भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी फटने, भूस्खलन, जमीन के धँसने, हिमस्खलन के अतिरिक्त मौसम परिवर्तन और तापमान बढ़ने से अंधड़, बाढ़, सूखा, दुर्भिक्ष आदि के रूप में आपदाएँ आती हैं।
कुमाऊँ विश्वविद्यालय में भू विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. चारु चन्द्र पन्त बताते हैं कि हिमालय की चार हजार किमी. श्रृंखला अत्यधिक संवेदनशील है। पृथ्वी की नवीनतम पर्वत श्रृंखला होने के कारण इसमें आये दिन हलचलें होती रहती हैं। मध्य हिमालय का एक हिस्सा होने के कारण उत्तराखंड भी भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। राज्य के 13 जिलों में से पिथौरागढ़, बागेश्वर व अल्मोड़ा का कुछ हिस्सा, चमोली, रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी भूकंपीय दृष्टि से जोन 5 में आते हैं। पृथ्वी के अन्दर भ्रंशों के बीच होने वाली हलचलों से जमीन के हिलने से जो दुष्परिणाम सामने आते हैं उन्हें भूकंप कहते हैं। कई टैक्टॉनिक प्लेटों के आपस में टकराने से इस तरह की भूगर्भीय हलचलें होती हैं। एकाएक आ जाने वाले इन भूकंपों से व्यापक स्तर पर जान-माल की क्षति होती है। 1950 में ग्रेट आसाम, 1930 में मेघालय, 1947 में दार्जिलिंग तथा 1945 में कराची के आसपास बड़े भूकंप आये, जिनसे व्यापक क्षति हुई थी। फिर कुछ दशकों तक बड़ी भूगर्भीय हलचल नहीं हुई।
पश्चिमी भारत में जो इंडियन प्लेट है वह 40 मिलीमीटर तथा पूर्वोत्तर से 55 मिमी. प्रति वर्ष उत्तर की ओर खिसक रही है। इस हलचल से 1991 में उत्तरकाशी, 1999 व 2008 में चमोली, केदारनाथ, रुद्रप्रयाग, बागेश्वर, द्वाराहाट, रानीखेत आदि क्षेत्रों में भूकम्प आये। लेकिन अब तक रिक्टर स्केल पर 8 या इससे बड़ा कोई भूकंप नहीं आया। इससे प्रतीत होता है कि भूमि के गर्भ में ऊर्जा जमा तो हो रही है, लेकिन बाहर नहीं निकल रही है। इस ऊर्जा का बाहर निकलना बहुत जरूरी है। मगर जब कभी भी वह निकलेगी तो उससे व्यापक तबाही हो सकती है। इससे उत्तर भारत ही नहीं, पूरा देश प्रभावित होगा। इसलिए हिमालयी क्षेत्रों को ही नहीं पूरे उत्तरी भारत को इस संभावित आपदा से बचाव के उपाय अभी से कर लेने चाहिए। भूकम्प आने पर पहाड़ों से पत्थर-मिट्टी खिसक कर आते हैं तो मैदानी क्षेत्रों में उथल-पुथल के बीच कीचड़ में मृदा अवसाद (ल्युक्यूफंक्शन) पड़ जाते हैं। भूकंप आने पर तुरन्त घर से निकल कर खुले स्थान पर आ जाना चाहिए। हम पारम्परिक लोक ज्ञान से विस्मृत होते जा रहे हैं। पहले लोग भूकंप व आपदाओं को ध्यान में रख गृह-निर्माण करते थे। अब सीमेंट-लोहा व ईंट के भारी-भरकम मकान बनने लगे हैं वह भी बिना भूमि की जाँच करे। आपदा से बचने के लिए हर घर में मुख्य दरवाजे के अतिरिक्त भी कोई दरवाजा हो, ताकि अगर एक बंद भी हो जाये तो दूसरे दरवाजे से बाहर निकला जा सके। एकदम नदी किनारे की जमीन पर नहीं बसना चाहिए। मकान सख्त चट्टान के ऊपर ही बनने चाहिये। मकान कहाँ पर बनायें, इसके लिये भू वैज्ञानिकों से राय अवश्य लेनी चाहिए। अभी केन्द्रीय भू विज्ञान मंत्रालय के मौसम विज्ञान विभाग की एक परियोजना के तहत कुमाऊँ विश्वविद्यालय का भूगर्भ विज्ञान विभाग उत्तराखंड में हो रही भूगर्भीय हलचलों पर नजर रखे हुए है। नारायणनगर (नैनीताल), धारचूला (पिथौरागढ़), धौलछीना (अल्मोड़ा), भराड़ीसैण (चमोली) आदि स्थानों पर भूकंपमापी केन्द्र स्थापित किये गये हैं।
प्रो. पन्त बताते हैं कि किसी क्षेत्र विशेष में बहुत कम समय में बादलों के प्रवेश करने तथा उनके बाहर न निकल पाने से वे बड़े वेग से उस एक ही जगह पर बरसने लगते हैं। इस घटना को बादल फटना कहते हैं। बादल फटने से अक्सर जान-माल की भारी क्षति हो जाती है। आपदाओं को रोकने के लिये हमें प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना होगा। वनों के विनाश, प्रकृति के अंधाधुंध दोहन, घाटियों से चोटियों की ओर या सूखे नदी-नालों के किनारे बसने, जंगल व आबादी क्षेत्र में आग लगने आदि से आपदाओं में वृद्धि होती है। वैसे आपदाएँ प्राकृतिक होती हैं, लेकिन मनुष्य की लापरवाही उन्हें तेज करती हैं।