पहाड़ में ऐसा कोई त्यौहार नहीं होता, जिसमें उड़द दाल की पकौड़ियाँ न बनती हों। अब होली आ रही है और उसके लिए सभी पहाड़ी परिवार पकौड़ियाँ बनाना चाहेंगे। लेकिन यह कमरतोड़ महंगाई का साल है और गरीब किसानों के लिये पकौड़ियाँ बनाना संभव हो भी पायेगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। दाल का दाम 100 रुपए किलो से अधिक है और सरसों का तेल, जिसमें वह पकाई जाती है, भी 100 रुपए किलो से अधिक पर बिक रही है। एक घर में कम से कम आधा किलो दाल तो चाहिए ही।
पहाड़ में आम लोगों के लिए आय का एक ही स्रोत है, वह है जवाहर ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, जिसमें एक परिवार को साल में 100 दिन का काम मिलना चाहिए। अगर मिल भी गया, जो सदैव संभव नहीं होता तो उसमें एक दिन की मजदूरी 72 रुपए बनती है।
कुछ वर्ष पूर्व पहाड़ का प्रत्येक किसान दाल और सरसों, दोनों बोता था। चार-पाँच गाँवों के बीच एक तेली अवश्य होता था। उसके पास सरसों ले जायें तो वह उससे तेल निकाल कर आपको दे देता था। खेतों से उगाई दाल घर में होती थी, जिसे पीस कर पकौड़ी का मसाला तैयार हो जाता था। लगभग सभी गाँवों के निकट वन होते थे, जहाँ से सूखी लकड़ियाँ बटोर कर चूल्हा जला लिया जाता था और घर की स्त्रियाँ गर्मागरम, करारी पकौड़ियाँ बना कर सबको खिलाती थीं।
अब घर में न दाल होती है, न सरसों। सब कुछ बाजार से खरीद कर लाना पड़ता है, जिसके लिए पैसा चाहिये। गाँवों में आमदनी के उपाय नहीं हैं। काम पाने के लिये केवल जवाहर रोजगार गारंटी योजना है, उसके लिए सरकारी विकास खंड से कार्ड बनवाना पड़ता है, काम माँगना होता है, बैंक में खाता खोलना होता है और किए गये काम की मजदूरी पाने के लिये खंड विकास अधिकारी को बार-बार याद दिलाना होता है। हजारों ग्रामीण हैं, जिन्होंने इस योजना में काम किया, किन्तु उन्हें मजदूरी नहीं मिली। ![]()
इस स्थिति में त्यौहार की पकौड़ी बनाना अब दूर की चीज हो गई है। जहाँ भाईचारा है, वहाँ कोई पकौड़ी बनानेवाला पड़ोसी, कागज़ में लपेट कुछ पकौड़ी भेज देता है। वरना स्थिति यह हो गई है कि त्यौहार बिना पकौड़ी बनाए-खाए निकल जायें !
पुराने समय में होली मिलने आनेवालों को ठंडाई पिलाई और मिठाई खिलाई जाती थी। अब चीनी पचास रुपए किलो से ऊपर है और मिठाई महंगी। मिलने आने वालों के लिए कोई कैसे बनाए ठंडाई या शरबत ?
शहरों में, जिसके पास पैसा है, उसे कोई कठिनाई नहीं। ठंडाई न हो तो बाजार से बोतलों का कोई ठंडा पेय मँगा लेगा। गाँवों में केवल पानी दे सकते हैं। वह भी हर समय, सब जगह अब उपलब्ध नहीं। भाग्यशालियों के घरों में नलों से दिन में दो घंटे पानी आता है। गाँव के सोते सब सूख गए हैं। पानी के लिए हाय-हाय हो गई है। होली तो दूर, पीने के लिए भी पानी मिल जाये तो गनीमत है।