साल समाजवादी चिन्तक सुरेन्द्र मोहन और मानवाधिकार कार्यकर्ता के.जी कन्नाबीरन को भी अपने साथ उठा ले गया।
कैसे होगी इन जैसे लोगों द्वारा खाली हुए स्थानों की पूर्ति ? कौन करेगा निःस्वार्थ भाव से ऐसे तमाम काम, जबकि अब सामाजिक कार्यों के लिये तमाम फंडिंग एजेंसियाँ मोटी थैलियाँ लिये खड़ी हों ?
कहने को इस साल हुए राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसाइटी, थ्री जी स्पेक्ट्रम, लवासा, नीरा राडिया आदि घोटालों पर चिन्ता जाहिर करने वाले कम नहीं हैं। लेकिन इन लोगों को भी यह सोचने की फुर्सत नहीं होती कि इस तरह के घोटाले होते क्यों हैं। विकास का जो रास्ता हमने चुना है, उसमें ऐसी ही बुराइयाँ तो पैदा होगी। एक ओर देश की आबादी के 0.013 प्रतिशत, यानी सिर्फ 12 लाख लोगों के पास देश की एक तिहाई सम्पत्ति है। इन लोगों की समझ में नहीं आता कि इस ऐश्वर्य का क्या उपयोग करें। इतने पैसे को कैसे खर्च करें ? अतः विलास का नंगा नाच है। दूसरी ओर मुख्यतः सरकारी, अर्द्ध सरकारी और सेवा क्षेत्र के कर्मचारियों से बना मध्यवर्ग है, जिसे संगठित होने के कारण अपनी माँगे मनवा ले जाने की सुविधा है। अतः उसका आर्थिक आधार सुरक्षित है। सबसे अन्त में देश के तीन चौथाई से भी अधिक, 77 प्रतिशत, यानी 84 करोड़ लोग हैं, जो 20 रु. या उससे भी कम प्रति दिन की आमदनी पर जिन्दगी चला रहे हैं। देश का हर दूसरा बच्चा कुपोषित है। चारों तरफ भुखमरी की हालत है। आश्चर्य नहीं कि इस व्यवस्था को लेकर असंतोष निरन्तर गहरा रहा है और यत्र-तत्र-सर्वत्र जनता के स्वतःस्फूर्त आन्दोलन खड़े हो रहे हैं। लेकिन हमारी सरकारों में अपनी गलतियों को स्वीकार करने की सदाशयता नहीं है और सहिष्णुता की कमी है। अतः वह निर्मम होकर ऐसे जनान्दोलनों का क्रूर दमन करती है। परिणामस्वरूप शान्तिपूर्ण आन्दोलनों की गुंजाइश दिनोंदिन कम हो रही है। ईरोम शर्मिला को दस साल से लगातार उपवास के बावजूद कोई नहीं सुन रहा है। गरीबों से सहानुभूति रखने के कारण बिनायक सेन, सीमा आजाद या प्रशान्त राही को जेल के सींखचों के पीछे डाल दिया जाता है या हेम पांडे जैसों को एनकाउंटर में मार दिया जाता है। स्वाभाविक है कि सरकारी हिंसा के विरोध में अब नक्सलवाद और माओवाद के रूप में हिंसक आन्दोलन भी अपनी जड़ें मजबूत कर रहे हैं। क्या इन खतरनाक परिस्थितियों में अनन्त काल तक हमारा देश अस्तित्व में रह पायेगा ?
मगर उम्मीद के बल पर दुनिया जिन्दा रहती है। उम्मीद एक ताकतवर शब्द है।
हो सकता है कि जो करोड़ों रुपये स्वाहा कर संसद में गये हैं, उनके लिये संसद निरर्थक हो चुकी हो। लेकिन राजनीति सिर्फ इतनी ही तो नहीं होती। पी. चिदम्बरम जिस वेदान्ता कम्पनी के नमक का हक अदा करने के लिये हजारों आदिवासियों की बलि चढ़ाने के लिये तैयार थे, उड़ीसा से उसका बोरा-बिस्तर बँधने को लगभग तैयार है। कोरिया की पोस्को कम्पनी या महाराष्ट्र के जैतापुर में लग रहे परमाणु रिएक्टरों का रास्ता भी कठिन होता जा रहा है। वर्ष 2009 में 17,368 किसानों ने आत्महत्या की थी। लेकिन अब किसान यों ही सेंतमेंत में अपनी जान देने को तैयार नहीं है। ये सरकारें भले ही उसकी न हों, लेकिन यह देश तो उसका है। हो सकता है कि हमारे मंत्री और नेता कभी देश से भाग कर विदेशों में जा बसें, लेकिन किसान अब अपनी जमीन यों ही नहीं छोड़ेगा। यह अच्छा लक्षण है।
इसलिये बाकी दुनिया यूनान की तरह दीवालिया होने के रास्ते पर जाये न जाये, सेंसेक्स आसमान छुए या न छुए, अर्थव्यवस्था चढ़े या उतरे, उम्मीद बची हुई है।
हो सकता है कि वर्ष दो हजार ग्यारह में हम आपको कुछ अच्छी खबरें सुना पायें…।