हम तो रोशनी की उम्मीद ही खो चुके थे दूर अब एक दिया टिमटमाता दिखा है दिये की यह टिमटिमहाट आग बनेगी उम्मीद की यह लौ दिल में फिर जली है।
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उक्त लाइनें किसी शायर की शायरी नहीं। यह तो वह दर्द है जो आदत बन चुका था। एकाएक देश के सर्वोच्च न्यायालय से कुछ फैसले ऐसे आए, जिनसे यह फिर तिलमिला उठा और उम्मीद की किरण दिखने लगी। विनायक सेन जेल से रिहा हुए तो लगने लगा कि प्रशांत राही भी खुले में सांस ले सकेंगे। प्रीती हत्याकांड के बारे में उत्तराखंड सरकार से पूछा गया तो दीपमाला, महिमा सेठ, मीना गोला सभी न्याय माँगने लगे। हेम पांडे की हत्या की जाँच के आदेश हुए तो उम्मीद बंधी है कि एक होनहार युवा के हत्यारों को शायद सजा मिले।
बात पिछले दिनों रायपुर की जेल से रिहा हुए विनायक सेन और पौड़ी जेल में बंद प्रशांत राही से शुरू करते हैं। यह दोनों नाम एक ही कड़ी से जुड़े हुए हैं बस अंतर है दूरी का। गरीब आदिवासियों की मदद के लिए विनायक ने छत्तीसगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाया तो प्रशांत ने इसके लिए उत्तराखंड को चुना। 50 वर्षीय प्रशांत पेशे से एक पत्रकार हैं और उत्तराखंड में ‘द स्टेट्समैन’ के संवाददाता रह चुके हैं। प्रशांत को एक विचारधारा वाला पत्रकार कहना अधिक सही होगा। लेखन के साथ-साथ प्रशांत उत्तराखंड में होने वाले अधिकांश आंदोलनों से जुड़े रहे। उन्होंने बैठे-बैठे कलम नहीं घिसी। उत्तराखंड राज्य का आंदोलन हो या फिर ऐतिहासिक नगर टिहरी को डूबोने की साजिश, हर ऐसे मुद्दे के खिलाफ जो जनविरोधी था, प्रशांत सबसे आगे नजर आए। यह बात अलग है आज जब प्रशांत के लिए आवाज उठाने की बात आती है तो अजीब सी खामोशी छा जाती है। सरकार ने एक ऐसा डर लोगों के दिल में पैदा कर दिया है, जिसका समर्थन कोई लोकतांत्रिक देश नहीं कर सकता। जन समर्थन में हमेशा मुखर रहने वाले प्रशांत को पुलिस ने दिसंबर 2007 में देहरादून से गिरफ्तार किया था। दो दिन उन्हें गैरकानूनी तरीके से पुलिस ने अपनी कस्टडी में रखा और अमानवीय व्यवहार किया। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी उधमसिंहनगर जिले में हंसपुर खत्ता के जंगलों से दिखाई गई। बकौल पुलिस उनके पास प्रतिबंधित साहित्य मिला, लैपटॉप मिला। प्रतिबंधित साहित्य क्या होता है, यह अबूझ पहेली है। इन कुछ मामूली चीजों को आधार बनाते हुए प्रशांत पर राजद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। जन मुद्दों को उठाने वाला यह पत्रकार चार साल से उसी ईमानदारी की सजा काट रहा है, जिसके लिए दो जुलाई 2010 को पत्रकार हेम पांडे की हत्या कर दी गई थी। इस कथित मुठभेड़ के बाद पुलिस हेम पांडे को भी नक्सली घोषित करने में जुटी रही। सरकार की इच्छा है। पुलिस का रहम है कि प्रशांत जिंदा हैं। अब विनायक सेन की रिहाई के बाद न्याय की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह प्रशांत के साथ भी हो। विनायक के लिए एकजुट हुए लोगों का यह कर्तव्य है कि वे प्रशांत की रिहाई के लिए भी मुहिम चलाएँ। दलाली का धंधा बन चुकी पत्रकारिता को बचाने के लिए भी जरूरी है कि प्रशांत जैसे पत्रकार जनता के बीच रहें।
