त्रिलोकमणि पाठक
जंगली सुअरों द्वारा कृषि-बागवानी को तहस-नहस करने की घटनायें पहाड़ में अब आम हैं। कभी-कभार सुअरों द्वारा लोगों को जान से मारने अथवा घायल करने के समाचार भी मिलते हैं। ये घटनायें जंगलों से घिरे उन गाँवों में होती हैं, जहाँ ये सुअर झाड़ियों में छुपे रहते हैं। रात होते ही वे फसल, शाक-सब्जी समेटने निकल पड़ते हैं। इसे रोकने की हिम्मत किसी में नहीं क्योंकि जान का खतरा हिंसक महाबली से मुकाबला अपने प्राण सब को प्रिय हैं। प्रातः अपना उजड़ा खेत देख कर किसान अपना सिर पीट लेता है।
यह समस्या पूरे उत्तराखंड की है। बाराकोट ब्लॉक के कानीकोट, डुंगराकोट, कोटना, डुंगरा, इजट्टा, किमाड़ की मूँगफली हो अथवा बेरीनाग-गंगोलीहाट तहसीलों की मडुवा, सोयाबीन, आलू की फसल। सर्वत्र ऐसी बर्बादी दिखाई देती है। कृषकों ने अपने जोत क्षेत्र के बाहरी खेतों की बुआई तो 5-7 वर्ष पूर्व ही छोड़ दी थी, अब बीच खेतों में भी यह रोग लग गया है। फलतः अधिकांश गाँवों में कृषि जोत एक तिहाई रह गयी है। एक सुअर एक रात में अनुमानतः 50 किग्रा. धान खा जाता है तथा 150 किग्रा. बर्बाद कर देता है। दो-चार सुअर ही 8-10 बोरे धान पैदा करने वाले कृषक की कमाई चौपट करने के लिये पर्याप्त हैं।
एक दशक पूर्व जंगली सुअर एक डरपोक प्राणी था। वह कृषि बागवानी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता था। इनकी संख्या सीमित थी तथा जंगल में प्रयाप्त मात्रा में वे जड़ी खोद खाता था। अचानक 8-10 वर्ष में इनकी संख्या इतनी क्यों बढ़ गयी, यह एक विचारणीय है। सुअर एक बार में 5 से 7 बच्चे पैदा करता है। इनकी संख्या नियंत्रित करने के लिये जंगलों में पर्याप्त मात्रा में तेंदुए व बाघ थे। बाघों का विनाश यहीं के निवासियों ने किया। किसी का कुत्ता क्या गया तो उसका पीछा कर शव छुड़ा कर शव में जहर डाल दिया, अथवा शिकारियों ने बाघ की कीमती खाल-हड्डी के लिये उनका वंश ही उजाड़ दिया। यही बाघ सुअरों के बच्चों को मार कर अपना भोजन करते थे। सुअरों की संख्या नियंत्रित थी। प्रकृति में सामंजस्य था। अब जंगलों में जो बाघ बच गये हैं, वे जंगल छोड़ कर गाँवों का रुख कर रहे हैं। बाघों को भी शायद जंगली सुअरों का डर सताने लगा है और वे नरभक्षी बन रहे हैं।
जंगली सुअरों का मामला उत्तराखंड विधान सभा में भी गूँजा है। तब शासन ने निर्णय लिया कि प्रशासनिक स्वीकृति लेकर गाँव का लाइसेंस गनधारक डी.एफ.ओ. की अनुमति लेगा तभी सुअरों का वध किया जा सकेगा। किसी-किसी गाँव में लाइसेंस गनधारक तो हैं परन्तु अनेक गाँवों में गनधारक नहीं हैं। फिर बिना प्रोत्साहन के जान जोखिम में डालकर हिंसक जंगली जानवरों से कोई क्यों भिड़ना चाहेगा। वन महकमा वृक्षारोपण के नाम पर प्रति वर्ष जितनी धनराशि खर्च कर रहा है, उसका एक चौथाई भी जंगली सुअरों के विनाश में खर्च करें तो पहाड़ में खेती बच जायेगी। अन्यथा कृषि/बागवानी पर आश्रित जनता का भूखों मरना अवश्यम्भावी है।
Insan Janglu ki van sampada ki vastu khaa raha hai> janwaroo ka hak mat khaoo.jab jangli janwaroo ko bhar pait bhojan milayga to Rihayasi jagah per koi nahi aayaga> aadmi khud sudhray tabhi janwar bhi khudh sudhrangya> kisi kaa hisa khaoga to yahi hoga jant ko khud jagruk hona paryga. kand mul fal ful jangli janwaroo kaa admi kaa ab farz hai jangloo mai jakar unki yawstha karna. tabhi bachygi khati suwaroo say>.
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