घनश्याम/केशव भट्ट
उत्तराखंड में विकास के होने या ना होने से जनप्रतिनिधियों को कोई लेना-देना नहीं है। सभी का मकसद अपने विकास से है। वो चाहे किसी भी रूप में हो। विधायक हो या सांसद अपनी निधि का उपयोग अपने उन चहेतों को विकास के नाम पर दे रहे हैं जिनसे उन्हें तय कमीशन गुपचुप ढंग से मिल सके। विकास के नाम पर किये जा रहे इस तरह के छलों को जनता भी अपनी नियती मान चुप बैठी है। ऐसे में अब पहाड़ में हो रहे विकास कार्य भगवान भरोसे ही हैं।
उत्तराखंड के विधायक व सांसद अपनी निधि का बेजा इस्तेमाल करने में लगे हैं। जनता के धन को अपनी निधि बता वो इसका धड़ल्ले से दुरुपयोग कर रहे हैं। अपनी निधि का 25 प्रतिशत देव मंदिरों के कथित सौंदर्यीकरण के नाम पर खर्च करने वाले इन सांसदो व विधायकों से कोई ये पूछने की हिमाकत नहीं कर पाता कि विकास के नाम पर जनता को आखिर क्यों छला जा रहा है। जबकि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च आदि के निर्माण, सौंदर्यीकरण व अन्य कामों पर विधायक व सांसद निधि का बेजा इस्तेमाल करने पर कई नियम आड़े आते हैं। लेकिन माननीयों को इन नियमों के शासनादेश की परवाह तक नहीं है। मंदिरों का निर्माण, सौंदर्यीकरण व घाटों आदि के नाम पर दी जा रही निधि से पहाड़ के अन्य विकास कार्यों की गति मंथर हो रही है। दी जाने वाली निधि का सही उपयोग हो रहा है या नहीं इसकी जानकारी किसी भी विधायक व सांसद को नहीं होती है। वो सिर्फ अपने कमीशन तक ही सीमित रह जाते हैं। सीसी मार्ग, पेयजल, स्कूलों की साज-सज्जा, अतिरिक्त कक्षों, कंप्यूटर, पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ ही मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए बार-बार निधि का सहारा लेने वाले ये सांसद व विधायक इस बात को कैसे नजरअंदाज कर रहे हैं कि आपदाओं की मार झेल रहे उत्तराखंड में जन-जीवन अभी तक पटरी में नहीं आ सका है। आपदा से त्रस्त कपकोट तहसील के सुड़िंग निवासी खड़क सिंह जैसे हजारों पीड़ितों की मदद के लिए इन सांसदो व विधायकों का कोष आखिर क्यों बंद रहता है ? यह पूछने की हिमाकत करने वालों के ही ये विरोधी हो जाते हैं।
विधायकों व सांसदों के बागेश्वर जिले में लुटाई गई करोड़ों रुपयों की निधि को ही यदि देखा जाए तो यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के अन्य बारह जिलों का विकास किस तरह से हो रहा होगा? बीते वर्ष 2010 में बागेश्वर में विकास कार्यों के नाम पर सांसद प्रदीप टम्टा ने ही अपने खजाने का द्वार खोल तीस लाख का चढ़ावा दिया है। इन विकास कार्यों में डंगोली में मुस्लिम कब्रिस्तान में विश्राम गृह, अमतौड़ा, नौटा में गोलू मंदिर धर्मशाला निर्माण, छत्तरकोट में गोलू मंदिर सौंदर्यीकरण, सूपी में मंदिर, चलकाना में भगवती मंदिर तक सीसी मार्ग, किमगैर में मंदिर, सलिंग मंदिर, ढोक्ती में मंदिर सौंदर्यीकरण व तोली में मंदिर तक सीसी मार्ग मुख्य हैं। राज्यसभा सांसद भगत सिंह कोश्यारी भी जिले में अब तक अपनी निधि से लगभग साढ़े पाँच लाख की धनराशि भेंट चढ़ा चुके हैं। पतियासार देवी मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए कपकोट के विधायक शेर सिंह गड़ि़या ने दो लाख तो जिला पंचायत अध्यक्ष राम सिंह कोरंगा ने पचास हजार रुपये की अभी हाल ही में घोषणा की है। इसके साथ ही विधायक शेर सिंह गड़ियाजी अभी तक जनता के खजाने से एक करोड़ बावन लाख सत्तावन हजार की भेंट चढ़ा चुके हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा मंत्री बलवंत सिंह भौर्यालजी भी अपने विधानसभा क्षेत्र कांडा में अभी तक एक करोड़ सतासी लाख अस्सी हजार बाँट चुके हैं। विधायक चंदन राम दासजी किसी से पीछे नहीं हैं। उनके निधि द्वारा खर्च किए गए रुपयों का आंकड़ा भी दो करोड़ के लगभग छूने को है।
कपकोट तहसील के चिरपतकोट, भंडारीगाँव में स्थित मंदिर का सौंदर्यीकरण भी विधायक निधि से हो रहा है। जबकि आस्था का हवाला दे यहाँ महिलाओं से श्रमदान करवाया जा रहा है। बागेश्वर के सीडीओ रोशन लाल इस बावत कहते हैं कि जीओ के आधार पर ही विधायक व सांसद निधि पर व्यय किया जाता है। घोषणाओं की जाँच के बाद ही धनराशि दी जाती है। मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए आवंटित धनराशि पर रोक लगा दी जाती है। विभागीय कर्मचारी रहस्योद्घाटन करते हुए बताते हैं कि सौंदर्यीकरण के नाम पर होने वाले कामों की धनराशि की भरपाई गुपचुप ढंग से अन्य मदों में छेड़-छाड़ कर पूरी कर दी जाती है, ताकि जनता में विधायकों व सांसदों का प्रभाव बना रहे। वर्षों से यही परिपाटी चलती आ रही है। इस सबको नकारते हुए विधायकगण जीओ के आधार पर ही घोषणा करने की बात कह रहे हैं।
उत्तराखंड ने बीते वर्ष आपदाओं की जो मार झेली है उससे उबरने में अभी कितना वक्त लगेगा कोई नहीं जानता। क्योंकि विकास के नाम पर थोथी राजनीति कर रहे उत्तराखंड के विधायक व सांसद इस बावत् मात्र अखबारी बयानबाजी तक ही सीमित रह गए हैं। पहाड़ को जोड़ने वाली सड़कें ध्वस्त हैं। राज्य सरकार की कोई स्पष्ट नीति न होने से सैकड़ों लोग अपने गाँव, खलिहान, घर-बार आपदा की भेंट चढ़ जाने से अभी भी निराश्रित जिंदगी जीने को मजबूर हैं। विकास के नाम पर ठेकों की लूट मची हुई है। विनाश का उद्घाटन करने के लिए माननीयों में होड़ मची हुई है। प्रदेश के मुख्या उत्तराखंड की विनाश लीला को भूल विकास के पाठ की घुट्टी जनता को जबरदस्ती पिलाए जा रहे हैं।
अरब दुनिया में जैसी क्रांति हो रही है, उसी तरह की एक क्रांति की जरूरत भारत में भी है। लेकिन शायद ये कभी संभव हो सके। क्योंकि भारत में लोकतंत्र है और अरब दुनिया में नहीं! और लोकतंत्र में विकास की परिभाषा माननीयों की नजर में यही है।