प्रशांत जैसे और भी कई लोगों को माओवादी बताकर केंद्र से पैसा ऐंठने की जुगत में लगी सरकार ने यदि जिम्मेदारी से काम किया होता तो आज प्रीति हत्याकांड के मामले में उससे जवाब-तलब नहीं होता। जिन अपराधियों को सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वे प्रीति की हत्या के तीन साल बाद भी खुले घूम रहे हैं। भवाली थाना क्षेत्र के ग्राम दियारी सिमायल के रहने वाले हेमचंद्र शर्मा की 24 वर्षीय बेटी प्रीति की हत्या 19 नवंबर 2008 को की गई थी। प्रीति लालकुआँ थाना क्षेत्र के ग्राम पदमपुरा देवलिया में अपनी बुआ के घर रह रही थी। वह एक ऐसी औलाद थी, जो अपने माता-पिता का सहारा थी। हल्द्वानी के एक नेटवर्किंग इंस्टीट्यूट में काउंसलर होने के साथ ही वह पढ़ाई भी करती थी। 20 नवंबर 2008 को उसकी लाश नग्न अवस्था में एक गन्ने के खेत से मिली। दिल दहला देने वाली इस घटना का खुलासा आज तक नहीं हो सका। प्रीति के पिता अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए चप्पलें घिसते रहे, लेकिन बेगुनाह लोगों को जेल में ठूँस कर अपना रिकार्ड बेहतर बनाने वाली पुलिस को इस बाप पर तरस नहीं आया। प्रीति के हत्यारों की गिरफ्तारी को लेकर जन सैलाब सड़कों पर उतर आया, लेकिन ढोंगी पुलिस टीमें गठित कर लोगों की आँखों में धूल झोंकने से अधिक कुछ नहीं कर सकी। अब सुप्रीम कोर्ट ने जवाब माँगा है तो शायद कुछ हो।
प्रीति के पिता अकेले ऐसे इंसान नहीं जिसे न्याय की जरूरत हो। पुलिस की लापरवाही और निठल्लेपन की वजह से 4 अक्टूबर 2009 को कुण्डा (काशीपुर) में रहस्यमय परिस्थितियों में मृत मीना गोला का मामला भी अभी तक अनसुलझा है, जबकि मीना के परिवर्तनकामी छात्र संगठन के साथी इस मामले में मीना के माँ-बाप की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए देहरादून के गांधी पार्क में तक अनशन कर चुके हैं। डेढ़ वर्ष पूर्व मारी गई रामनगर की मासूम महिमा सेठ को भी न्याय चाहिए। शांतिकुंज लखनपुर के रहने वाले संजय सेठ की लाड़ली बेटी महिमा 17 नवंबर 2009 को एक वैवाहिक समारोह में गई और रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। यदि एक मजदूर ने भवानीगंज स्थित खंडहर में उसकी लाश न देखी होती तो यह नाकारा पुलिस शायद ही उसे कभी खोज पाती। महिमा का शव 23 नवंबर को मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार दुराचार के बाद उसकी हत्या की गई थी। हत्या शव मिलने से करीब 48 घंटे पहले हुई थी। मतलब जिस हैवान ने महिमा का अपरण किया था, वह उससे चार दिन तक दुराचार करता रहा और पुलिस अपने थानों की रखवाली में लगी रही। महिमा के हत्यारों की गिरफ्तारी की माँग को लेकर भड़के जनाक्रोष को भी टीमें गठित करके ठंडा कर दिया गया। हत्यारे आज भी बेखौफ घूम रहे हैं। इन्हीं हत्यारों ने 17 मार्च 2010 को हल्द्वानी के राजपुरा में रहने वाली एक और मासूम दीपमाला की बलि ले ली। हमारी सुरक्षा को बनी पुलिस यहाँ भी साल भर से जाँच-जाँच ही खेल रही है। जब जाँच-जाँच ही खेलना है तो क्यों न इस मामले की भी उच्चस्तरीय जाँच हो। अब प्रीति के मामले का सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया है तो एक आस है कि इन मासूमों पर भी न्यायालय की नजर जाएगी।