विभिन्न संस्कृतियों के अनेको रंगों से रंगे देश में रंगो का त्योहार है होली, जिसके ये रंग अब देशवासियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का एक हिस्सा हैं। यहाँ तो साल भर होली है। कभी सीमा पार से आतंकी आकर निर्दोषों के खून से होली खेलते हैं तो कभी अपने ही अपनों का लाल रंग बेरंग पानी की तरह बहा देते हैं। कोई ऐसी सुबह नहीं जब खबरों में हरे लाल रंग के नोटों या दहेज में पीले रंग के सोने को लेकर किसी अभागिन की माँग का लाल रंग का सिंदूर लाल लहू में बदल कर बहता न दिखे। कोई खुद को केसरिया रंग में रंग कर देश के तिरंगे पर भाषा और प्रान्त की आड़ में भददे रंगो के दाग लगा रहा है तो कहीं रंगीन सपने दिखाकर कोई राजनेता अपना रंग बदलने लगता हैं। किसी की ज़िंदगी इतनी रंगीन है कि किसी और रंग की गुंजाइश ही नहीं तो वहीं महंगाई की पिचकारी से गरीबों की ज़िन्दगी के सारे रंग ही धुल जाते हैं। कमरतोड़ महंगाई में पीली और गुलाबी रंग की दाल भी नसीब नहीं, किसी तरह रोज़ के चार दाने जुटा भी लें तो उसे पकाने को इतना कीमती लाल रंग का सिलिण्डर कैसे लायें ? सूखे के कहर से तो उसके खेतों का हरा-पीला रंग भी गायब है, उसके लिये तो हर तरफ अंधेरे का वह काला रंग है जिस पर न तो कोई रंग आसानी से चढ़ता है और न ही जल्दी छूटता है। ऐसे में वह परिवार के लिये रोटी-दाल लाये या अबीर गुलाल ? अपने ही रंग में रंगे इन रहनुमाओं के पास गरीब ग्रामीणों के जीवन में रंग भरने के लिये कोई ऐसी योजना नहीं जो धरातल पर रंग लाती दिखायी दे। होली का तो हर रंग कुछ दिनों में छूट जाता है और संग रह जाते हैं देश के यह बदलते रंग। होली की बात पर पौड़ी गाँव की सूरमा देवी का कहना है:-
भैजी जै की होली, ते की होली
हम गरीबों की कै की होली।
ऐसे में सोचता हूँ कि होली खेलू तो आखिर किस रंग से ?

























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